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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages
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सौन्दर्य लहरी ६१
( धारण कर रहा है ) और हर उसकी भस्म बनाकर अपने अंग
पर लगाते हैं ।” ॥२॥
[ शक्ति अनन्तता इस श्लोक में दिखाई गई है । उसकी
सापेक्षता से ब्रह्मा, शौरि ( शेष ) और हर की शक्तियां तुच्छ हैं,
क्योंकि वह अनन्त ब्रह्माण्डों की स्वामिनी है, और ये एक ब्रह्माण्ड
के ही अधिदेव हैं । ]
विरिञ्चः या विरिञ्चिः ब्रह्मा को कहते हैं, और शौरिः विष्णु
का नाम है । शेषशायी नारायण की शय्या बनाने वाला शेष नाग
भी नारायण की ही शक्ति का एक रूप है । विष्णु के साथ राम
कृष्ण दोनों अवतारों में लक्ष्मण और बलभद्र शेष के अवतार माने
जाते हैं । योग दर्शन के सूत्रकार ऋषि पतञ्जलि को भी शेष का
ही अवतार कहा जाता है, जिन्होंने शरीर के स्वास्थ्य के लिये चरक
संहिता, व्याकरण की शुद्धि के लिये पाणिनि सूत्रों पर महाभाष्य
और मनोनिरोध के लिये योग दर्शन की रचना की है । यहां उन
शेष को विष्णु का ही एक नाम देकर नामांकित किया गया है ।
कणाद के वैशेषिक दर्शन और गौतम के न्याय दर्शन के
अणुकारणवाद, मतानुसार सृष्टि का उपादान कारण परमाणु हैं,
प्रधानकारणवाद इसीलिये वे अणुवाद के समर्थक हैं । सांख्य और
और विवर्तवाद योग दर्शन सृष्टि का उपादान कारण मूल प्रकृति
को मानते हैं । मूल प्रकृति को प्रधान और
अव्यक्त भी कहते हैं, इसलिये सांख्य और योग दोनों प्रधान
कारणवादी हैं, वे अणुवाद का खंडन करते हैं । प्रधान में

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६२ सौंदर्य लहरी
तीनों गुणों की साम्यावस्था रहती है। विषमावस्था में वह ही
महत् तत्व कहलाता है, परन्तु वह आधुनिक वैज्ञानिकों की सृजन
शक्ति (Cosmic-Energy) से सूक्ष्म तत्व है, क्योंकि मन और
इंद्रियां भी उसी के विकार हैं। (Psychic Forces) अर्थात
मानसिक शक्तियां भौतिक सृजन शक्ति (Cosmic-Energy) के
विकार नही समझे जाते। वेदांत सृष्टि का आदि कारण ईश्वर की
इच्छा शक्ति को मानता है और जड प्रधान कारणवाद और
अणुवाद दोनों का खंडन करता है, परन्तु इस श्लोक में शंकर
भगवत्पाद ने तीनों वादों का समन्वय करते हुये वेदान्त के इच्छा
शक्ति वाद का ही समर्थन किया है।
'पांसु' अणुवाद की ओर संकेत करता है, 'चरण पंकेरुह'
जड प्रधान कारणवाद की ओर, और 'तव' पद महा त्रिपुर सुन्दरी
इच्छाशक्ति की ओर संकेत करता है। भगवती के चरणों को कमलों
से उपमा दी गई है, कमल कीचड में उत्पन्न होता है, इसलिये उसको
'पंकेरुह'—अर्थात कीचड में उत्पन्न हुआ कहा गया है। यहां
इच्छाशक्ति को तमोगुण की शक्ति होने के कारण, उसके घनीभूत
होने पर जडावस्था में परिणत होने को पंक से उपमित किया है
और उस घनीभूत तमोगुणी इच्छाशक्ति की स्थूल कीचड से जो
कमल खिलते हैं, वे ही सद् और असद् विद्या-रूपी दो चरण है।
उनकी धूल कमलों की रज है। रज तो बाहर से चरणों पर जम
जाती है, परन्तु जैसे कमलों की पराग रूपी रज कमल से ही उत्पन्न
होती है, वैसे ही यह पांसु कण भगवती के चरणों से उद्भूत है।
अर्थात इच्छाशक्ति की स्थूल घनीभूत अवस्था प्रधान कारणवादियों

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सौंदर्य लहरी ६३
का प्रधान है और वह ही परिणत होकर अणुओं का रूप धारण कर
लेती है। आधुनिक विज्ञान वादियों के विद्युदाणुओं (Electrons)
को सृष्टि का कारण मानें तो उनके केन्द्रीय (Protons) अणुओं
को किसी जडशक्ति (Cosmic Energy) का अणुपरिणाम
(granulation) मानना पडेगा, और उस सृजनशक्ति (Cosmic
energy) को परमात्मा की आदि इच्छाशक्ति का परिणाम
समझना चाहिये ।
सर्व शक्तिमान की शक्ति का माप नहीं किया जा सकता, वह
अनन्त है, और उसकी रचना में अनेक ब्रह्माण्ड
शेष और हैं और प्रत्येक ब्रह्माण्ड के पृथकर हरि, हर और
कुण्डलिनी ब्रह्मा हैं। प्रत्येक ब्रह्मा जितनी शक्ति अपने
ब्रह्माण्ड को बनाने में खर्च करता है, वह सब अनन्तशक्ति का अति
स्वल्प भाग है, अर्थात दो एक कण के ही तुल्य है। क्योंकि
अनन्त वस्तु कभी सान्त (Limited) नही होती, यह बात प्रत्यक्ष
देखने में आती है। एक वट के बीज में कितना बडा वृक्ष निहित
है, इतना ही नहीं प्रत्येक बीज में अपने जैसे बीज असंख्यों की
गिनती में बनाने की शक्ति रहती है। अर्थात प्रत्येक बीज में
अनन्तशक्ति भरी हुई है। अणुबम का चमत्कारी प्रभाव अब सबको
विदित है। न जाने एक-एक अणु से क्या-क्या हो सकता है।
परमात्मा की अनन्त शक्ति, अणु-अणु में अनन्त ही परिपूर्ण है।
अनन्त भण्डार से प्रवाहित शक्ति सक्रिय (dynamic) होकर
अनन्त कार्य करके भी समाप्त नही होती, वरन अनन्त ही बच
रहती है। यदि सब समाप्त हो जाय, तो वह अनंत पद वाच्य

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६४ सौन्दर्य लहरी
नहीं। ब्रह्माण्ड की रचना करके जो अनंत शक्ति बच रहती है, वह
आणविक रूप धारण करने के लिये मानो कुण्डलों में घूमने लगती
है और उसके कुण्डलाकृति रूपों के कारण उसको सर्प से उपमा
दी जाती है। उसे अथर्व वेद में उच्छिष्ठ ब्रह्म कहा है। (देखें अथर्व
वेदीय उच्छिष्ट सूक्त) और पुराणों में उसे ही नारायण की सेज
बनाने वाला शेष (बचा हुआ) कहा है, उसको अनंत भी कहते हैं।
उस शेष या उच्छिष्ट शक्ति का ब्रह्माण्ड के धारण करने में उपयोग
होता है। मानो वह ब्रह्माण्ड को अपने हजार फणो पर धारण किये
हुवे है। शेष शक्ति विश्व को धारण करती है इसलिये उसकी
संक्षक और आधार होने के नाते विष्णु नारायण का ही रूप है।
'सशैलवनधात्रीणां यथाधारोऽहिनायकः ।
सर्वेषां योगतंत्राणां तथाधारोहि कुण्डली ॥
अर्थ—जैसे सब पर्वत वनों को धारण करने वाले लोकों का
आधार शेषनाग अहिराट् है, वैसे ही सब योगतन्त्रों का आधार
कुण्डली (कुण्डलिनी शक्ति) है। पिण्ड शरीर की रचना के उपरांत
जो शक्ति बच रहती है, वह मूलाधार में शरीर को धारण किये
हुवे प्रसुप्तवत पडी रहती है, इसलिये उसको आधार शक्ति भी
कहते हैं, उसी को कुण्डलिनी कहते हैं, यह ही शक्ति जाग कर
प्रतिप्रसव क्रम का आरम्भ करती है और सब तत्त्वों को लयाभिमुख
करती हुई शिव में लीन होने सुषुम्ना मार्ग से सहस्रार में चढने
लगती है। मानों सब तत्वों को भस्म करके, शिवजी के अंग की
विभूति बना देती है—यह लय क्रम मोक्ष मार्ग है—जैसा कि भस्म
लगाने के मन्त्र में कहा जाता है—

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सौंदर्य लहरी ६५
“ अग्निरिति भस्म, वायुरिति भस्म, जलमिति भस्म, स्थलमिति
भस्म, व्योमेति भस्म, देवा भस्म, ऋषयो भस्म, सर्वे ह वा एतादिदं भस्म,
पूतं पावनं नमामि सद्यः समस्ताध शासकम् ! ”
श्लोक में 'पांसुं', 'एनं' शब्दों में एकवचन का प्रयोग किया
गया है, न कि बहुवचन का । इसका अभिप्राय यह भी हो सकता
है कि प्रत्येक अणु में भगवती के चरण हैं ।
वह है विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखी विश्वतोहस्ता उत विश्वतस्पात् ॥
अर्थात् प्रत्येक परमाणु अनन्त शक्ति से परिपूर्ण है ।
तीसरे श्लोक में यह बताया गया है, कि भगवती की उपासना
मुमुक्षुओं के अज्ञान का नाश करती है और सकाम उपासकों की
सब कामनायें पूर्ण करती हैं। अर्थात् भगवती भुक्ति और मुक्ति
दोनों प्रदान करती है ।
[ ३ ]
अविद्यानामन्त स्तिमिर मिहिरोद्दीपन¹करी
जडानां चैतन्यस्तबकमकरन्दस्रुतिझरी ।
दरिद्राणां चिन्तामणिगुणनिका जन्म जलधौ
निमग्नानां दंष्ट्रा मुररिपुवराहस्य भवती ॥
१. पाठान्तर:-( द्वीप नगरी )

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६६ सौन्दर्य लहरी
कठिन शब्दों के अर्थ.— अन्तस्तिमिर=हृदय अथवा अन्तःकरण
का अंधकार; मिहिर=सूर्य, चैतन्यस्तबक=ज्ञानरूपी चेतन गुलदस्ता;
स्रुति=स्रोत, प्रवाह; झरी=झरना; गुणनिका=माला; मुररिपुवराह=
विष्णु का बाराहावतार ।
अर्थ:—तू अविद्या में पडे हुओं को हृदयान्धकार को
हटाने के लिये (ज्ञानरूपी) सूर्य का उद्दीपन करने वाली है,
जड मनुष्यों के लिये चैतन्यस्तबक से निकलने वाले मकरन्द के
स्रोतों का झरना है, दरिद्रियों के लिये चिन्तामणियों की माला
है और जन्ममरण रूपी संगार सागर में डूबे हुओं को
विष्णु भगवान के वाराहावतार के दांत के सदृश उद्धार करने
वाली है ।
सं० टि०—शक्ति की उपासना से अज्ञान का नाश होता है,
दरिद्रियों को धन मिलता है, जडता का नाश होता है और वह
संसार सागर में डूबतों को सहारा है ।
मुण्डकोपनिषद में परा और अपरा नाम की दो प्रकार की
विद्या और विद्याओं का वर्णन है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद,
अविद्या अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द,
और ज्योतिष सबको अपरा विद्या के अन्तर्गत
माना गया है और जिस विद्या से ब्रह्म की प्राप्ति होती है, उसे परा विद्या
कहते हैं । अपरा विद्या के जानने वालों को विद्वान नहीं कहा
जाता, क्योंकि वे अविद्या में ही पडे रहते हैं । कर्मकांड और

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सौन्दर्य लहरी १७

उसका सब विस्तार अविद्यामय ही है, उससे ब्रह्मप्राप्ति नहीं
होती। ब्रह्मप्राप्ति के जिज्ञासु मुमुक्षु उसका परित्याग करके पराविद्या
की शरण ग्रहण करते हैं और वे पराविद्या के अन्वेषक ही विद्वान
कहलाने के योग्य हैं।
प्लवाह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म ।
एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापियन्ति ॥ मु.(१.२:७)
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पंडितं मन्यमानाः ।
जंघन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥८
अविद्यायां बहुधा वर्तमाना वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बालाः ।
यत्कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात्तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥९
इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः ।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥१०
तपःश्रद्धे येह्युपवसंत्यरण्ये शांता विद्वांसो भैक्षचर्या चरन्तः ।
सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतःस पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥११
अर्थः—ये १८ प्रकार के यज्ञयागादि अनुष्ठान अदृढ और
अस्थिर हैं, और उनमें जो कर्म किये जाते हैं, वे श्रेय नहीं । जो
मूढ इनको श्रेय समझ कर उनमें आनंदित होते हैं, वे जरामृत्यु में
बार-बार आते हैं। अविद्या में पडे हुए, अपन को बुद्धिमान और
पंडित मानने वाले, अंधों से ले जाये जाने वाले अंधों के सदृश वे
मूढ जंघन्य हैं। अनेक प्रकार से अविद्या में पडे हुए वे बाल सदृश
ऐसा कहते हैं कि हम कृतार्थ हैं। क्योंकि उनको कर्मों में राग रहने

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६८ सौन्दर्य लहरी
के कारण वैराग्य नहीं होता, उससे आतुर वे लोग क्षीणपुण्य होने
पर स्वर्ग से गिरा दिये जाते हैं। इष्टापूर्त कर्मों को श्रेष्ठ मानने
वाले वे मूढ यह समझते हैं कि उससे अन्य कोई श्रेय का मार्ग
नहीं है। वे स्वर्ग में अपने पुण्यों को भोग कर इस लोक में अथवा
इससे भी हीनतर लोकों में प्रवेश करते हैं। परन्तु जो तप और
श्रद्धा से युक्त होकर बनों में रहते हैं, शांत हैं, विद्वान हैं और भिक्षा
से जीवन निर्वाह करते हैं, वे निष्पाप होकर सूर्यद्वार (सुषुम्ना मार्ग)
अथवा देवयान मार्ग से वहां जाते हैं, जहां वह अमर अविनाशी
परम पुरुष मिलता है।
यज्ञायागादि कर्मों के अनुष्ठान और कूपतडाग धर्मशाला इत्यादि
का बनवाना, ऐसे इष्टापूर्त कर्मों से स्वर्ग की प्राप्ति होती है,
मोक्ष नहीं मिलती। स्वर्ग में अपने-अपने पुण्यार्जित भोगों के समाप्त
होने पर वहां से उनको इस मर्त्यलोक में गिरा दिया जाता है।
इसलिये सब सकाम अनुष्ठान और यज्ञों के कर्मकांड का विस्तार
अविद्या कहलाता है। कर्मेष्ठी मनुष्य कर्म को ही मोक्ष का साधन
जानते हैं और उनके अनुष्ठानों में आसक्ति के साथ लगे रहते हैं
उनके हृदयों में अनेक कामनायें उठा करती हैं और भगवान के
भजन और अनेक प्रकार के अनुष्ठानों के द्वारा अपनी कामनाओं
की पूर्ति मांगा करते हैं। इस प्रकार मोहांधकार से उनका अन्तः
करण अन्धकार मय रहता है, यद्यपि वे शास्त्रीय ज्ञान के धुरन्धर
पंडित क्यों न हों। जब तक मन की वृत्तियां बहिर्मुखी रहती हैं,
आत्मज्ञान का प्रकाश नहीं दिखता।

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सौंदर्य लहरी ६९
कुण्डलिनी शक्ति जाग कर जब सुषुम्ना पथ में छहों चक्रों का
बेध करती हुई सहस्रार में शिवसायुज्य पद पर आरूढ होने जाती
है, तब प्रतिप्रसव क्रम द्वारा सब इन्द्रियों को अन्तर्मुखी कर देती
है, मन के परों को काट डालती है, और बुद्धि को जगत के
बहिर्चिन्तन से विश्रांति देने लगती है, और अन्तरात्मा रूपी सूर्य
पर छाये हुए बादल एक-एक कर के विलीन होने लगते हैं।
'हृद्याकाश निर्मल और स्वच्छ हो जाता है और ज्ञान का प्रकाश
अन्तराकाश में पूर्ण तेज से युक्त होकर चमकने लगता है। अविद्या का
गाढ अन्धकार फट जाता है और अन्धेरे में बसेरा करने वाली
वासना रूपी चिमगीदडों अथवा काम क्रोधादि उल्लूकों के ठहरने
का कहीं स्थान नहीं रहता, और वे वहीं बैठे बैठे ज्ञान रूपी
सूर्य के तेज से समाप्त हो जाते हैं। इसी अभिप्राय से शंकर
भगवत्पद् कहते हैं कि भगवती अविद्यांधकार को नष्ट करने के लिये
ज्ञानरूपी सूर्य का उद्दीपन करती है। दूसरा भाव यह भी है कि सूर्य
मण्डल में अधोमुखी सूर्य शक्ति जागरण के पश्चात उन्मुख होकर
अमृत का स्राव करने लगता है और परिणाम स्वरूप बहिर्विषयों की
वासनायें स्वयं शांत हो जाती हैं। उसका फल यह होता है कि
कर्मानुष्ठानों में रत, अविद्या के अन्धकार में पड़े हुए कर्मकांडी
बहिरा्नुष्ठानों का तिरस्कार कर के अन्तर्याग में लग जाते हैं।
क्योंकि भगवती की चिन्मयी वाटिका के पुष्पों से प्रवाहित मधुर
मकरन्द के स्रोतों के झरने जड लोगों की जडता को भी द्रवीभूत
करने का सामर्थ्य रखते हैं। भगवती की चिन्मयी सत्ता ही तो
नाना भेद रूपा सृष्टि के प्रभव काल में स्थूल सूक्ष्म जगत् का
स्वांग भर लेती है, और प्रतिप्रसव क्रम के आरम्भ होने पर सब नाम

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७० सौंदर्य लहरी
रूपों को अपने में विलीन करती हुई शिव के निष्कल रूप से
सायुज्यता का आलिंगन कर के स्वयं शिव स्वरूप हो जाती है ।
जीव की जडता पानी होकर बह जाती है और वह चैतन्य गंगा में
स्नान करने लगता है ।
आत्मा असंग है, उसका जड प्रकृति अथवा उसके विकारों से
तादात्म्य नहीं होता । स्थूल सूक्ष्म शरीर पर आत्मा की चेतना का
प्रकाश अवश्य दृष्टिगोचर होता है, परन्तु आत्मा कभी शरीर नहीं
बनता, वह सदा असंग है । देहाभिमान द्वारा केवल भ्रांति मात्र का
स्फुरण हो उठा है कि मैं देह हूं । क्या चेतन स्वरूप आत्मदेव
कभी जड देह बन सकता है ? यदि वह देह बन गया होता तो
जागरण में अनुभव में आने वाला शारीरिक कष्ट स्वप्न में भी बना
रहना चाहिये था, परन्तु वह ही एक आत्मा जागृत और स्वप्ना-
वस्था के सुखदुःख अलग-अलग भोगता है, और गाढ निद्रा में
सब छूट जाते हैं । तीनों अवस्थाओं का पृथक-पृथक योग होने से
उनके भोगों की अनुभूति भी पृथक २ होती है । स्वभाव से असंग
[L

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सौंदर्य लहरी ७०
है, और कोई कोई इतने तितिक्षु होते हैं कि महान कष्टों की भी
परवाह नहीं करते, उनमें जडता कम समझनी चाहिये । शरीर के
योग से ही आत्मा का स्वाभाविक आनन्द स्वरूप तिरोहित हो
गया है । जितना मनुष्य देहवृत्ति का त्याग कर के आत्मस्थिति में
ऊंचा उठ जाता है, उसे शारीरिक कष्ट उतना ही कम मन्ताप
पहुंचाते हैं, और उसके आनन्दानुभव की वृद्धि होती है। कुण्डलिनी
शक्ति जागकर पांचों तत्वों और मन का बेध कर के जड चेतन की
ग्रंथियों को खोल देती है, तब साधक का देहाध्यास शिथिल हो
जाने पर वह आत्मस्थिति की उच्च भूमिकाओं का अनुभव करने
लगता है और आनन्द की लहरें उसकी प्रत्येक नाडी में प्रवाहित
होने लगती हैं ।
चैतन्यस्तबक मकरन्दस्रुतिझरी का संकेत मधुप्रतीका भूमिका के
लिये भी हो सकता है, जो ऋतंभरा प्रज्ञा के उदय होने पर आती है।
चैतन्य का अर्थ मंत्र-चैतन्य भी ग्रहण किया जा सकता है, उस पक्ष
में श्री विद्या के मंत्र को स्तबक और मंत्र के अनुष्ठान द्वारा
कुण्डलिनी शक्ति के जागरण से प्राप्त होने वाले दिव्यानन्दावेश का
प्रवाह मकरन्द के स्रोत की झरी से उपमित किया जा सकता है । मंत्र
चैतन्य का लक्षण योगशिखोपनिषद् में इस प्रकार कहा गया है ।
यदानुध्यायते मंत्रं गात्रकंपोऽथ जायते । ७० ।
अर्थात् जब मंत्र का ध्यान किया जाता है, तब गात्रों में कंप
का अनुभव होना चाहिये । कंप शक्ति के सक्रिय होने पर हुआ
करते हैं, और उस कंप में दिव्यानन्द की लहरें प्रवाहित होती हुई

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७२ सौन्दर्य लहरी
अनुभव में आती हैं, जिससे सिर में आत्मानन्द की मस्ती प्रदान
करने वाला नशा सा चढ जाता है । मंत्र चैतन्य का अर्थ मंत्रयोग
द्वारा शक्ति का जागरण ही समझना चाहिये । कुण्डलिनी शक्ति के
जागने पर शरीर की जडता, आलस्य, भारीपन इत्यादि दोष तत्क्षण
दूर हो जाते हैं। श्री विद्या के अक्षरों की चिन्तामणियों से और मंत्र की
चिन्तामणियों की माला से भी उपमा दी जा सकती है । भगवती का
अनुग्रह मुमुक्षुओं को मोक्ष देता है और सकाम उपासना करने वालों
की अभीप्सित् कामनाओं को पूर्ण करता है, इसलिये कहा
है कि भगवती दरिद्रियों के लिये चिन्तामणियों की माला के
सदृश है । एक चिन्तामणि इन्द्र लोक में है जो कल्प वृक्ष के सदृश
सब ही कामनाओं को पूर्ण करती है, परन्तु पंचदशी मंत्र में १५
और षोडशी में १६ अक्षर उतनी ही चिन्तामणियों के तुल्य हैं,
जो उपासकों की सब ही कामनाए पूर्ण करते हैं ।
इस श्लोक से हादिविद्या का प्रथम कूट इस प्रकार उद्धृत किया
जा सकता है । मिहिर से हकार, मकरंद की सोमसदृश उपमा से
सकार, चिन्तामणि से सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला ककार
और वराहावतार के महीउद्धार सदृश पृथिवी बीज का लकार
और 'भगवती' पद से भगवती का साक्षात् हृल्लेखा अक्षर समझना
चाहिये, एक कूट सिद्ध होने से पूरा मंत्र ग्रहण किया जा सकता है
क्योंकि इस विद्या के तीनों कूट इन ही अक्षरों से बनते हैं। आगे
चल कर श्लोक ३२ के नीचे यह दिखायेंगे कि शंकर भगवत्पाद् की
इष्ट विद्या हादि विद्या ही थी । इसलिये इस श्लोक में भगवती के
गुणानुवाद के साथ-साथ उस विद्या का रूप भी बता दिया गया

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है । हादि विद्या से ही चतुष्कूटी शांकरी विद्या का भी निर्माण
होता है, और त्रैलोक्य मोहन कवच में उससे पाताल लोक से रक्षा
होने का उल्लेख मिलता है, इसलिये यहां ‘मुररिपुवराहस्यदंष्ट्रा’
कहने से स्पष्ट हादि विद्या की ओर संकेत दिख पडता है ।
भगवान ने मुर राक्षस का वध किया था, इसलिये उनका
एक नाम मुरारि अथवा मुररिपु भी प्रसिद्ध है, इसलिये मुररिपुवराह
का अर्थ वाराह अवतार है । भगवान ने वराह का रूप धारण कर
के पाताल से दांतों पर भूमि को उठाकर ऊपर निकाला था और
उसे उसके स्थान पर अपनी आधार शक्ति प्रदान कर के स्थापित
किया था । उसी प्रकार कुण्डलिनी रूपी आधार शक्ति के जागने पर
भगवती जन्म मरण रूपी संसार सागर में डूबे हुओं का उद्धार
करती है । वाराह भगवान का बीज मंत्र ‘हूं’ है अर्थात हूं बीज
का प्रयोग करने से जो शक्ति उत्पन्न होती है, वह वाराह भगवान
के दांत के सदृश जीवों को संसार सागर से बाहर निकाल लेती है ।
मुरारि विष्णु भगवान ने वराह अवतार धारण कर के पाताल में
मुररिपुवराहस्य धसती हुई पृथिवी को उबारा था । मूला-
दंष्ट्रा धार पृथिवी तत्व का स्थान है और चरण पाताल
के स्थान माने जाते हैं । जीव ने पार्थिव शरीर
में अध्यस्त होकर अपने को अन्धकार में डाल रखा है, जितना-
जितना वह मूलाधार से ऊपर उठता जाता है, उसका अध्यास सूक्ष्म
होता जाता है और सहस्रार में पहुंचकर सर्वथा मुक्त हो जाता है ।
इसलिये जन्ममरण रूपी संसार की पाताल रूपी दल-दल से
निकलने के लिये, उसे भगवती की वैष्णवी बाराही शक्ति का

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५४ सौंदर्य लहरी
आश्रय लेना चाहियें। वाराही शक्ति अथवा वाराही विद्या का
वर्णन वाराहोपनिषत् में मिलता है, वहां ब्रह्म विद्या को ही वाराही
विद्या कहा है। देखें वाराहोपनिषत् (अतस्त्वद्रूपप्रतिपादितां
ब्रह्मविद्यां ब्रूहीति हो वाच) (१,१) अर्थात् ऋभु ऋषि वाराह
भगवान से प्रार्थना करते हैं कि आप अपने रूप से प्रतिपादित
ब्रह्म विद्या कहिये । भावनोपनिषत् में वाराही शक्ति को पिता समान
दिखाया है, देखें परिशिष्ठ (१)। मूलाधार से भी नीचे अधिक
अन्धकार के स्थान हैं। मूलाधार और स्वाधिष्ठान को अन्धकारमय
आग्नेय मंडल माना जाता है। यदि शरीराध्यास की वृद्धि होती
जाय तो जीव अधिकाधिक जडता में उतरता जाता है। पातालादि
निम्न लोको को घनांधकारमय माना जाता है। ईशावास्योपनिषत्
में यह बात यजुर्वेदीय निम्नोद्धुत मंत्र द्वारा इन शब्दों में
कही गई है।
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसा वृताः ।
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ ३ ॥
अर्थः- अन्धकार से आवृत्त जो आसुरी लोक हैं, उनको
आत्म हनन करने वाला मनुष्य मरकर जाता है।
जड पार्थिव शरीर में आत्म भावना के दृढ अध्यास को ही
यहां आत्म हनन कहा गया है। आत्म स्वरूप को जानने के लिये
इस अध्यास से उभरना अनिवार्य है और वाराही शक्ति का आश्रय
लेकर उससे ऊपर उठा जा सकता है, यह भाव इस श्लोक की
अन्तिम पङ्क्ति में दिखाया गया है।

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सौंदर्य लहरी ७५
[ ४ ]
त्वदन्यःपाणिभ्यामभयवरदो दैवतगण-
स्त्वमेका नैवासि प्रकटितवराभीत्यभिनया ।
भयात्त्रातुं दातुं फलमपि च वांछासमधिकं
शरण्ये लोकानां तवहि चरणावेव निपुणौ ॥
अर्थः— तेरे सिवाय अन्य सब देवतागण दोनों हाथों के
अभिनय से अभयदान और वरदान देते हैं । तू ही एक ऐसी है
जो अभयदान अथवा वरदान देते समय हाथों का अभिनय नहीं
करती । भय से त्राण करने में और वांछा के अनुकूल वर प्रदान
करने में, हे लोकों की शरण्ये ! तेरे दोनों चरण ही निपुण हैं ।
सं० टि०— इस श्लोक में भगवती की उपासना के लिये
'ऐं क्लीं सौः' इस बाला मंत्र का संकेत है, जो भुक्ति मुक्ति
दोनों देता है ।
देवता दो प्रकार से अनुग्रह करते हैं, १. अभयदान देकर
और २. वरप्रदान करके । वरदान से मनो-
वर अभिनय वाञ्छित् कामना की सिद्धि होती है । दोनों प्रकार
के अनुग्रहों को हाथों के अभिनय से प्रकट किया जाता है । दक्षिण
हाथ उठा कर अभयद् अभिनय किया जाता है और बायें हाथ को
जैसे सिर पर रखते हैं, नीचे झुकाकर कामना सिद्धयर्थ वरद् अभिनय
किया जाता है । सब देवता और सब गुरुजन इस प्रकार ही

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७६ सौंदर्य लहरी
अनुग्रह करने की इच्छा से दोनों हाथों के अभिनयों द्वारा अपनी
इच्छा प्रकट किया करते हैं। परन्तु भगवती की शरण में सब लोक
हैं, भक्त में शरणागति का भाव उदय होते ही, उसकी कामना पूर्ण
होती है। और भगवती चारों हाथों में इक्षुधनुः, ५ बाण, और
अंकुश एवं पाश धारण किये हुए है इसलिये वह हाथों का अभिनय
नहीं करती, परन्तु दोनों चरण ही भय से रक्षा करने में और सब
कामनाओं के लिये सिद्ध वरदान देने में निपुण हैं। कराभिनय
द्वारा वर देने की इच्छा को किसी प्रकार प्रकट करने की क्या आव-
श्यकता है? जो मनुष्य अनन्य भाव से शरण में आता है उसकी
सब कामनाएं स्वयं पूर्ण हो जाती हैं और सब प्रकार के भयों से
उसकी रक्षा हो जाती है।
दारिद्रय दुःख भय हारिणी का त्वदन्या,
सर्वोपकार करणाय सदार्द्रचित्ता।
शास्त्रों में भगवती को अग्नि के रूप से हवन द्वारा प्रसन्न करने
का विधान देखने में आता है। जंगलों में हिंसक पशुओं के भय
से रक्षा के लिये प्रज्वलित अग्नि रखी जाती है। अग्नि की समक्षता
से मनुष्य में अभय की भावना स्वतः जाग उठती है, यह सबका
अनुभव है। अंधकार में भय लगता है, दीपक रहने पर भय नहीं
लगता। रक्षार्थ दिग्बंधन के मन्त्र द्वारा भी प्रज्वलित अग्नि के परि-
कोट की भावना की जाती है। यथा:-
नमो भगवति ज्वाला मालिनी देवदेवि सर्व भूत संहार-
कारिके जातवेदसि ज्वलंति ज्वल २ प्रज्वल २ व्हां व्ह्रीं व्हूं
र र र र र र र हं फट स्वाहा, इति परितो वह्निः परकारं ध्यायेत।

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सौंदर्य लहरी ७७
सब भयों का एक मात्र कारण यह दुःखालय संसार ही है।
भय का मूल यद्यपि विश्व में प्रकृति की रचना सौन्दर्य का
कारण घर है । ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति देवी
ने अपने स्वाभाविक सौंदर्य का प्रदर्शन करने के
लिये ही इस विश्व की रचना की है । तारागण रूपी हीरे माणिक्यों
से जटिल आकाश जिसका मुकुट है, तेजःपुंज सूर्य चन्द्र और अग्नि
जिसके तीन नेत्र हैं, अन्तरिक्ष जिसका वक्षःस्थल और विश्व की
चित्रविचित्र विविध रचनायें जिसके श्रृंगार हैं, और जिसके रूप-
लावण्य की छाया सर्वत्र बसी हुई है, जिसकी अंगप्रभा सर्वत्र चमक
रही है, ऐसा यह विश्व उस भगवती के समस्त सौंदर्य राशि का
विकास ही तो है । विश्व की एक-एक गौणकृति की चमकदमक पर
पतंगवत मनुष्य मोहित हो जाता है । क्यों न हो ? सौंदर्य का
भूखा, आनन्द का प्यासा यह जीव एक-एक अणु की प्रभा में इतना
आसक्त हो जाता है कि उसकी दृष्टि प्रकृति देवी के समष्टि सौंदर्य
तक पहुंच पाती ही नही, उसकी एक देशीय मोहासक्ति ही उसके
दुःख का कारण बन जाती है । दीपक ही पतंग की मृत्यु का कारण
हो जाता है ।
अग्नि भगवती का साक्षात् स्थूल स्वरूप है । भगवती के एक
प्रणव का रूप ऐं भी है । 'ऐं' अग्नि तत्व का
बाला मंत्र अक्षर है, और सुषुम्ना नाडी से संबंधित है,
सुषुम्ना को भी आग्नेय माना जाता है । ऐं बीज को वाक् बीज
भी कहते हैं, वाक् शक्ति को भी अग्निमयी कहते हैं । 'तेजोमयी
वाक्' ऐसी श्रुति है । ऐं का त्रिकोणाकृति भाग शक्ति का द्योतक

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७८ सौन्दर्य लहरी
है। भगवती का तीसरा नेत्र जो भ्रुकुटि के ऊपर स्थित है, वह भी
अग्नेय है, जिसके एक कटाक्ष से संसार रूपी भवसागर के भय से
मुक्ति मिलती है। इसलिये ब्रम्हाजी ने मधु कैटभ से भयभीत होकर
इस ही बीज द्वारा भगवती की आराधना की थी। कामनाओं की
सिद्धि के लिए काम बीज का प्रयोग किया जाता है। जिसके गर्भ
में आद्योपान्त सारा विश्व है। (देखें श्लोक १९.)
भगवती के दोनों चरण सर्वशक्तिसामर्थ्य युक्त हैं, उनका
प्रतीक सौः बीज समझा जाना चाहिये। 'स' अक्षर शक्ति वाचक
माना जाता है, दो सकारों के लिये द्विवचनान्त 'सौ' पद दोनों
चरणों का संकेत करता है, विसर्ग भी शक्ति का ही द्योतक है।
इस प्रकार सौः बीज से भगवती के दोनों चरणों की सर्व शक्ति-
मत्ता प्रकट होती है। और तीनों बीजों से बाला का सब भयों
से मुक्ति और मन वांछित कामनाओं की सिद्धिदे ने वाला मंत्र सिद्ध
होता है। ऐसे ही नवार्ण मंत्र को भी जानना चाहिये।
काम देव सब प्रकार के मोहों का राजा है, जो तपस्वी ज्ञानियों
के चित्त पर भी प्रहार किये बिना नहीं रहता। मुमुक्षुओं को उससे
अपनी रक्षा करने के लिये, सब भयों से त्राण करने वाले भगवती
के चरणों की ही शरण में जाना चाहिये, दूसरा कोई मार्ग बचने
का नहीं है। यह बात आगे के तीन श्लोकों द्वारा कही गई है।
[५]
हरिस्त्वामाराध्य प्रणतजनसौभाग्यजननीं
पुरा नारी भूत्वा पुररिपुमपि क्षोभमनयत् ।

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सौंदर्य लहरी ७९
स्मरोऽपि त्वां नत्वा रतिनयनलेह्येन वपुषा
मुनीनामप्यन्तः प्रभवति हि मोहाय महताम् ॥
अर्थः— हरि (विष्णु भगवान) ने पूर्व काल में, प्रणत
जनों को सौभाग्य प्रदान करने वाली तेरी आराधना कर के नारी
का मोहिनी रूप धारण कर, त्रिपुरारि महादेव के भी चित्त
में काम का क्षोभ उत्पन्न कर दिया था। और काम देव स्मर
भी तुझ को नमन करने के कारण ही अपनी पत्नी रति के
नयनों द्वारा चुंबन किये जाने वाले शरीर से बडे बडे मुनियों
के भी अन्तःकरण में मोह उत्पन्न कर देता है।
सं० टि० श्री अच्युतानन्दजी प्रणतजनसौभाग्यजननीं को प्रणत-
जनसौभाग्यजननि ईं पढकर श्लोक का अर्थ इस प्रकार करते हैं:—
हे प्रणत जन सौभाग्य जननि हरि तेरी ईं रूप से आराधना कर के
मोहनी का रूप ग्रहण करते हैं। ईं काम कला है और कादि विद्या
का तीसरा अक्षर है और अनुस्वार (शिव) सहित माया, लक्ष्मी
और काम बीजों में रहता है। इस श्लोक से साध्य सिद्धासन विद्या
(ह्रीं क्लीं ब्लैं) का उद्धरण किया जाता है।
पुराणों की गाथा के अनुसार देवता और असुरों ने मिलकर
समुद्र का मथन किया था, मथन करने पर समुद्र से अनेक पदार्थे
निकले, जिनके साथ अमृत और हलाहल विष भी निकले थे,
अमृत के बटवारे के लिये दोनों में विवाद उपस्थित हुआ इस पर
विष्णु भगवान ने मोहिनी रूप धारण किया और अमृत का कलश

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८० सौन्दर्य लहरी
लेकर उसके बांटने का काम करने लगे। देव और असुरों को
अलग-अलग दो पंक्तियों में बिठा दिया गया। मोहिनी के नेत्रों
के कटाक्षों और अंगों के हावभावों से सब असुर मोहित हो गये
और सारा अमृत देवताओं को बांट दिया गया। वे अमृत पीकर
अमर हो गये और असुर मर्त्य रह गये । अमृत के पूर्व जो हला-
हल निकला था, उसके प्रभाव से जब सारा विश्व जलने लगा, तब
देव और असुर दोनों ही घबरा गये, उस समय करुणा सागर
शंकर भगवान ने उसे पान कर के सब की रक्षा की थी, इसके
पश्चात् शंकर एकांत में जाकर समाधिस्थ होकर बैठ गये । उठने
पर उन्होंने जब मोहिनी रूप द्वारा असुरों के ठगे जाने की बात
सुनी, तब विष्णु भगवान से उस मोहिनी रूप को देखने की इच्छा
प्रगट की। भगवान ने वह रूप फिर शंकर को भी दिखाया । उसे
देखकर शंकर इतने मोहातुर हुए कि काम के क्षोभ से अपने को
भूलकर मोहिनी के पीछे दौड़ने लगे ।
पुरा काल में कश्यप नाम के एक प्रजापति थे, वे कश्यप सागर
के तट पर रहा करते थे । शायद वह कश्यप सागर योरोप और
एशिया के मध्यवर्ती मधुर जलयुक्त महान सरोवर आधुनिक कैस्पियन
सी ही हो । इसलिये इस पौराणिक गाथा को उस युग का स्मारक
कहा जा सकता है, जब आर्य जाति मध्य एशिया में निवास करती
थी। कश्यप देव की दो स्त्रियां थीं—दिति और अदिति । दिति
की सन्तान दैत्य अर्था असुर हुए और अदिति की देव । पश्चिम में
रहने वाली अनार्य जातियां दैत्य कहलाती थीं, और आर्य जाति के
लोग देव कहलाते थे । दैत्यों को संस्कृत में दानव भी कहते हैं ।