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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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६२ सौंदर्य लहरी
तीनों गुणों की साम्यावस्था रहती है। विषमावस्था में वह ही
महत् तत्व कहलाता है, परन्तु वह आधुनिक वैज्ञानिकों की सृजन
शक्ति (Cosmic-Energy) से सूक्ष्म तत्व है, क्योंकि मन और
इंद्रियां भी उसी के विकार हैं। (Psychic Forces) अर्थात
मानसिक शक्तियां भौतिक सृजन शक्ति (Cosmic-Energy) के
विकार नही समझे जाते। वेदांत सृष्टि का आदि कारण ईश्वर की
इच्छा शक्ति को मानता है और जड प्रधान कारणवाद और
अणुवाद दोनों का खंडन करता है, परन्तु इस श्लोक में शंकर
भगवत्पाद ने तीनों वादों का समन्वय करते हुये वेदान्त के इच्छा
शक्ति वाद का ही समर्थन किया है।
'पांसु' अणुवाद की ओर संकेत करता है, 'चरण पंकेरुह'
जड प्रधान कारणवाद की ओर, और 'तव' पद महा त्रिपुर सुन्दरी
इच्छाशक्ति की ओर संकेत करता है। भगवती के चरणों को कमलों
से उपमा दी गई है, कमल कीचड में उत्पन्न होता है, इसलिये उसको
'पंकेरुह'—अर्थात कीचड में उत्पन्न हुआ कहा गया है। यहां
इच्छाशक्ति को तमोगुण की शक्ति होने के कारण, उसके घनीभूत
होने पर जडावस्था में परिणत होने को पंक से उपमित किया है
और उस घनीभूत तमोगुणी इच्छाशक्ति की स्थूल कीचड से जो
कमल खिलते हैं, वे ही सद् और असद् विद्या-रूपी दो चरण है।
उनकी धूल कमलों की रज है। रज तो बाहर से चरणों पर जम
जाती है, परन्तु जैसे कमलों की पराग रूपी रज कमल से ही उत्पन्न
होती है, वैसे ही यह पांसु कण भगवती के चरणों से उद्भूत है।
अर्थात इच्छाशक्ति की स्थूल घनीभूत अवस्था प्रधान कारणवादियों