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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 107 of 415

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Page 107

सौन्दर्य लहरी १७

उसका सब विस्तार अविद्यामय ही है, उससे ब्रह्मप्राप्ति नहीं
होती। ब्रह्मप्राप्ति के जिज्ञासु मुमुक्षु उसका परित्याग करके पराविद्या
की शरण ग्रहण करते हैं और वे पराविद्या के अन्वेषक ही विद्वान
कहलाने के योग्य हैं।
प्लवाह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म ।
एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापियन्ति ॥ मु.(१.२:७)
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पंडितं मन्यमानाः ।
जंघन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥८
अविद्यायां बहुधा वर्तमाना वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बालाः ।
यत्कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात्तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥९
इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः ।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥१०
तपःश्रद्धे येह्युपवसंत्यरण्ये शांता विद्वांसो भैक्षचर्या चरन्तः ।
सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतःस पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥११
अर्थः—ये १८ प्रकार के यज्ञयागादि अनुष्ठान अदृढ और
अस्थिर हैं, और उनमें जो कर्म किये जाते हैं, वे श्रेय नहीं । जो
मूढ इनको श्रेय समझ कर उनमें आनंदित होते हैं, वे जरामृत्यु में
बार-बार आते हैं। अविद्या में पडे हुए, अपन को बुद्धिमान और
पंडित मानने वाले, अंधों से ले जाये जाने वाले अंधों के सदृश वे
मूढ जंघन्य हैं। अनेक प्रकार से अविद्या में पडे हुए वे बाल सदृश
ऐसा कहते हैं कि हम कृतार्थ हैं। क्योंकि उनको कर्मों में राग रहने