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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 117 of 415

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Page 117

सौंदर्य लहरी ७७
सब भयों का एक मात्र कारण यह दुःखालय संसार ही है।
भय का मूल यद्यपि विश्व में प्रकृति की रचना सौन्दर्य का
कारण घर है । ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति देवी
ने अपने स्वाभाविक सौंदर्य का प्रदर्शन करने के
लिये ही इस विश्व की रचना की है । तारागण रूपी हीरे माणिक्यों
से जटिल आकाश जिसका मुकुट है, तेजःपुंज सूर्य चन्द्र और अग्नि
जिसके तीन नेत्र हैं, अन्तरिक्ष जिसका वक्षःस्थल और विश्व की
चित्रविचित्र विविध रचनायें जिसके श्रृंगार हैं, और जिसके रूप-
लावण्य की छाया सर्वत्र बसी हुई है, जिसकी अंगप्रभा सर्वत्र चमक
रही है, ऐसा यह विश्व उस भगवती के समस्त सौंदर्य राशि का
विकास ही तो है । विश्व की एक-एक गौणकृति की चमकदमक पर
पतंगवत मनुष्य मोहित हो जाता है । क्यों न हो ? सौंदर्य का
भूखा, आनन्द का प्यासा यह जीव एक-एक अणु की प्रभा में इतना
आसक्त हो जाता है कि उसकी दृष्टि प्रकृति देवी के समष्टि सौंदर्य
तक पहुंच पाती ही नही, उसकी एक देशीय मोहासक्ति ही उसके
दुःख का कारण बन जाती है । दीपक ही पतंग की मृत्यु का कारण
हो जाता है ।
अग्नि भगवती का साक्षात् स्थूल स्वरूप है । भगवती के एक
प्रणव का रूप ऐं भी है । 'ऐं' अग्नि तत्व का
बाला मंत्र अक्षर है, और सुषुम्ना नाडी से संबंधित है,
सुषुम्ना को भी आग्नेय माना जाता है । ऐं बीज को वाक् बीज
भी कहते हैं, वाक् शक्ति को भी अग्निमयी कहते हैं । 'तेजोमयी
वाक्' ऐसी श्रुति है । ऐं का त्रिकोणाकृति भाग शक्ति का द्योतक