सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी ६५
“ अग्निरिति भस्म, वायुरिति भस्म, जलमिति भस्म, स्थलमिति
भस्म, व्योमेति भस्म, देवा भस्म, ऋषयो भस्म, सर्वे ह वा एतादिदं भस्म,
पूतं पावनं नमामि सद्यः समस्ताध शासकम् ! ”
श्लोक में 'पांसुं', 'एनं' शब्दों में एकवचन का प्रयोग किया
गया है, न कि बहुवचन का । इसका अभिप्राय यह भी हो सकता
है कि प्रत्येक अणु में भगवती के चरण हैं ।
वह है विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखी विश्वतोहस्ता उत विश्वतस्पात् ॥
अर्थात् प्रत्येक परमाणु अनन्त शक्ति से परिपूर्ण है ।
तीसरे श्लोक में यह बताया गया है, कि भगवती की उपासना
मुमुक्षुओं के अज्ञान का नाश करती है और सकाम उपासकों की
सब कामनायें पूर्ण करती हैं। अर्थात् भगवती भुक्ति और मुक्ति
दोनों प्रदान करती है ।
[ ३ ]
अविद्यानामन्त स्तिमिर मिहिरोद्दीपन¹करी
जडानां चैतन्यस्तबकमकरन्दस्रुतिझरी ।
दरिद्राणां चिन्तामणिगुणनिका जन्म जलधौ
निमग्नानां दंष्ट्रा मुररिपुवराहस्य भवती ॥
१. पाठान्तर:-( द्वीप नगरी )