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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 110

७० सौंदर्य लहरी
रूपों को अपने में विलीन करती हुई शिव के निष्कल रूप से
सायुज्यता का आलिंगन कर के स्वयं शिव स्वरूप हो जाती है ।
जीव की जडता पानी होकर बह जाती है और वह चैतन्य गंगा में
स्नान करने लगता है ।
आत्मा असंग है, उसका जड प्रकृति अथवा उसके विकारों से
तादात्म्य नहीं होता । स्थूल सूक्ष्म शरीर पर आत्मा की चेतना का
प्रकाश अवश्य दृष्टिगोचर होता है, परन्तु आत्मा कभी शरीर नहीं
बनता, वह सदा असंग है । देहाभिमान द्वारा केवल भ्रांति मात्र का
स्फुरण हो उठा है कि मैं देह हूं । क्या चेतन स्वरूप आत्मदेव
कभी जड देह बन सकता है ? यदि वह देह बन गया होता तो
जागरण में अनुभव में आने वाला शारीरिक कष्ट स्वप्न में भी बना
रहना चाहिये था, परन्तु वह ही एक आत्मा जागृत और स्वप्ना-
वस्था के सुखदुःख अलग-अलग भोगता है, और गाढ निद्रा में
सब छूट जाते हैं । तीनों अवस्थाओं का पृथक-पृथक योग होने से
उनके भोगों की अनुभूति भी पृथक २ होती है । स्वभाव से असंग
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