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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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है । हादि विद्या से ही चतुष्कूटी शांकरी विद्या का भी निर्माण
होता है, और त्रैलोक्य मोहन कवच में उससे पाताल लोक से रक्षा
होने का उल्लेख मिलता है, इसलिये यहां ‘मुररिपुवराहस्यदंष्ट्रा’
कहने से स्पष्ट हादि विद्या की ओर संकेत दिख पडता है ।
भगवान ने मुर राक्षस का वध किया था, इसलिये उनका
एक नाम मुरारि अथवा मुररिपु भी प्रसिद्ध है, इसलिये मुररिपुवराह
का अर्थ वाराह अवतार है । भगवान ने वराह का रूप धारण कर
के पाताल से दांतों पर भूमि को उठाकर ऊपर निकाला था और
उसे उसके स्थान पर अपनी आधार शक्ति प्रदान कर के स्थापित
किया था । उसी प्रकार कुण्डलिनी रूपी आधार शक्ति के जागने पर
भगवती जन्म मरण रूपी संसार सागर में डूबे हुओं का उद्धार
करती है । वाराह भगवान का बीज मंत्र ‘हूं’ है अर्थात हूं बीज
का प्रयोग करने से जो शक्ति उत्पन्न होती है, वह वाराह भगवान
के दांत के सदृश जीवों को संसार सागर से बाहर निकाल लेती है ।
मुरारि विष्णु भगवान ने वराह अवतार धारण कर के पाताल में
मुररिपुवराहस्य धसती हुई पृथिवी को उबारा था । मूला-
दंष्ट्रा धार पृथिवी तत्व का स्थान है और चरण पाताल
के स्थान माने जाते हैं । जीव ने पार्थिव शरीर
में अध्यस्त होकर अपने को अन्धकार में डाल रखा है, जितना-
जितना वह मूलाधार से ऊपर उठता जाता है, उसका अध्यास सूक्ष्म
होता जाता है और सहस्रार में पहुंचकर सर्वथा मुक्त हो जाता है ।
इसलिये जन्ममरण रूपी संसार की पाताल रूपी दल-दल से
निकलने के लिये, उसे भगवती की वैष्णवी बाराही शक्ति का

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