सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी ७९
स्मरोऽपि त्वां नत्वा रतिनयनलेह्येन वपुषा
मुनीनामप्यन्तः प्रभवति हि मोहाय महताम् ॥
अर्थः— हरि (विष्णु भगवान) ने पूर्व काल में, प्रणत
जनों को सौभाग्य प्रदान करने वाली तेरी आराधना कर के नारी
का मोहिनी रूप धारण कर, त्रिपुरारि महादेव के भी चित्त
में काम का क्षोभ उत्पन्न कर दिया था। और काम देव स्मर
भी तुझ को नमन करने के कारण ही अपनी पत्नी रति के
नयनों द्वारा चुंबन किये जाने वाले शरीर से बडे बडे मुनियों
के भी अन्तःकरण में मोह उत्पन्न कर देता है।
सं० टि० श्री अच्युतानन्दजी प्रणतजनसौभाग्यजननीं को प्रणत-
जनसौभाग्यजननि ईं पढकर श्लोक का अर्थ इस प्रकार करते हैं:—
हे प्रणत जन सौभाग्य जननि हरि तेरी ईं रूप से आराधना कर के
मोहनी का रूप ग्रहण करते हैं। ईं काम कला है और कादि विद्या
का तीसरा अक्षर है और अनुस्वार (शिव) सहित माया, लक्ष्मी
और काम बीजों में रहता है। इस श्लोक से साध्य सिद्धासन विद्या
(ह्रीं क्लीं ब्लैं) का उद्धरण किया जाता है।
पुराणों की गाथा के अनुसार देवता और असुरों ने मिलकर
समुद्र का मथन किया था, मथन करने पर समुद्र से अनेक पदार्थे
निकले, जिनके साथ अमृत और हलाहल विष भी निकले थे,
अमृत के बटवारे के लिये दोनों में विवाद उपस्थित हुआ इस पर
विष्णु भगवान ने मोहिनी रूप धारण किया और अमृत का कलश