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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 115 of 415

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Page 115

सौंदर्य लहरी ७५
[ ४ ]
त्वदन्यःपाणिभ्यामभयवरदो दैवतगण-
स्त्वमेका नैवासि प्रकटितवराभीत्यभिनया ।
भयात्त्रातुं दातुं फलमपि च वांछासमधिकं
शरण्ये लोकानां तवहि चरणावेव निपुणौ ॥
अर्थः— तेरे सिवाय अन्य सब देवतागण दोनों हाथों के
अभिनय से अभयदान और वरदान देते हैं । तू ही एक ऐसी है
जो अभयदान अथवा वरदान देते समय हाथों का अभिनय नहीं
करती । भय से त्राण करने में और वांछा के अनुकूल वर प्रदान
करने में, हे लोकों की शरण्ये ! तेरे दोनों चरण ही निपुण हैं ।
सं० टि०— इस श्लोक में भगवती की उपासना के लिये
'ऐं क्लीं सौः' इस बाला मंत्र का संकेत है, जो भुक्ति मुक्ति
दोनों देता है ।
देवता दो प्रकार से अनुग्रह करते हैं, १. अभयदान देकर
और २. वरप्रदान करके । वरदान से मनो-
वर अभिनय वाञ्छित् कामना की सिद्धि होती है । दोनों प्रकार
के अनुग्रहों को हाथों के अभिनय से प्रकट किया जाता है । दक्षिण
हाथ उठा कर अभयद् अभिनय किया जाता है और बायें हाथ को
जैसे सिर पर रखते हैं, नीचे झुकाकर कामना सिद्धयर्थ वरद् अभिनय
किया जाता है । सब देवता और सब गुरुजन इस प्रकार ही