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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 116

७६ सौंदर्य लहरी
अनुग्रह करने की इच्छा से दोनों हाथों के अभिनयों द्वारा अपनी
इच्छा प्रकट किया करते हैं। परन्तु भगवती की शरण में सब लोक
हैं, भक्त में शरणागति का भाव उदय होते ही, उसकी कामना पूर्ण
होती है। और भगवती चारों हाथों में इक्षुधनुः, ५ बाण, और
अंकुश एवं पाश धारण किये हुए है इसलिये वह हाथों का अभिनय
नहीं करती, परन्तु दोनों चरण ही भय से रक्षा करने में और सब
कामनाओं के लिये सिद्ध वरदान देने में निपुण हैं। कराभिनय
द्वारा वर देने की इच्छा को किसी प्रकार प्रकट करने की क्या आव-
श्यकता है? जो मनुष्य अनन्य भाव से शरण में आता है उसकी
सब कामनाएं स्वयं पूर्ण हो जाती हैं और सब प्रकार के भयों से
उसकी रक्षा हो जाती है।
दारिद्रय दुःख भय हारिणी का त्वदन्या,
सर्वोपकार करणाय सदार्द्रचित्ता।
शास्त्रों में भगवती को अग्नि के रूप से हवन द्वारा प्रसन्न करने
का विधान देखने में आता है। जंगलों में हिंसक पशुओं के भय
से रक्षा के लिये प्रज्वलित अग्नि रखी जाती है। अग्नि की समक्षता
से मनुष्य में अभय की भावना स्वतः जाग उठती है, यह सबका
अनुभव है। अंधकार में भय लगता है, दीपक रहने पर भय नहीं
लगता। रक्षार्थ दिग्बंधन के मन्त्र द्वारा भी प्रज्वलित अग्नि के परि-
कोट की भावना की जाती है। यथा:-
नमो भगवति ज्वाला मालिनी देवदेवि सर्व भूत संहार-
कारिके जातवेदसि ज्वलंति ज्वल २ प्रज्वल २ व्हां व्ह्रीं व्हूं
र र र र र र र हं फट स्वाहा, इति परितो वह्निः परकारं ध्यायेत।