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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 106

६६ सौन्दर्य लहरी
कठिन शब्दों के अर्थ.— अन्तस्तिमिर=हृदय अथवा अन्तःकरण
का अंधकार; मिहिर=सूर्य, चैतन्यस्तबक=ज्ञानरूपी चेतन गुलदस्ता;
स्रुति=स्रोत, प्रवाह; झरी=झरना; गुणनिका=माला; मुररिपुवराह=
विष्णु का बाराहावतार ।
अर्थ:—तू अविद्या में पडे हुओं को हृदयान्धकार को
हटाने के लिये (ज्ञानरूपी) सूर्य का उद्दीपन करने वाली है,
जड मनुष्यों के लिये चैतन्यस्तबक से निकलने वाले मकरन्द के
स्रोतों का झरना है, दरिद्रियों के लिये चिन्तामणियों की माला
है और जन्ममरण रूपी संगार सागर में डूबे हुओं को
विष्णु भगवान के वाराहावतार के दांत के सदृश उद्धार करने
वाली है ।
सं० टि०—शक्ति की उपासना से अज्ञान का नाश होता है,
दरिद्रियों को धन मिलता है, जडता का नाश होता है और वह
संसार सागर में डूबतों को सहारा है ।
मुण्डकोपनिषद में परा और अपरा नाम की दो प्रकार की
विद्या और विद्याओं का वर्णन है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद,
अविद्या अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द,
और ज्योतिष सबको अपरा विद्या के अन्तर्गत
माना गया है और जिस विद्या से ब्रह्म की प्राप्ति होती है, उसे परा विद्या
कहते हैं । अपरा विद्या के जानने वालों को विद्वान नहीं कहा
जाता, क्योंकि वे अविद्या में ही पडे रहते हैं । कर्मकांड और