सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी ६९
कुण्डलिनी शक्ति जाग कर जब सुषुम्ना पथ में छहों चक्रों का
बेध करती हुई सहस्रार में शिवसायुज्य पद पर आरूढ होने जाती
है, तब प्रतिप्रसव क्रम द्वारा सब इन्द्रियों को अन्तर्मुखी कर देती
है, मन के परों को काट डालती है, और बुद्धि को जगत के
बहिर्चिन्तन से विश्रांति देने लगती है, और अन्तरात्मा रूपी सूर्य
पर छाये हुए बादल एक-एक कर के विलीन होने लगते हैं।
'हृद्याकाश निर्मल और स्वच्छ हो जाता है और ज्ञान का प्रकाश
अन्तराकाश में पूर्ण तेज से युक्त होकर चमकने लगता है। अविद्या का
गाढ अन्धकार फट जाता है और अन्धेरे में बसेरा करने वाली
वासना रूपी चिमगीदडों अथवा काम क्रोधादि उल्लूकों के ठहरने
का कहीं स्थान नहीं रहता, और वे वहीं बैठे बैठे ज्ञान रूपी
सूर्य के तेज से समाप्त हो जाते हैं। इसी अभिप्राय से शंकर
भगवत्पद् कहते हैं कि भगवती अविद्यांधकार को नष्ट करने के लिये
ज्ञानरूपी सूर्य का उद्दीपन करती है। दूसरा भाव यह भी है कि सूर्य
मण्डल में अधोमुखी सूर्य शक्ति जागरण के पश्चात उन्मुख होकर
अमृत का स्राव करने लगता है और परिणाम स्वरूप बहिर्विषयों की
वासनायें स्वयं शांत हो जाती हैं। उसका फल यह होता है कि
कर्मानुष्ठानों में रत, अविद्या के अन्धकार में पड़े हुए कर्मकांडी
बहिरा्नुष्ठानों का तिरस्कार कर के अन्तर्याग में लग जाते हैं।
क्योंकि भगवती की चिन्मयी वाटिका के पुष्पों से प्रवाहित मधुर
मकरन्द के स्रोतों के झरने जड लोगों की जडता को भी द्रवीभूत
करने का सामर्थ्य रखते हैं। भगवती की चिन्मयी सत्ता ही तो
नाना भेद रूपा सृष्टि के प्रभव काल में स्थूल सूक्ष्म जगत् का
स्वांग भर लेती है, और प्रतिप्रसव क्रम के आरम्भ होने पर सब नाम