Skip to content
SarvaKosh
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 108 of 415

Read in context
Page 108

६८ सौन्दर्य लहरी
के कारण वैराग्य नहीं होता, उससे आतुर वे लोग क्षीणपुण्य होने
पर स्वर्ग से गिरा दिये जाते हैं। इष्टापूर्त कर्मों को श्रेष्ठ मानने
वाले वे मूढ यह समझते हैं कि उससे अन्य कोई श्रेय का मार्ग
नहीं है। वे स्वर्ग में अपने पुण्यों को भोग कर इस लोक में अथवा
इससे भी हीनतर लोकों में प्रवेश करते हैं। परन्तु जो तप और
श्रद्धा से युक्त होकर बनों में रहते हैं, शांत हैं, विद्वान हैं और भिक्षा
से जीवन निर्वाह करते हैं, वे निष्पाप होकर सूर्यद्वार (सुषुम्ना मार्ग)
अथवा देवयान मार्ग से वहां जाते हैं, जहां वह अमर अविनाशी
परम पुरुष मिलता है।
यज्ञायागादि कर्मों के अनुष्ठान और कूपतडाग धर्मशाला इत्यादि
का बनवाना, ऐसे इष्टापूर्त कर्मों से स्वर्ग की प्राप्ति होती है,
मोक्ष नहीं मिलती। स्वर्ग में अपने-अपने पुण्यार्जित भोगों के समाप्त
होने पर वहां से उनको इस मर्त्यलोक में गिरा दिया जाता है।
इसलिये सब सकाम अनुष्ठान और यज्ञों के कर्मकांड का विस्तार
अविद्या कहलाता है। कर्मेष्ठी मनुष्य कर्म को ही मोक्ष का साधन
जानते हैं और उनके अनुष्ठानों में आसक्ति के साथ लगे रहते हैं
उनके हृदयों में अनेक कामनायें उठा करती हैं और भगवान के
भजन और अनेक प्रकार के अनुष्ठानों के द्वारा अपनी कामनाओं
की पूर्ति मांगा करते हैं। इस प्रकार मोहांधकार से उनका अन्तः
करण अन्धकार मय रहता है, यद्यपि वे शास्त्रीय ज्ञान के धुरन्धर
पंडित क्यों न हों। जब तक मन की वृत्तियां बहिर्मुखी रहती हैं,
आत्मज्ञान का प्रकाश नहीं दिखता।