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सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

आरण्यक पर्व

आरण्यक पर्व
छठा अध्याय
पहला खंड
इन्द्र ज्येष्ठं न आ भर ओजिष्ठं पुपुरि श्रवः.
यद्धिधृक्षेम वज्रहस्त रोदसी उभे सुशिप्र पप्राः.. (१)
हे इंद्र! आप वज्रपाणि (हाथ में वज्र धारण करने वाले) हैं. आप सुंदर ठुड्डी वाले हैं.
आप हमें यश और बलदायी अन्न प्रदान कीजिए. आप हमें स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक दोनों
को पुष्ट बनाने वाला धन प्रदान कीजिए. (१)
इन्द्रो राजा जगतश्चर्षणीनामधि क्षमा विश्वरूपं यदस्य.
ततो ददाति दाशुषे वसूनि चोदद्राध उपस्तुतं चिदर्वाक्.. (२)
इंद्र चराचर व पृथ्वी की सभी वस्तुओं और धनों के स्वामी हैं. वे दानदाता को सब प्रकार
का धन देते हैं. अच्छी तरह स्तुति किए जाने पर वे पर्याप्त धन देते हैं. (२)
यस्येदमा रजायुजस्तुजे जने वन ३४ स्वः. इन्द्रस्य रन्त्यं बृहत्.. (३)
तेजस्वी इंद्र का दान दानियों और स्वर्ग दोनों में प्रशंसनीय है. इंद्र का दान श्रेष्ठ और
संतोष देने वाला है. (३)
उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यम ३४ श्रथाय.
अथादित्य व्रते वयं तवानागसो अदितये स्याम.. (४)
हे वरुण! आप ऊपर और नीचे की ओर के बंधनों को हम से दूर कीजिए. आप हमारे
सारे बंधनों को शिथिल कीजिए. जिस से हम आप के विधिविधान के अनुसार चल कर पाप
और कष्ट रहित जीवन जी सकें. (४)
त्वया वयं पवमानेन सोम भरे कृतं वि चिनुयाम शश्वत्.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (५)
हे सोम! आप जग को पवित्र करने वाले हैं. आप की मदद से हम युद्ध में अपना कर्तव्य
भलीभांति निबाह सकें. अदिति, मित्र, वरुण, पृथ्वी, सिंधु देवता तथा स्वर्गलोक हमें यशस्वी
बनाने की कृपा करें. (५)
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इमं वृषणं कृणुतैकमिन्माम्.. (६)
हे देवताओ! आप इस सोम को बलवान बनाइए, ताकि वे हमारी मनोकामनाएं पूरी कर
सकें. हमें बलवान बना सकें. (६)
स न इन्द्राय यज्यवे मरुद्भ्यः वरिवोवित्परिस्रव.. (७)
हे सोम! आप धनदाता व पूजनीय हैं. आप इंद्र, मरुद्गण और वरुण के लिए धारा के
रूप में टपकिए. (७)
एना विश्वान्यर्य आ द्युम्नानि मानुषाणाम्. सिषासन्तो वनामहे.. (८)
सोम की कृपा से मनुष्यों के लिए चाहे गए सभी प्रकार के धन हमें प्राप्त हों. हम उन
धनों के श्रेष्ठ उपयोग की इच्छा रखते हैं. (८)
अहमस्मि प्रथमजा ऋतस्य पूर्वं देवेभ्यो अमृतस्य नाम.
यो मा ददाति स इदेवमावदहमन्नमन्नमदन्तमद्मि.. (९)
मैं (अन्न) सभी देवताओं से पहले उत्पन्न हुआ हूं. मैं विनाशरहित हूं. जो व्यक्ति अच्छे
पात्र को मेरा दान करता है, वह सब का कल्याण करता है. जो किसी को दान नहीं करता है,
अकेला ही अन्न खाता है, उसे मैं समाप्त कर देता हूं. (९)
दूसरा खंड
त्वमेतदधारयः कृष्णासु रोहिणीषु च. परुष्णीषु रुशत्पयः.. (१)
हे इंद्र! काली, लाल और अनेक रंग वाली गायों में (सब में) आप ने एक जैसा
चमचमाता सफेद दूध स्थापित किया है. हम आप के इस आश्चर्यजनक सामर्थ्य की प्रशंसा
करते हैं. (१)
अरूरुचदुषसः पृश्निरग्रिय उक्षा मिमेति भुवनेषु वाजयुः.
मायाविनो ममिरे अस्य मायया नृचक्षसः पितरो गर्भमादधुः.. (२)
उषा के संबंधी सूर्य खास हैं. वे स्वयं प्रकाशमान और सब को प्रकाशित करने वाले हैं.
वे ही जल बरसाने वाले मेघ का रूप भी हैं. वे ही आकाश में गर्जना करते हैं. बुद्धिमान
देवताओं ने बुद्धि से इस जग को रचा. मनुष्यों को देखने वाले पितरों ने माता के पेट (गर्भ) में
इसे स्थापित किया. (२)
इन्द्र इद्धर्योः सचा सम्मिश्ल आ वचोयुजा. इन्द्रो वज्री हिरण्ययः.. (३)
इंद्र के संकेत (इशारे) मात्र से घोड़े एक साथ रथ में जुत जाते हैं. इंद्र वज्रधारी व
आभूषणधारी हैं. (३)
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इन्द्र वाजेषु नो ऽ व सहस्रप्रधनेषु च. उग्र उग्राभिरूतिभिः.. (४)
हे इंद्र! आप अत्यंत बलवान हैं. आप को कोई नहीं हरा सकता. आप छोटे और बड़े
सभी प्रकार के युद्धों में हमारी रक्षा कीजिए. (४)
प्रथश्च यस्य सप्रथश्च नामानुष्टुभस्य हविषो हविर्यत्.
धातुर्द्युतानात्सवितुश्च विष्णो रथन्तरमा जभारा वसिष्ठः.. (५)
वसिष्ठ के पुत्र प्रथ एवं भरद्वाज के पुत्र सप्रथ के लिए अनुष्टुप् छंद में स्तुति करते हैं. उन
के लिए श्रेष्ठ हवि समर्पित करते हैं. वसिष्ठ ऋषि ने रथंतर नामक सोम को धाता और सब को
उत्पन्न करने वाले विष्णु से प्राप्त किया. (५)
नियुत्वान्यायवा गह्यय 28 शुक्रो अयामिते. गन्तासि सुन्वतो गृहम्.. (६)
हे वायु! आप अपने वाहन से पधारिए. आप के लिए चमकता हुआ सोमरस तैयार
किया गया है. आप विधिविधान से सोमरस तैयार करने वाले यजमान के घर पधारते हैं. आप
हमारे यहां पधारिए. (६)
यज्जायथा अपूर्व्य मघवन्वृत्रहत्याय. तत्पृथिवीमप्रथयस्तदस्तभ्ना उतो दिवम्.. (७)
हे इंद्र! आप अत्यंत वैभवशाली व अपूर्व हैं. वृत्रासुर के नाश के समय आप ने पृथ्वी को
दृढ़ और विस्तृत किया. स्वर्गलोक को भी भलीभांति स्थिर किया. आप की सामर्थ्य अद्भुत
है. (७)
तीसरा खंड
मयि वर्चो अथो यशो ऽ थो यज्ञस्य यत्पयः.
परमेष्ठी प्रजापतिर्दिवि द्यामिव दृ 28 हतु.. (१)
प्रजाओं का पालन करने वाले प्रजापति स्वर्गलोक में निवास करते हैं. वे हमें आत्मज्ञान
व यश देने की कृपा करें. वे हमें यज्ञ से संबंध रखने वाली उत्तम हवि और अन्न सामग्री प्रदान
करने की कृपा करें. (१)
सं ते पया 28 सि समु यन्तु वाजाः सं वृष्ण्यान्यभिमातिषाहः.
आप्यायमानो अमृताय सोम दिवि श्रवा 28 स्युत्तमानि धिष्व.. (२)
हे सोम! आप शत्रुनाशक हैं. आप हवि के लिए निर्धारित दुग्ध सामग्री प्राप्त कीजिए.
अमरता पाने के लिए आप स्वर्गलोक में श्रेष्ठ अन्न और श्रेष्ठ बल को प्राप्त कीजिए. (२)
त्वमिमा ओषधीः सोम विश्वास्त्वमपो अजनयस्त्वं गाः.
त्वमातनोर्वा ३ न्तरिक्षं त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ.. (३)
हे सोम! आप ने पृथ्वीलोक में मौजूद सारी ओषधियों को उत्पन्न किया है. आप ने जल
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को उत्पन्न किया है. आप ने गायों को उत्पन्न किया है. आप ने आकाश को फैलाया है. आप
ने अंधकार को दूर किया है. (३)
अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्. होतार 𑖊 रत्नधातमम्.. (४)
हम यजमान संसार का कल्याण करने की इच्छा रखते हैं. हम अग्नि की स्तुति करते हैं.
वे यज्ञ में देवताओं के दूत हैं. हम यज्ञ में अग्नि प्रज्वलित करते हैं. वे हमें सुख और ऐश्वर्य
प्रदान करते हैं. (४)
ते मन्वत प्रथमं नाम गोनां त्रिः सप्त परमं नाम जानन्.
ता जानतीरभ्यनूषत क्षा आविर्भुवन्नरुणीर्यशसा गावः.. (५)
ऋषियों ने सब से पहले यह जाना कि वाणी के शब्द पूजनीय हैं. उस के बाद उन्होंने
सात के तिगुने यानी इक्कीस छन्दों में स्तोत्र होते हैं, यह ज्ञान प्राप्त किया. उस के बाद वाणी
से उषा की स्तुति की. उस के बाद सूर्य के तेज के साथ ही प्रकाशमान अन्य स्तुतियां
(वाणियां) उत्पन्न हुईं. (५)
समन्या यन्त्युपयन्त्यन्याः समानमूर्वं नद्यस्पृणन्ति.
तमू शुचि 𑖊 शुचयो दीदिवा 𑖊 समपात्रापातमुप यन्त्यापः.. (६)
बरसात का पानी जमीन पर गिर कर जमीन के पानी के साथ मिल जाता है. ये दोनों
पानी नदी का रूप धारण कर लेते हैं और समुद्र में मिल जाते हैं. वहां ये पानी समुद्री अग्नि
को आनंद देते हैं. इसी प्रकार सोमरस पानी में मिल कर आनंदित करता है. (६)
आ प्रागाद्भद्रा युवतिरहः केतून्त्समीर्त्सति.
अभूद्भद्रा निवेशनी विश्वस्य जगतो रात्री.. (७)
सूर्य की किरणों को समेटने वाली रात्रि रूपी स्त्री आ गई है. यह सारे संसार को आराम
देने वाली है. यह सारे संसार का कल्याण चाहने वाली है. (७)
प्रक्षस्य वृष्णो अरुषस्य नू महः प्र नो वचो विदथा जातवेदसे.
वैश्वानराय मतिर्नव्यसे शुचिः सोम इव पवते चारुरग्नये.. (८)
अग्नि सर्वत्र व्याप्त व प्रकाशमान हैं. हम उन की स्तुति करते हैं. हम यज्ञ में उन के लिए
स्तोत्र गाते हैं. वे सभी मनुष्यों का हित करने वाले हैं. उन के पास स्तोत्र वैसे ही जाते हैं, जैसे
यज्ञ में सोम जाते हैं. (८)
विश्वे देवा मम शृण्वन्तु यज्ञमुभे रोदसी अपां नपाच्च मन्म.
मा वो वचा 𑖊 सि परिचक्ष्याणि वोच 𑖊 सुम्नेष्विद्धो अन्तमा मदेम.. (९)
सभी देवगण हमारे पूजनीय स्तोत्रों को सुनने की कृपा करें. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक
दोनों हमारे स्तोत्रों को सुनने की कृपा करें. अग्नि हमारे स्तोत्र सुनें. हम कभी भी अप्रिय और
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त्याज्य वाणी न बोलें. हम देवताओं की कृपा में रहें. उन के द्वारा दिए गए सुख से सुखी रहें.
(९)
यशो मा द्यावापृथिवी यशो मेन्द्रबृहस्पती.
यशो भगस्य विन्दतु यशो मा प्रतिमुच्यताम्.
यशसा ३ स्याः स ꣳ सदो ऽ हं प्रवह्रिता स्याम्.. (१०)
हम यजमानों को स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक का यश प्राप्त हो. हमें इंद्र और बृहस्पति
का यश भी प्राप्त हो. सूर्य का यश मुझे मिले. यह यश कभी हम से मुंह न मोड़े. इस सभा में
मुझे यश मिले. इस में मैं विचार व्यक्त करने की अच्छी क्षमता (देवताओं की कृपा से) पा
जाऊं. (१०)
इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचं यानि चकार प्रथमानि वज्री.
अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्र वक्षणा अभिनत्पर्वतानाम्.. (११)
इंद्र वज्रधारी और शक्तिशाली हैं. वे बादलों को भेद कर बरसात करने वाले हैं. उन्होंने
नदियों के तट बना कर पर्वतों से जल बहाया. मैं उन के इन अच्छे कामों का बारबार वर्णन
करता हूं. (११)
अग्निरस्मि जन्मना जातवेदा घृतं मे चक्षुरमृतं म आसन्.
त्रिधातुरर्को रजसो विमानो ऽ जसं ज्योतिर्हविरस्मि सर्वम्.. (१२)
मैं (आत्मा) जन्म से ही अग्नि स्वरूप हूं. सब कुछ जानने वाला हूं, प्रकाशमान हूं. मुंह
में अमरता देने वाली वाणी है. मैं प्राण, अपान, व्यान इन तीनों प्रकार का प्राण हूं, आकाश
को नापने वाला वायु हूं, प्रकाशमान सूर्य हूं, सभी की हवि हूं. (१२)
पात्यग्निर्विपो अग्रं पदं वेः पाति यह्वश्चरण ꣳ सूर्यस्य.
पाति नाभा सप्तशीर्षाणमग्निः पाति देवानामुपमादमृष्वः.. (१३)
अग्नि देव सर्वव्यापक हैं. वे पृथ्वी के मुख्य स्थानों की रक्षा करते हैं. वे महान हैं. वे सूर्य
के मार्ग व अंतरिक्ष की रक्षा करते हैं. वे अंतरिक्षलोक में मरुद्गणों व देवताओं को प्रिय लगने
वाले यज्ञ की रक्षा करते हैं. वे सुंदर तथा दर्शनीय हैं. (१३)
चौथा खंड
भ्राजन्त्यग्ने समिधान दीदिवो जिह्वा चरत्यन्तरासनि.
स त्वं नो अग्ने पयसा वसुविद्रयिं वर्चो दृशे ऽ दाः.. (१)
हे अग्नि! आप चमचमाते हैं. आप का मुख प्रकाशित है. उस मुख में जीभ अग्नि की
ज्वाला में डाली गई हवि खाती है. आप धन देने वाले हैं. आप अन्न व रमणीय धन दीजिए.
(१)
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वसन्त इन्तु रन्त्यो ग्रीष्म इन्तु रन्त्यः.
वर्षाण्यनु शरदो हेमन्तः शिशिर इन्तु रन्त्यः.. (२)
वसंत ऋतु लुभावनी है. ग्रीष्म ऋतु लुभावनी है. वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर ऋतुएं
भी लुभावनी हैं. (२)
सहस्रशीर्षाः पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्.
स भूमि ꣳ सर्वतो वृत्वार्त्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्.. (३)
पूर्ण पुरुष हजारों सिरों वाला है. वह हजारों आंखों वाला है, हजारों पैरों वाला है. वह
सारे ब्रह्मांड को घेर सकने में समर्थ है. फिर भी वह बाकी रहता है. (३)
त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादो ऽ स्येहाभवत्पुनः.
तथा विष्वङ् व्यक्रामदशनानशने अभि.. (४)
पूर्ण पुरुष तीन पैरों वाला है. वह ऊंचे स्थान पर वास करता है. इस पूर्ण पुरुष से ही
सारा संसार पैदा होता है. चेतन और अचेतन सभी में इसी पूर्ण पुरुष का विस्तार है. यह
विविध स्वरूपों वाला है. यह सर्वत्र व्याप्त है. (४)
पुरुष एवेद ꣳ सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्.
पादो ऽ स्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि.. (५)
भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों का कर्ता पूर्ण पुरुष ही है. इस के तीन पैर अमर
स्वर्गलोक में हैं. इस के शेष चौथे चरण में सारे प्राणी हैं. (५)
तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँ श्च पूरुषः. उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति.. (६)
पूर्ण पुरुष जड़चेतन और समस्त पृथ्वी से भी विस्तृत (बड़ा) है. वह अमरता का स्वामी
है. अन्न से बढ़ने वाले प्राणियों का भी स्वामी है. (६)
ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः.
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः.. (७)
उस पुरुष से विराट् (ब्रह्मांड) पुरुष उत्पन्न हुआ. उस से अन्य पुरुष उत्पन्न हुए. उस के
बाद उस ने पशुपक्षियों और अन्य जीवों को उत्पन्न किया. (७)
मन्ये वां द्यावापृथिवी सुभोजसौ ये अप्रथेथाममितमभि योजनम्.
द्यावापृथिवी भवत ꣳ स्योने ते नो मुञ्चतम ꣳ हसः.. (८)
हे स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक! आप हमारे पालनहार हैं. हम आप को इसी रूप में
जानते हैं. आप हमारा अपार वैभव बढ़ाइए. हे स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक के देवता! आप हमें
सुख दीजिए. आप हमें पापों से दूर कीजिए. (८)
हरी त इन्द्र श्मश्रूण्युतो ते हरितौ हरी.
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तं त्वा स्तुवन्ति कवयः परुषासो वनर्गवः.. (९)
हे इंद्र! आप की दाढ़ीमूंछें हरी हैं. आप के घोड़े भी हरे हैं. आप श्रेष्ठ गोपालक हैं.
विद्वान् कविजन आप की स्तुति करते हैं. (९)
यद्वर्चो हिरण्यस्य यद्वा वर्चो गवामुत.
सत्यस्य ब्रह्मणो वर्चस्तेन मा स ॐ सृजामसि.. (१०)
स्वर्ण, गाय और सत्यज्ञान में जो तेजस्विता है, हम उस तेजस्विता को अपने में धारण
करना (पाना) चाहते हैं. (१०)
सहस्तन्न इन्द्र दद्ध्वयोज ईशे ह्यस्य महतो विरप्शिन्.
ऋतुं न नृम्ण ॐ स्थविरं च वाजं वृत्रेषु शत्रून्तसहना कृधी नः.. (११)
हे इंद्र! आप शत्रु का नाश करने वाले हैं. आप हमें बल प्रदान कीजिए क्योंकि आप
महान बल के स्वामी हैं. आप हमारे यज्ञ की स्थिति जैसा धन और सामर्थ्य हमें दीजिए. आप
हमें ऐसी शक्ति दीजिए, जिस से हम संग्रामों में अपने दुश्मनों को हरा सकें. (११)
सहर्षभाः सहवत्सा उदेत विश्वा रूपाणि बिभ्रतीद्वर्यूध्नीः.
उरुः पृथुर्यं वो अस्तु लोक इमा आपः सुप्रपाणा इह स्त.. (१२)
कई रंगों वाली, बड़ेबड़े थनों (स्तनों) वाली गौएं, बछड़ों और बैलों के साथ हमें प्राप्त
हों. यह पृथ्वीलोक महान व विशाल है. यह आप के निवास योग्य है. आप को यहां सुख से
पीने योग्य जल प्राप्त हो. (१२)
पांचवां खंड
अग्न आयू ॐ षि पवस आ सुवोर्जमिषं च नः. आरे बाधस्व दुच्छुनाम्.. (१)
हे अग्नि! आप हमारे अन्नों की आयु बढ़ाने की कृपा कीजिए. आप हमारी आयु
बढ़ाइए. हमारे बल की आयु बढ़ाइए. आप दुष्टों को हम से दूर कीजिए. (१)
विभ्राड् बृहत्पिबतु सोम्यं मध्वायुर्दधद्यज्ञपतावविह्रुतम्.
वातजूतो यो अभिरक्षति त्मना प्रजाः पिपर्ति बहुधा वि राजति.. (२)
सूर्य बहुत प्रकाशमान हैं. वे खूब सोमरस पीएं. वे यजमानों को निष्कंटक रखें. उन्हें
दीर्घायु करें. वायु सूर्य की किरणों को दूरदूर तक पहुंचाते हैं. उन से वे प्रजा का पालन करते
हैं. अनेक प्रकार से प्रकाशित होने में समर्थ होते हैं. (२)
चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः.
आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्ष ॐ सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च.. (३)
सूर्य देवताओं के दिव्य तेज का समूह हैं. वे मित्र, वरुण तथा अग्नि के नेत्र हैं. सूर्य के
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उगते ही स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक और अंतरिक्षलोक आदि सभी उन के प्रकाश से जगमगा जाते
हैं. (३)
आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः. पितरं च प्रयन्त्स्वः.. (४)
सूर्य गतिशील व तेजस्वी हैं. वे उदित हो कर ऊपर स्थित हो जाते हैं. सब से पहले वे
पृथ्वीलोक (माता), फिर स्वर्गलोक (पिता) फिर अंतरिक्षलोक को प्राप्त होते हैं. (४)
अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणादपानती. व्यख्यन्महिषो दिवम्.. (५)
सूर्य का प्रकाश अपनी किरणों से आकाश में घूमता है. सूर्य के उगने पर ये किरणें
दिखती हैं और अस्त होने पर गायब हो जाती हैं. सूर्य अंतरिक्षलोक को विशेष रूप से
प्रकाशित करते हैं. (५)
त्रि ꣳ शद्धाम वि राजति वाक्पतङ्गाय धीयते. प्रति वस्तोरह द्युभिः.. (६)
दिन की तीस घड़ियों तक सूर्य अपनी किरणों से प्रकाशित होते हैं. इन सूर्य के लिए हर
एक मुख वेदवाणी उचारता है (स्तुति करता है). (६)
अप त्ये तायवो यथा नक्षत्रा यन्त्यक्तुभिः. सूराय विश्वचक्षसे.. (७)
दिन में जैसे चोर छिप जाते हैं, वैसे ही सूर्य के उगने पर ग्रह, नक्षत्र, तारागण आदि छिप
जाते हैं. (७)
अदृश्रन्नस्य केतवो वि रश्मयो जनाँ अनु. भ्राजन्तो अग्नयो यथा.. (८)
जैसे हम जलती हुई अग्नि की ज्वाला देख सकते हैं, वैसे ही सूर्य की प्रकाशित किरणों
को हम देख सकते हैं. वे सब को देख सकती हैं. (८)
तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य. विश्वमाभासि रोचनम्.. (९)
हे सूर्य! आप सब को पार लगाने वाले हैं. आप सारे संसार को देख सकते हैं. आप सब
को प्रकाशित कर सकते हैं. चंद्रमा, ग्रह, नक्षत्र आदि को आप ही चमकाते हैं. (९)
प्रत्यङ् देवानां विशः प्रत्यङ्ङुदेषि मानुषान्. प्रत्यङ् विश्व ꣳ स्वर्द्दशे.. (१०)
हे सूर्य! आप मरुद्गणों के देखते हुए उन के सामने उदित होते हैं. आप मनुष्यों के
देखते हुए उदित होते हैं. आप सभी के देखते हुए यानी सब के सामने प्रकट होते हैं. (१०)
येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु. त्वं वरुण पश्यसि.. (११)
हे सूर्य! आप सभी को पवित्र व प्रकाशित करने वाले हैं. आप जिस प्रकाश से सब को
प्रकाशित करते हैं हम उस की उपासना करते हैं. (११)
उद्यामेषि रजः पृथ्वहा मिमानो अक्तुभिः. पश्यञ्जन्मानि सूर्य.. (१२)
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हे सूर्य! आप देहधारियों को प्रकाशित करते हैं. आप दिन को रात्रि से नापते हैं. आप
स्वर्गलोक और अंतरिक्षलोक को भी अपने प्रकाश से प्रकाशित कर देते हैं. (१२)
अयुक्त सप्त शुन्ध्युवः सूरो रथस्य नप्त्र्यः. ताभिर्याति स्वयुक्तिभिः.. (१३)
सूर्य ने रथ में घोड़े जोत रखे हैं. वे सातों घोड़े शुद्धकारी हैं. किरण रूपी घोड़ों से सूर्य
सर्वत्र जाते हैं. (१३)
सप्त त्वा हरितो रथे वहन्ति देव सूर्य. शोचिष्केशं विचक्षण.. (१४)
हे सूर्य! आप प्रकाशित करने वाले हैं. सात किरण रूपी घोड़े आप के रथ को ले जाते
हैं. ये किरणें शुद्ध करने वाली हैं. (१४)