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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

पातंजल-योगसूत्र १४९

पातंजल-योगसूत्र १४९

कोई आवश्यकता नही है। प्रकृति को मानने से ही जब सभी का स्पष्टीकरण हो जाता है, तो फिर किसी ईश्वर को लाने की आवश्यकता क्या ? कपिल मुनि कहते है कि बहुतसे व्यक्ति ऐसे हैं, जो सिद्धावस्था के नजदीक जाकर भी विभूति-लाभ की वासना पूर्णतया छोडने मे समर्थ न होने के कारण योगभ्रष्ट हो जाते है। उनका मन कुछ काल तक प्रकृति मे लीन होकर रहता है, जब वे पुन पैदा होते है, तब प्रकृति के मालिक होकर आते है। यदि इन्हे ईश्वर कहो, तो ऐसे ईश्वर अवश्य हैं। हम सभी एक समय ऐसा ईश्वरत्व प्राप्त करेगे। साख्यदर्शन के मतानुसार, वेद मे जिस ईश्वर की बात कही गई है, वह ऐसी ही एक मुक्तात्मा का वर्णन मात्र है। इसके अतिरिक्त जगत् का अन्य कोई नित्यमुक्त, आनन्दमय सृष्टिकर्ता नही है। दूसरी ओर, योगीगण कहते है, "नही, ईश्वर है, अन्य सभी आत्माओ से—सभी पुरुषो से अलग एक विशेष पुरुष है, वे समग्र सृष्टि के नित्य प्रभु है, वे नित्यमुक्त हैं और सभी गुरुओ के गुरुस्वरूप है।" साख्यमतवाले जिन्हे प्रकृतिलय कहते है, योगीगण उनका भी अस्तित्व स्वीकार करते हैं। वे कहते है कि ये योगभ्रष्ट योगी है। कुछ समय तक के लिए उनकी चरम लक्ष्य की ओर गति मे बाधा होती है, और उस समय वे जगत के अंशविशेष के अधिपति-रूप से अवस्थान करते है।

भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥१९॥

सूत्रार्थ—( यह समाधि यदि परवैराग्य के साथ अनुष्ठित न हो, तो ) वही देवताओं और प्रकृतिलीनों की पुनरुत्पत्ति का कारण है।

व्याख्या—भारतीय धर्मप्रणालियो में देवता का तात्पर्य है—कुछ उच्चपदस्थ व्यक्ति। भिन्न-भिन्न जीवात्मा एक के बाद

१५० - राजयोग

एक इन पदो की पूर्ति करते है। पर इनमें से कोई भी पूर्ण नही है।

श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् ॥२०॥

सूत्रार्थ—दूसरों को श्रद्धा अर्थात् विश्वास, वीर्य अर्थात् मन का तेज, स्मृति, समाधि अर्थात् एकाग्रता और प्रज्ञा अर्थात् सत्य वस्तु के विवेक से (यह समाधि) प्राप्त होती है।

व्याख्या—जो लोग देवतापद या किसी कल्प के शासन-कर्ता होने की भी कामना नही करते, उन्ही की बात कही जा रही है। वे मुक्ति प्राप्त करते है।

तीव्रसंवेगानामासन्नः ॥२१॥

सूत्रार्थ--जिनके साधन की गति तीव्र है, उनके लिए (यह योग) शीघ्र (सिद्ध) हो जाता है।

मृदुमध्याधिमात्रत्वात् ततोऽपि विशेषः ॥२२॥

सूत्रार्थ—साधन की हल्की, मध्यम और उच्च मात्रा के अनुसार योगियों की सिद्धि में भी भेद हो जाता है।

ईश्वरप्रणिधानाद्वा ॥२३॥

सूत्रार्थ—अथवा ईश्वर के प्रति भक्ति से भी (समाधि सिद्ध होती है)।

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥२४॥

सूत्रार्थ---दुःख, कर्म, कर्मफल और वासना के सम्बन्ध से रहित पुरुषविशेष ईश्वर (परम नियन्ता) है।

व्याख्या—हमे यहाँ फिर से स्मरण करना होगा कि पातञ्जल योगदर्शन सांख्यदर्शन पर स्थापित है। भेद केवल इतना है कि सांख्यदर्शन में ईश्वर का स्थान नही है, जब कि योगीगण ईश्वर का अस्तित्व स्वीकार करते हैं। ईश्वर को मानने पर भी