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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

> स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः ॥४४॥

२२६ राजयोग

उत्पन्न होते हैं; अतएव तुम्हे उससे बचकर रहना होगा—उसको दूर कर देना होगा। विषादपूर्ण होकर चेहरा उतारे रहना तमोगुण का एक लक्षण है। सबल, दृढ़, स्वस्थ, युवक और साहसी मनुष्य ही योगी बनने के योग्य है। योगी के लिए सभी सुखमय प्रतीत होते हैं, वे जिस किसी मनुष्य को देखते हैं, उसी से उनको आनन्द होता है। यही धार्मिक मनुष्य का चिह्न है। पाप ही कष्ट का कारण है, अन्य किसी कारण से कष्ट नहीं आता। उतरा हुआ चेहरा लेकर क्या होगा? कैसा भयानक दृश्य है वह! ऐसी सूरत लेकर बाहर मत जाना। किसी दिन ऐसा होने पर दरवाजा बन्द करके समय बिता देना। संसार के भीतर इस बीमारी को संक्रामित करने का तुम्हें क्या अधिकार है? जब तुम्हारा मन संयत हो जायगा, तब तुम पूरे शरीर को वश में रख सकोगे। तब फिर तुम इस यन्त्र के दास नहीं बने रहोगे, यह देह-यन्त्र ही तुम्हारा दास होकर रहेगा। तब यह देह-यन्त्र आत्मा को खींचकर नीचे की ओर न ले जाकर उसकी मुक्ति में महान् सहायक हो जायगा।

सन्तोषादनुत्तमः सुखलाभः ॥४२॥

सूत्रार्थ— सन्तोष से परम सुख प्राप्त होता है।

कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः ॥४३॥

सूत्रार्थ— तपस्या से जब अशुद्धि का नाश हो जाता है, तब शरीर और इन्द्रियों की सिद्धि हो जाती है अर्थात् उनमें नाना प्रकार की शक्तियां आती हैं।

व्याख्या— तपस्या का फल कभी-कभी अचानक दूरदर्शन, दूरश्रवण इत्यादि रूप से प्रकाशित होता है।

स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः ॥४४॥

सूत्रार्थ— मन्त्र के पुनः-पुनः उच्चारण या अभ्यास से इष्टदेवता के दर्शन होते हैं।

पातंजल-योगसूत्र—२ २२७

**व्याख्या—**जितने उच्च स्तर के जीव (देवता, ऋषि, सिद्ध) देखने की इच्छा करोगे, अभ्यास भी उतना ही अधिक करना पड़ेगा।

समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥४५॥

**सूत्रार्थ—**ईश्वर में समस्त अर्पण करने से समाधि-लाभ होता है।
**व्याख्या—**ईश्वर पर निर्भरता से समाधि की पूर्णता होती है।

स्थिरसुखमासनम् ॥४६॥

**सूत्रार्थ—**स्थिर भाव से सुखपूर्वक बैठने का नाम आसन है।
**व्याख्या—**अब आसन की बात कही जायगी। जब तक तुम स्थिर भाव से बहुत समय तक बैठे रहने में समर्थ नही होते, तब तक प्राणायाम एव अन्यान्य साधनो मे किसी प्रकार सफल नही हो सकोगे। आसन के स्थिर होने का तात्पर्य है—शरीर के अस्तित्व का बिलकुल भान तक न होना। साधारणत यह देखा जाता है कि ज्योही तुम चन्द मिनट के लिए बैठते हो, त्योही शरीर में नाना प्रकार के विकार आने लगते है। पर जब तुम स्थूल देहभाव के परे चले जाओगे, तब तुम्हे शरीर का भान तक न रहेगा। फिर तुम सुख या दुख कुछ भी अनुभव नही करोगे। जब फिर से तुम्हे शरीर का ज्ञान आयगा, जब तुम आसन से उठोगे, तो ऐसा लगेगा कि तुमने बहुत समय तक विश्राम किया है। यदि शरीर को सम्पूर्ण विश्राम देना सम्भव हो, तो वह इसी प्रकार हो सकता है। जब तुम इस प्रकार शरीर को अपने अधीन करके उसे दृढ रख सकोगे, तब जानना कि तुम्हारा साधन भी दृढ हुआ है। किन्तु जब तक शारीरिक विघ्न-बाधाएँ आती रहेगी, तब तक तुम्हारे स्नायु चचल रहेगे और तुम किसी भी प्रकार मन को एकाग्र न कर सकोगे।

१२८ राजयोग

प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ॥४७॥

**सूत्रार्थ—**शरीर में एक प्रकार का जो अभिमानात्मक प्रयत्न है (अर्थात् चंचलता की ओर शरीर की जो एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है), उसे शिथिल कर देने से और अनन्त के चिन्तन से (आसन स्थिर और सुखकर होता है)।

**व्याख्या—**अनन्त के चिन्तन के द्वारा आसन अविचलित (स्थिर) हो सकता है। पर हाँ, हम उस सर्वद्वन्द्वातीत अनन्त (ब्रह्म) के बारे में (सरलता से) चिन्तन नहीं कर सकते, किन्तु हम अनन्त आकाश के बारे में सोच सकते हैं।

ततो द्वन्द्वानभिघातः ॥४८॥

**सूत्रार्थ—**इस प्रकार आसन सिद्ध हो जाने पर, तब द्वन्द्वपरम्परा और कुछ विघ्न उत्पन्न नहीं कर सकती।

**व्याख्या—**द्वन्द्व का अर्थ है शुभ-अशुभ, शीत-उष्ण, आलोक-अँधेरा, सुख-दुःख आदि विपरीत धर्मवाले दो-दो पदार्थ। ये सब फिर तुम्हें चंचल नहीं कर सकेंगे।

तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥४९॥

**सूत्रार्थ—**उस आसन की सिद्धि होने के बाद श्वास और प्रश्वास दोनों की गति को संयत करना प्राणायाम कहलाता है।

**व्याख्या—**जब यह आसन सिद्ध हो जाता है, तब इस श्वास-प्रश्वास की गति को रोककर उस पर जय प्राप्त करना पड़ेगा। अत अब प्राणायाम का विषय आरम्भ होता है। प्राणायाम क्या है? शरीरस्थित जीवनी-शक्ति को वश में लाना। यद्यपि 'प्राण' शब्द बहुधा श्वास के अर्थ में प्रयुक्त होता है, तो भी वास्तव में वह श्वास नहीं है। प्राण का अर्थ है जागतिक समस्त शक्तियों की समष्टि। यह वह शक्ति है, जो प्रत्येक देह

पातञ्जल-योगसूत्र-२ २२९

में अवस्थित है, और उसका ऊपरी प्रकाश है—फेफडे की यह गति। प्राण जब श्वास को भीतर की ओर खींचता है, तभी यह गति शुरू होती है, प्राणायाम करने के समय हम उसी को संयत करने का प्रयत्न करते हैं। इस प्राण पर अधिकार प्राप्त करने के लिए हम पहले श्वास-प्रश्वास को संयत करना शुरू करते हैं, क्योकि वही प्राण-जय का सबसे सरल मार्ग है।

बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिः देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ॥५०॥

सूत्रार्थ— बाह्यवृत्ति, आभ्यन्तरवृत्ति और स्तम्भवृत्ति के भेद से यह प्राणायाम तीन प्रकार का है, देश, काल और संख्या के द्वारा नियमित तथा दीर्घ या सूक्ष्म होने के कारण उनमें भी फिर नाना प्रकार के भेद हैं।

व्याख्या— यह प्राणायाम तीन प्रकार की क्रियाओ में विभक्त है। पहली—जब हम श्वास को अन्दर खींचते और धारण करते है, दूसरी—जब हम उसे बाहर निकालते और धारण करते है, तीसरी—जब श्वास और प्रश्वास को फेफडे के भीतर या उसके बाहर रोकते है। ये फिर देश, काल और संख्या के अनुसार भिन्न-भिन्न रूप धारण करते है। देश का अर्थ है—प्राण को शरीर के किसी अंगविशेष मे आबद्ध रखना। समय का अर्थ है—प्राण को किस स्थान में कितने समय तक रखना होगा, इस बात का ज्ञान, और संख्या का अर्थ है—यह जान लेना कि कितनी बार ऐसा करना होगा। इसीलिए कहाँ पर, कितने समय तक और कितनी बार रेचक आदि करना होगा, इत्यादि कहा जाता है। इस प्राणायाम का फल है उद्घात अर्थात् कुण्डलिनी का जागरण।