राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
पातंजल-योगसूत्र १३१
पातंजल-योगसूत्र १३१
पास ले जानेवाले रास्ते पर लाना—यही योग का पहला सोपान है; क्योकि केवल इसी उपाय से चित्त अपने यथार्थ रास्ते पर आ सकता है।
यद्यपि उच्चतम से लेकर निम्नतम तक सभी प्राणियो में यह चित्त विद्यमान है, तथापि केवल मनुष्य-शरीर मे ही हम उसे बुद्धि-रूप मे विकसित देख पाते है। जब तक यह चित्त बुद्धि का रूप धारण नही कर लेता, तब तक उसके लिए इन सब विभिन्न सोपानो में से होते हुए लौटकर आत्मा को मुक्त करना सम्भव नही। यद्यपि गाय या कुत्ते के भी मन है पर उनके लिए सद्योमुक्ति असम्भव है, क्योकि उनका चित्त अभी बुद्धि का रूप धारण नही कर सकता।
यह चित्त अवस्था-भेद से बहुत से रूप धारण करता है जैसे—क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त और एकाग्र (विवेकख्याति या प्रसंख्यान) *। मन इन चार प्रकार की अवस्थाओ मे चार प्रकार के रूप धारण करता है। पहला है क्षिप्त, जिसमें मन चारो ओर बिखर जाता है और कर्मवासना प्रबल रहती है। इस अवस्था मे मन की प्रवृत्ति केवल सुख और दुःख इन दो भावो मे ही प्रकाशित होने की होती है। उसके बाद है मूढ अवस्था। यह अवस्था तमोगुणात्मक है और इसमे मन की प्रवृत्ति केवल औरो का अनिष्ट करने में होती है। विक्षिप्त अवस्था वह है, जब मन अपने केन्द्र की ओर जाने का प्रयत्न करता है। यहाँ पर टीकाकार कहते हैं कि विक्षिप्त अवस्था देवताओ के लिए स्वाभाविक है और मूढावस्था असुरों के लिए। एकाग्र चित्त ही हमे समाधि मे ले जाता है।
* यहाँ निरुद्ध (धर्ममेघ या परप्रसंख्यान) अवस्था की बात नही कही गई, क्योकि वास्तव में निरुद्धावस्था को चित्तवृत्ति नही कही जा सकती।
१३२ राजयोग
तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥ ३ ॥
सूत्रार्थ—उस समय (अर्थात् इस निरोध की अवस्था में) द्रष्टा (पुरुष) अपने (अपरिवर्तनशील) स्वरूप में अवस्थित रहते हैं।
व्याख्या—ज्योंही लहरे शान्त हो जाती हैं और पानी स्थिर हो जाता है, त्योंही हम सरोवर की तली को देख पाते हैं। मन के बारे में भी ठीक ऐसा ही समझो। जब यह शान्त हो जाता है, तब हम देख पाते हैं कि अपना असल स्वरूप क्या है, फिर हम उन तरंगों के साथ अपने आपको एकरूप नहीं कर लेते, वरन् अपने स्वरूप में अवस्थित रहते हैं।
वृत्तिसारूप्यमितरत्र ॥४॥
सूत्रार्थ—(इस निरोध की अवस्था को छोड़कर) दूसरे समय में द्रष्टा वृत्ति के साथ एकरूप होकर रहते हैं।
व्याख्या—उदाहरणार्थ, मान लो किसी ने मेरी निन्दा की। बस वह मेरे मन में एक वृत्ति उठा देता है और मैं उसके साथ अपने आपको एकरूप कर देता हूँ। इसका परिणाम होता है—दुख।
वृत्तयः पंचतय्यः क्लिष्टा अक्लिष्टाः ॥५॥
सूत्रार्थ—वृत्तियां पांच प्रकार की हैं—(कुछ) क्लेशयुक्त और (कुछ) क्लेशशून्य।
प्रमाण-विपर्यय-विकल्प-निद्रा-स्मृतयः ॥६॥
सूत्रार्थ—(ये हैं) प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति—अर्थात् सत्यज्ञान, भ्रमज्ञान, शब्द-भ्रम, निद्रा और स्मृति।
प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥७॥
सूत्रार्थ—प्रत्यक्ष अर्थात् साक्षात् अनुभव, अनुमान और आगम अर्थात् विश्वस्त लोगों के वाक्य—(ये तीन) प्रमाण हैं।