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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

पातंजल-योगसूत्र १५९

पातंजल-योगसूत्र १५९

सत्संग से वे फिर से जागरित हो जायँगे—व्यवत भाव धारण कर लेगे। संसार मे सत्सग से पवित्र और कुछ भी नहीं है, क्योकि सन्सग से ही शुभ संस्कारो के जागरित होने का सुयोग उपस्थित होता है—वे सब शुभ सस्कार चित्तरूपी सरोवर की तली से ऊपरी सतह पर उठ आते हैं।

ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ॥२९॥

सूत्रार्थ—उससे अन्तर्दृष्टि प्राप्त होती है और (योग के) विघ्नों का नाश होता है।

व्याख्या—इस ओंकार के जप और चिन्तन का पहला फल यह देखोगे कि क्रमश अन्तर्दृष्टि विकसित होने लगेगी और योग के मानसिक एव शारीरिक विघ्नसमूह दूर होते जायँगे। योग के ये विघ्न कौन-कौनसे हैं ?

व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः ॥३०॥

सूत्रार्थ—रोग, मानसिक जडता, सन्देह, उद्यमशून्यता, आलस्य, विषय-तृष्णा, मिथ्या अनुभव, एकाग्रता न पाना, और उसे पाने पर भी उसका न ठहरना—ये जो चित्त के विक्षेप हैं, वे ही विघ्न हैं।

व्याख्या—व्याधि—इस जीवन-समुद्र के उस पार जाने के लिए यह शरीर ही एकमात्र नाव है। इसे स्वस्थ रखने के लिए विशेष यत्न करना चाहिए। जिसका शरीर अस्वस्थ है, वह योगी नही हो सकता। मानसिक जडता आने पर हमारा योगविषयक सारा अनुराग जाता रहता है। और इस अनुराग के अभाव मे, साधन करने के लिए जिस दृढ सकल्प एव शक्ति का रहना आवश्यक है, उसका कुछ भी शेष नही रह जाता। हमारा इस विषय मे विचारजनित विश्वास कितना भी क्यों

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न रहे, पर जब तक दूरदर्शन, दूरश्रवण आदि अलौकिक अनुभूतियाँ नही होती, तब तक इस विद्या की सत्यता के बारे मे बहुतसे सशय उपस्थित होगे। जब इन सबका थोडा-थोडा आभास आने लगता है, तो मन भी क्रमश दृढ होता जाता है। और उससे साधक साधनमार्ग मे और भी अध्यवसायशील होता जाता है। अनवस्थितत्व—साधन करते-करते देखोगे कि कुछ दिन या कुछ सप्ताह तो मन अनायास ही एकाग्र और स्थिर हो जाता है, उस समय ऐसा मालूम होगा कि तुम साधनमार्ग मे बहुत शीघ्र उन्नति कर रहे हो। अचानक एक दिन देखोगे कि तुम्हारा यह उन्नति-स्रोत बन्द हो गया है, मानो जहाज दलदल में फँस गया हो। पर उससे कही हताश मत हो जाना, अध्यवसाय मत खो बैठना। लगे रहो। इस प्रकार उत्थान और पतन मे से होते हुए ही उन्नति होती है।

दुःखदौर्मनस्यांगमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः ॥३१॥

सूत्रार्थ—दुःख, मन खराब होना, शरीर हिलना, अनियमित श्वास-प्रश्वास—ये सब (चित्त के) विक्षेपों के साथ-साथ उत्पन्न होते हैं।

व्याख्या—जब कभी एकाग्रता का अभ्यास किया जाता है, तभी मन और शरीर पूर्ण स्थिरभाव धारण करते हैं। जब साधना ठीक तरीके से नही होती, अथवा जब चित पर्याप्त सयत नही रहता, तभी ये सब विघ्न आ उपस्थित होते हैं। ओकार के जप और ईश्वर के प्रति आत्मसमर्पण से मन दृढ होता है तथा नया वल प्राप्त होता है। साधनमार्ग में ऐसी स्नायविक चंचलता प्राय सभी को आती है। उधर तनिक भी ध्यान न दे साधना करते रहो। साधना से ही वे सब चले जायेंगे, और तब आसन स्थिर हो जायगा।