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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

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पृष्ठ 167

१५० - राजयोग

एक इन पदो की पूर्ति करते है। पर इनमें से कोई भी पूर्ण नही है।

श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् ॥२०॥

सूत्रार्थ—दूसरों को श्रद्धा अर्थात् विश्वास, वीर्य अर्थात् मन का तेज, स्मृति, समाधि अर्थात् एकाग्रता और प्रज्ञा अर्थात् सत्य वस्तु के विवेक से (यह समाधि) प्राप्त होती है।

व्याख्या—जो लोग देवतापद या किसी कल्प के शासन-कर्ता होने की भी कामना नही करते, उन्ही की बात कही जा रही है। वे मुक्ति प्राप्त करते है।

तीव्रसंवेगानामासन्नः ॥२१॥

सूत्रार्थ--जिनके साधन की गति तीव्र है, उनके लिए (यह योग) शीघ्र (सिद्ध) हो जाता है।

मृदुमध्याधिमात्रत्वात् ततोऽपि विशेषः ॥२२॥

सूत्रार्थ—साधन की हल्की, मध्यम और उच्च मात्रा के अनुसार योगियों की सिद्धि में भी भेद हो जाता है।

ईश्वरप्रणिधानाद्वा ॥२३॥

सूत्रार्थ—अथवा ईश्वर के प्रति भक्ति से भी (समाधि सिद्ध होती है)।

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥२४॥

सूत्रार्थ---दुःख, कर्म, कर्मफल और वासना के सम्बन्ध से रहित पुरुषविशेष ईश्वर (परम नियन्ता) है।

व्याख्या—हमे यहाँ फिर से स्मरण करना होगा कि पातञ्जल योगदर्शन सांख्यदर्शन पर स्थापित है। भेद केवल इतना है कि सांख्यदर्शन में ईश्वर का स्थान नही है, जब कि योगीगण ईश्वर का अस्तित्व स्वीकार करते हैं। ईश्वर को मानने पर भी