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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

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अन्त करण को उसके प्रति करुणापूर्ण होना चाहिए । यदि वह कोई शुभ विषय हो, तो हमें आनन्दित होना चाहिए, तथा असत् विषय होने पर उसके प्रति उदासीन रहना ही श्रेयस्कर है । इन सब विभिन्न विषयों के प्रति मन के इस प्रकार विभिन्न भाव धारण करने से मन शान्त हो जायगा । मन की इस प्रकार के विभिन्न भावों को धारण करने की असमर्थता ही हमारे दैनिक जीवन की अधिकांश गडबडी एव अशान्ति का कारण है । मान लो, किसी ने मेरे प्रति कोई अनुचित व्यवहार किया । तो मै तुरन्त उसका प्रतिकार करने को उद्यत हो जाता हूँ । और इस प्रकार बदला लेने की भावना ही यह दर्शा देती है कि हम चित्त को दवा रखने मे असमर्थ हो रहे हैं । वह उस वस्तु की ओर तरगाकार में प्रवाहित होता है, और बस हम अपनी मन की शक्ति खो बैठते हैं । हमारे मन मे घृणा अथवा दूसरो का अनिष्ट करने की प्रवृत्ति के रूप में जो प्रतिक्रिया होती है, वह मन की शक्ति का क्षय मात्र है । दूसरी ओर, यदि किसी अशुभ विचार या घृणाप्रसूत कार्य अथवा किसी प्रकार की प्रतिक्रिया की भावना का दमन किया जाय, तो उससे शुभकरी शक्ति उत्पन्न होकर हमारे ही उपकार के लिए सचित रहती है । यह बात नही कि इस प्रकार के सयम से हमारी कोई क्षति होती हो, वरन् उससे तो हमारा आशातीत उपकार ही होता है । जब कभी हम घृणा अथवा क्रोध की वृत्ति को संयत करते हैं, तभी वह हमारे अनुकूल शुभ शक्ति के रूप में सचित होकर उच्चतर शक्ति मे परिणत हो जाती है ।

प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ॥३४॥

सूत्रार्थ— अथवा प्राणवायु को बाहर निकालने और धारण करने से भी (चित्त स्थिर होता है) ।

पातंजल-योगसूत्र १६३

**व्याख्या—**यहाँ पर 'प्राण' शब्द का व्यवहार हुआ है। प्राण ठीक श्वास नही है। समग्र जगत् मे जो शक्ति व्याप्त हो रही है, उसी का नाम है प्राण। संसार मे तुम जो कुछ देखते हो, जो कुछ हिलता-डुलता या कार्य करता है, जिसमें भी जीवन है—वह सब-का-सब इस प्राण की ही अभिव्यक्ति है। जगत् में जितनी भी शक्तियाँ विद्यमान है, उनकी समष्टि को प्राण कहते हैं। कल्प-आरम्भ के पूर्व यह प्राण एक प्रकार से बिलकुल गतिहीन अवस्था मे रहता है, और कल्प के शुरू होने पर वह फिर से व्यक्त होना प्रारम्भ करता है। यह प्राण ही गति के रूप मे—मनुष्यो अथवा अन्य प्राणियों में स्नायविक गति के रूप मे—प्रकाशित होता है। फिर यही विचार तथा अन्य शक्तियो के रूप में भी प्रकाशित होता है। यह सारा जगत् इस प्राण एव आकाश की समष्टि है। मनुष्य-देह के बारे मे भी ठीक यही बात है। जो कुछ तुम देखते हो या अनुभव करते हो, वे सारे पदार्थ आकाश से उत्पन्न हुए है और प्राण से सारी विभिन्न शक्तियाँ। इस प्राण को बाहर निकालने और धारण करने का नाम ही प्राणायाम है। योगदर्शन के पितृस्वरूप पतंजलि ने इस प्राणायाम के बारे मे कोई विशेष विधान नही किया है, परन्तु उनके बाद दूसरे योगियो ने इस प्राणायाम के सम्बन्ध मे अनेक तत्त्वो का आविष्कार कर उसकी एक महान् विद्या तैयार कर दी। पतंजलि के मतानुसार, यह प्राणायाम चित्तवृत्तिनिरोध के विभिन्न उपायो मे से केवल एक उपाय है, परन्तु उन्होने इस पर कोई विशेष जोर नही दिया है। उनका अभिप्राय इतना ही रहा है कि श्वास को बाहर निकालकर फिर से अन्दर खींच लो और कुछ देर तक उसे धारण किए रखो, उससे मन अपेक्षाकृत कुछ स्थिर हो,

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जायगा। किन्तु बाद में इसी से प्राणायाम नामक एक विशेष विद्या की उत्पत्ति हो गई। अब हम देखेंगे कि ये सब बाद के योगीगण उसके बारे मे क्या कहते हैं। इस सम्बन्ध में मैंने पहले ही कुछ कहा है, यहाँ पर उसकी कुछ पुनरावृत्ति करने से वह मन में पक्का बैठ जायगा। पहले तो, यह ध्यान रखना होगा कि यह प्राण ठीक श्वास-प्रश्वास नहीं है, वरन् जिस शक्ति के बल से श्वास-प्रश्वास को गति होती है, जो वस्तुत श्वास-प्रश्वास की भी जीवनी-शक्ति है, वही प्राण है। फिर, यह 'प्राण' शब्द सब इन्द्रियो के लिए भी व्यवहार मे लाया जाता है, वे सब-की-सब प्राण कहलाती हैं, मन को भी प्राण कहा जाता है॥ अतएव हम देखते है कि प्राण का अर्थ है शक्ति। तो भी इसे हम शक्ति नाम नहीं दे सकते, क्योकि शक्ति तो इस प्राण की अभिव्यक्ति मात्र है। यह प्राण ही शक्ति तथा नाना प्रकार की गति के रूप मे प्रकाशित होता है। चित्त यन्त्रस्वरूप होकर चारो ओर से प्राण को भीतर खींचता है और उससे शरीर-रक्षा करनेवाली विभिन्न जीवनी-शक्तियाँ तथा विचार, इच्छा एवं अन्यान्य सब शक्तियाँ उत्पन्न करता है। पूर्वोक्त प्राणायाम-क्रिया से हम शरीर की समस्त भिन्न-भिन्न गतियो को तथा शरीर के अन्तर्गत समस्त भिन्न-भिन्न स्नायविक शक्तिप्रवाहो को वश में ला सकते है। पहले हम उनको पहचानने लगते है, उनका साक्षात् अनुभव करने लगते है, और फिर धीरे-धीरे उन पर अधिकार प्राप्त करते जाते हैं—उनको वशीभूत करने में सफल होते जाते हैं। पतंजलि के बाद के इन योगियो के मतानुसार मनुष्य-देह मे तीन मुख्य प्राण-प्रवाह अर्थात् नाडियाँ हैं। वे एक को इड़ा, दूसरे को पिंगला और तीसरे को सुषुम्ना कहते

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हैं। उनके मतानुसार, पिंगला मेरुदण्ड के दाहिनी ओर है और इड़ा बाईं ओर, और उस मेरुदण्ड के मध्य में से होते हुए सुषुम्ना नाम की एक खोखली नाली है। उनके मतानुसार इड़ा और पिंगला ये दो नाड़ियाँ प्रत्येक मनुष्य में कार्य करती हैं, उनके सहारे ही हमारा जीवन चलता है। सुषुम्ना का कार्य सभी में होना सम्भव अवश्य है, किन्तु असल में योगी के शरीर में ही उसके भीतर से कार्य हुआ करता है। तुम्हें याद रखना चाहिए कि योगी योगसाधन के बल से अपने शरीर को परिवर्तित कर लेते हैं। तुम जितना ही साधन करोगे, तुम्हारा शरीर उतना ही परिवर्तित होता जायगा। साधन के पूर्व तुम्हारा शरीर जैसा था, बाद में वैसा नहीं रह जायगा। यह बात कोई अयौक्तिक नहीं है, युक्ति के द्वारा इसको समझाया जा सकता है। हम जो कुछ नए विचार सोचते हैं, वे मानो हमारे मस्तिष्क में एक नई प्रणाली तैयार कर देते हैं। इससे हम अच्छी तरह समझ सकते हैं कि मनुष्य-स्वभाव इतनी रक्षणशीलता का पक्षपाती क्यों है। मनुष्य-स्वभाव ही ऐसा है कि वह पहले चले हुए रास्ते में ही भ्रमण करना पसन्द करता है, क्योंकि वह अपेक्षाकृत सरल होता है। यदि दृष्टान्त के रूप में हम सोचें कि मन एक सुई के समान है और मस्तिष्क उसके सामने एक कोमल पिण्ड, तो, हम देखेंगे कि हमारा प्रत्येक विचार मस्तिष्क के अन्दर मानो एक रास्ता—एक लीक तैयार कर देता है, और यदि मस्तिष्क के अन्दर का धूसर पदार्थ उस रास्ते के चारों ओर एक सीमा खड़ी न कर दे, तो वह रास्ता बन्द हो जायगा। यदि वह धूसर रंगवाला पदार्थ न रहता, तो हमारी स्मृति ही सम्भव न होती; क्योंकि स्मृति का अर्थ है—मानो इन पुराने रास्तों पर से होकर