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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

२ राजयोग

२ राजयोग

में धर्म के सम्बन्ध में सर्वत्र ऐसी शिक्षा मिलती है कि धर्म केवल श्रद्धा और विश्वास पर स्थापित है, और अधिकांश स्थलों में तो वह भिन्न-भिन्न मतों की समष्टि मात्र है। यही कारण है कि धर्मों के बीच केवल विवाद-झगड़ा दिखाई देता है। ये मत फिर विश्वास पर स्थापित हैं। कोई-कोई कहते हैं कि बादलों के ऊपर एक महान् पुरुष है, वे ही सारे संसार का शासन करते हैं; और वक्ता महोदय केवल अपनी बात के बल पर ही मुझसे इनमें विश्वास करने को कहते हैं। मेरे भी ऐसे अनेक भाव हो सकते हैं, जिन पर विश्वास करने के लिए मैं दूसरों से कहता हूँ, और यदि वे कोई युक्ति चाहें, इस विश्वास का कारण पूछें, तो मैं उन्हें युक्ति-तर्क देने में असमर्थ हो जाता हूँ। इसीलिए आजकल धर्म और दर्शन-शास्त्रों की इतनी निन्दा सुनी जाती है। प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति का मानो यही मनोभाव है—“हटाओ, खाक-पत्थर है, धर्म क्या है, कुछ मतों के गट्ठे भर हैं। उनके सत्यासत्य-विचार का कोई एक मापदण्ड नहीं, जिसके जी में जो आया, बस वही बक गया।” किन्तु ये लोग चाहे जो कुछ सोचें, वास्तव में धर्म-विश्वास की एक सार्वभौमिक भित्ति है—वही विभिन्न देशों के विभिन्न सम्प्रदायों के भिन्न-भिन्न मतवादों और सब प्रकार की विभिन्न धारणाओं को नियमित करती है। उन सबके मूल में जाने पर हम देखते हैं कि वे भी सार्वजनिक अभिज्ञता और अनुभूति पर प्रतिष्ठित हैं।

पहली बात तो यह कि यदि आप पृथ्वी के भिन्न-भिन्न धर्मों का जरा विश्लेषण करें, तो आपको ज्ञात हो जायगा कि वे दो श्रेणियों में विभक्त हैं। कुछ की शास्त्र-भित्ति है, और कुछ की शास्त्र-भित्ति नहीं। जो शास्त्र-भित्ति पर स्थापित हैं वे सुदृढ़

अवतरणिका
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है, उन धर्मों के माननेवालो की सख्या भी अधिक है। जिनकी शास्त्र-भित्ति नही है, वे धर्म प्राय लुप्त हो गए है। कुछ नए उठे अवश्य है, पर उनके अनुयायी बहुत थोडे है। फिर भी उक्त सभी सम्प्रदायो मे यह मतैक्य दीख पडता है कि उनकी शिक्षा विशिष्ट व्यक्तियो के प्रत्यक्ष अनुभव मात्र है। ईसाई तुमसे अपने धर्म पर, ईसा पर, ईसा के अवतारत्व पर, ईश्वर और आत्मा के अस्तित्व पर और उस आत्मा की भविष्य उन्नति की सम्भवनीयता पर विश्वास करने को कहता है। यदि मै उससे इस विश्वास का कारण पूछूँ, तो वह कहता है, “यह मेरा विश्वास है।” किन्तु यदि तुम ईसाई धर्म के मूल मे जाओ, तो देखोगे कि वह भी प्रत्यक्ष अनुभूति पर स्थापित है। ईसा ने कहा है, “मैने ईश्वर के दर्शन किए हैं।” उनके शिष्यो ने भी कहा है, “हमने ईश्वर का अनुभव किया है।”—इत्यादि-इत्यादि।

बौद्ध धर्म के सम्बन्ध मे भी ऐसा ही है। बुद्धदेव की प्रत्यक्षानुभूति पर यह धर्म स्थापित है। उन्होने कुछ सत्यो का अनुभव किया था। उन्होने उन सबको देखा था, वे उन सत्यो के संस्पर्श मे आए थे, और उन्ही का उन्होने ससार मे प्रचार किया। हिन्दुओं के सम्बन्ध मे भी ठीक यही बात है, उनके शास्त्रो में ‘ऋषि’ नाम से सम्बोधित किए जानेवाले ग्रन्थकर्ता कह गए हैं, “हमने कुछ सत्यो के अनुभव किए हैं।” और उन्ही का वे ससार मे प्रचार कर गए हैं। अत यह स्पष्ट है कि ससार के समस्त धर्म उस प्रत्यक्ष अनुभव पर स्थापित है, जो ज्ञान की सार्वभौमिक और सुदृढ भित्ति है। सभी धर्माचार्यो ने ईश्वर को देखा था। उन सभी ने आत्मदर्शन किया था, अपने अनन्त स्वरूप का ज्ञान सभी को हुआ था, सबने अपनी भविष्य अवस्था देखी थी, और जो कुछ

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उन्होने देखा था, उसी का वे प्रचार कर गए। भेद इतना ही है कि इनमे से अधिकांश धर्मो मे, विशेषत आजकल, एक अद्भुत दावा हमारे सामने उपस्थित होता है, और वह यह कि ‘इस समय ये अनुभूतियाँ असम्भव है। जो धर्म के प्रथम संस्थापक हैं, वाद मे जिनके नाम से उस धर्म का प्रवर्तन और प्रचलन हुआ, ऐसे केवल थोडे व्यक्तियो के लिए ही ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव सम्भव हुआ था। अव ऐसे अनुभव के लिए कोई रास्ता नही रहा, फलत अव धर्म पर विश्वास भर कर लेना होगा।’ इस बात को मै पूरी शक्ति से अस्वीकृत करता हूँ। यदि ससार मे किसी प्रकार के विज्ञान के किसी विषय की किसी ने कभी प्रत्यक्ष उपलब्धि की है, तो इससे इस सार्वभौमिक सिद्धान्त पर पहुँचा जा सकता है कि पहले भी कोटि-कोटि बार उसकी उपलब्धि की सम्भावना थी और भविष्य मे भी अनन्त काल तक उनकी उपलब्धि की सम्भावना बनी रहेगी। एकरूपता ही प्रकृति का एक बडा नियम है। एक बार जो घटित हुआ है, वह पुन घटित हो सकता है।

इसीलिए योग-विद्या के आचार्यगण कहते हैं कि धर्म पूर्वकालीन अनुभूतियो पर केवल स्थापित ही नही, वरन् इन अनुभूतियो से स्वय सम्पन्न हुए बिना कोई भी धार्मिक नही हो सकता। जिस विद्या के द्वारा ये अनुभूतियाँ होती है, उसका नाम है योग। धर्म के सत्यो का जब तक कोई अनुभव नही कर लेता, तब तक धर्म की बात करना ही वृथा है। भगवान के नाम पर इतनी लडाई, विरोध और झगडा क्यो? भगवान के नाम पर जितना खून बहा है, उतना और किसी कारण से नही। ऐसा क्यो? इसीलिए कि कोई भी व्यक्ति मूल तक नही गया। सब लोग पूर्वजो के कुछ आचारो का अनुमोदन करके ही सन्तुष्ट थे। वे

अवतरणिका

चाहते थे कि दूसरे भी वैसा ही करें। जिन्हें आत्मा की अनुभूति या ईश्वर-साक्षात्कार न हुआ हो, उन्हें यह कहने का क्या अधिकार है कि आत्मा या ईश्वर है ? यदि ईश्वर हो, तो उनका साक्षात्कार करना होगा, यदि आत्मा नामक कोई चीज हो, तो उसकी उपलब्धि करनी होगी। अन्यथा विश्वास न करना ही भला। ढोंगी होने से स्पष्टवादी नास्तिक होना अच्छा। एक ओर, आजकल के विद्वान् कहलानेवाले मनुष्यों के मन का भाव यह है कि धर्म, दर्शन और परमपुरुष का अनुसन्धान यह सब निष्फल है। और दूसरी ओर, जो अर्धशिक्षित हैं, उनका मनोभाव ऐसा जान पड़ता है कि धर्म, दर्शन आदि की वास्तव में कोई बुनियाद नहीं, उनकी इतनी ही उपयोगिता है कि वे संसार के मंगल-साधन की बलशाली प्रेरक शक्तियाँ हैं,—यदि लोगों का ईश्वर की सत्ता में विश्वास रहेगा, तो वे सत्, नीति-परायण और सौजन्यशाली नागरिक होंगे। जिनके ऐसे मनोभाव हैं, उनको इसके लिए दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि वे धर्म के सम्बन्ध में जो शिक्षा पाते हैं, वह केवल सारशून्य, अर्थहीन अनन्त शब्दसमष्टि पर विश्वास मात्र है। उन लोगों से शब्दों पर विश्वास करके रहने के लिए कहा जाता है, क्या ऐसा कोई कभी कर सकता है ? यदि मनुष्य द्वारा यह सम्भव होता, तो मानव-प्रकृति पर मेरी तिलमात्र श्रद्धा न रहती। मनुष्य चाहता है सत्य, वह सत्य का स्वयं अनुभव करना चाहता है, और जब वह सत्य की धारणा कर लेता है, सत्य का साक्षात्कार कर लेता है, हृदय के अन्तरतम प्रदेश में उसका अनुभव कर लेता है, वेद कहते हैं, तभी उसके सारे सन्देह दूर होते हैं, सारा तमोजाल छिन्न-भिन्न हो जाता है और सारी वक्रता सीधी हो जाती है—

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"भिद्यते हृदयग्रन्थिश्च्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥"*
"शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा
आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः ।"†
"वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्
आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वाति मृत्युमेति
नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥"‡

"हे अमृत के पुत्रो, हे दिव्यधामनिवासियो, सुनो—मैंने अज्ञानान्धकार से आलोक में जाने का रास्ता पा लिया है। जो समस्त तम के पार है, उनको जानने पर ही वहाँ जाया जा सकता है—मुक्ति का और कोई दूसरा उपाय नहीं।"

इस सत्य को प्राप्त करने के लिए, राजयोग-विद्या मानव के समक्ष यथार्थ व्यावहारिक और साधनोपयोगी वैज्ञानिक प्रणाली रखने का प्रस्ताव करती है। पहले तो, प्रत्येक विद्या के अनुसन्धान और साधन की प्रणाली पृथक्-पृथक् है। यदि तुम ज्योतिषी होने की इच्छा करो और बैठे-बैठे केवल ज्योतिष-ज्योतिष कहकर चिल्लाते रहो, तो तुम कभी ज्योतिषशास्त्र के अधिकारी न हो सकोगे। रसायनशास्त्र के सम्बन्ध में भी ऐसा ही है, उसमें भी एक निर्दिष्ट प्रणाली का अनुसरण करना होगा, प्रयोगशाला (laboratory) में जाकर विभिन्न द्रव्यादि लेने होंगे, उनको एकत्र करना होगा, उन्हें उचित अनुपात में मिलाना होगा, फिर


* मुण्डक उपनिषद्—२।२।८
† श्वेताश्वतर उपनिषद्—२।५
‡ श्वेताश्वतर उपनिषद्—३।८

अवतरणिका ७

उनको लेकर उनकी परीक्षा करनी होगी, तब कही तुम रसायन-वित् हो सकोगे। यदि तुम ज्योतिषी होना चाहते हो, तो तुम्हे वेधशाला मे जाकर दूरबीन की सहायता से ताराओ और ग्रहो का पर्यवेक्षण करके उनके विषय मे आलोचना करनी होगी, तभी तुम ज्योतिषी हो सकोगे। प्रत्येक विद्या की अपनी एक निर्दिष्ट प्रणाली है। मै तुम्हे सैकडो उपदेश दे सकता हूँ, परन्तु तुम यदि साधना न करो, तो तुम कभी धार्मिक न हो सकोगे। सभी युगो में, सभी देशो मे, निष्काम, शुद्धस्वभाव साधु-महापुरुष इसी सत्य का प्रचार कर गए है। ससार का हित छोडकर अन्य कोई कामना उनमे नही थी। उन सभी लोगो ने कहा है कि इन्द्रियाँ हमे जहाँ तक सत्य का अनुभव करा सकती है, हमने उससे उच्चतर सत्य प्राप्त कर लिया है, और वे उसकी परीक्षा के लिए तुम्हे बुलाते है। वे कहते है, 'तुम एक निर्दिष्ट साधन-प्रणाली लेकर सरल भाव से साधना करते रहो, और यदि यह उच्चतर सत्य प्राप्त न हो, तो फिर भले ही कह सकते हो कि इस उच्चतर सत्य के सम्बन्ध की बाते केवल कपोलकल्पित है। पर हाँ, इससे पहले इन उक्तियो की सत्यता को बिल्कुल अस्वीकृत कर देना किसी तरह युक्तिपूर्ण नही है।' अतएव निर्दिष्ट साधन-प्रणाली लेकर श्रद्धापूर्वक साधना करना हमारे लिए आवश्यक है, और तब प्रकाश निश्चय ही आयगा।

कोई ज्ञान प्राप्त करने के लिए हम साधारणीकरण की सहायता लेते है। इसके लिए घटनाओ का पर्यवेक्षण आवश्यक है। हम पहले घटनावली का पर्यवेक्षण करते है, फिर उनका साधारणीकरण करते है और फिर उनसे अपने सिद्धान्त या मतामत निकालते है। हम जब तक यह प्रत्यक्ष नही कर लेते कि हमारे मन के