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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

संक्षेप में राजयोग १०९

संक्षेप में राजयोग १०९

है। उसका अर्थ है, "हम इस जगत् के जन्मदाता परम देवता के तेज का ध्यान करते हैं, वे हमारी बुद्धि मे ज्ञान का विकास कर दे।" इस मन्त्र के आदि और अन्त मे प्रणव लगा हुआ है। एक प्राणायाम मे गायत्री का तीन बार मन-ही-मन उच्चारण करना पड़ता है। प्रत्येक शास्त्र मे कहा गया है कि प्राणायाम तीन अंशो मे विभक्त है—जैसे, रेचक अर्थात् श्वास-त्याग, पूरक अर्थात् श्वास-ग्रहण और कुम्भक अर्थात् स्थिति—भीतर मे धारण करना। अनुभवशक्तियुक्त इन्द्रियाँ लगातार बहिर्मुखी होकर काम कर रही हैं और बाहर की वस्तुओं के सम्पर्क मे आ रही हैं। उनको अपने वश मे लाने को प्रत्याहार कहते हैं। अपनी ओर खींचना या आहरण करना—यही प्रत्याहार शब्द का प्रकृत अर्थ है।

हृत्कमल मे या सिर के ठीक मध्य देश में या शरीर के अन्य किसी स्थान मे मन को धारण करने का नाम है धारणा। मन को एक स्थान मे संलग्न करके, फिर उस एकमात्र स्थान को अवलम्बनस्वरूप मानकर एक विशिष्ट प्रकार के वृत्ति-प्रवाह उठाए जाते हैं, दूसरे प्रकार के वृत्ति-प्रवाहों से उनको बचाने का प्रयत्न करते-करते वे प्रथमोक्त वृत्ति-प्रवाह क्रमश प्रबल आकार धारण कर लेते हैं, और ये दूसरे वृत्ति-प्रवाह कम होते-होते अन्त मे बिलकुल चले जाते हैं। फिर बाद मे उन प्रथमोक्त वृत्तियों का भी नाश हो जाता है और केवल एक वृत्ति वर्तमान रह जाती है। इसे 'ध्यान' कहते हैं। और जब इस अवलम्बन की भी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती, सम्पूर्ण मन जब एक तरंग के रूप मे परिणत हो जाता है, तब मन की इस एकरूपता का नाम है समाधि। तब किसी विशेष प्रदेश या चक्रविशेष का

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अवलम्बन करके ध्यान-प्रवाह उत्थापित नही होता, केवल ध्येय वस्तु का भाव (अर्थ) मात्र अवशिष्ट रहता है। यदि मन को किसी स्थान मे १२ सेकण्ड धारण किया जाय, तो उससे एक धारणा होगी, यह धारणा द्वादश गुणित होने पर एक ध्यान, और यह ध्यान द्वादश गुणित होने पर एक समाधि होगी।

सूखे पत्तो से ढकी हुई जमीन पर, चौराहे पर, अत्यन्त कोलाहलपूर्ण या डरावने स्थान मे, दीमक के ढेर के समीप, अथवा जहाँ अग्नि या जल से किसी भय की आशङ्का हो, जहाँ जंगली जानवर हो, जो स्थान दुष्ट लोगो से भरा हो—ऐसे स्थानो मे योग की साधना करना उचित नही। यह व्यवस्था ‘विशेषकर भारत के बारे मे लागू होती है। जब शरीर अत्यन्त आलसी या बीमार मालूम होता हो अथवा जब मन अत्यन्त दुःखपूर्ण रहता हो, तब भी साधना नही करनी चाहिए। किसी गुप्त और निर्जन स्थान मे जाकर साधना करो, जहाँ लोग तुम्हे वाधा पहुँचाने न आ सके। अपवित्र जगह मे बैठकर साधना मत करना, वरन् सुन्दर दृश्यवाले स्थान मे या अपने घर की एक सुन्दर कोठरी में बैठकर साधना करना। साधना मे प्रवृत्त होने के पहले समस्त प्राचीन योगियो, अपने गुरुदेव तथा भगवान को प्रणाम करना और फिर साधना मे प्रवृत्त होना।

ध्यान का विषय पहले ही कहा जा चुका है। अब ध्यान की कुछ प्रणालियाँ वर्णित की जाती हैं। सीधे बैठकर अपनी नाक के ऊपरी भाग पर दृष्टि रखो। तुम देखोगे ‘कि उससे मन की स्थिरता में विशेष रूप से सहायता मिलती है। आँख के दो स्नायुओ को वश में लाने से प्रतिक्रिया के केन्द्रस्थल को काफी वश में लाया जा सकता है,