सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

८ राजयोग

८ राजयोग

भीतर क्या हो रहा है और क्या नही, तब तक हम अपने मन के सम्बन्ध मे, मनुष्य की आभ्यन्तरिक प्रकृति के सम्बन्ध मे, मनुष्य के विचार के सम्बन्ध में कुछ भी नही जान सकते। बाह्य जगत् के व्यापारो का पर्यवेक्षण करना अपेक्षाकृत सहज है, क्योकि उसके लिए हजारो यन्त्र निर्मित हो चुके हैं, पर अन्तर्जगत् के व्यापार को समझने में मदद करनेवाला कोई भी यन्त्र नही। किन्तु फिर भी हम यह निश्चयपूर्वक जानते है कि किसी विषय का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने के लिए पर्यवेक्षण आवश्यक है। उचित विश्लेषण के बिना विज्ञान निरर्थक और निष्फल होकर केवल भित्तिहीन अनुमान मे परिणत हो जाता है। इसी कारण, उन थोडे से मनस्तत्त्वान्वेषियो को छोडकर, जिन्होने पर्यवेक्षण करने के उपाय जान लिए हैं, शेष सब लोग चिरकाल से केवल विवाद ही करते आ रहे हैं।

राजयोग-विद्या पहले मनुष्य को उसकी अपनी आभ्यन्तरिक अवस्थाओ के पर्यवेक्षण का रास्ता दिखा देती है। मन ही उस पर्यवेक्षण का यन्त्र है। किसी विशिष्ट विषय को समझने की हमारी शक्ति का सही-सही नियमन कर जब उसे अन्तर्जगत् की ओर परिचालित किया जाता है, तभी वह मन के अग-प्रत्यग का विश्लेषण कर सकती है, और तब उसके प्रकाश से हम यह सही-सही समझ सकते हैं कि अपने मन के भीतर क्या घट रहा है। मन की शक्तियाँ इधर-उधर बिखरी हुई प्रकाश की किरणो के समान हे। जब उन्हे केन्द्रीभूत किया जाता है, तब वे सब कुछ आलोकित कर देती हैं। यही ज्ञान का हमारा एकमात्र उपाय है। बाह्य जगत् मे हो अथवा अन्तर्जगत् मे, लोग इसी को काम मे ला रहे हैं। पर वैज्ञानिक जिस सूक्ष्म पर्यवेक्षण-शक्ति का प्रयोग बहि-

अवतरणिका

९

र्जगत् मे करता है, मनस्तत्त्वान्वेषी उसी का मन पर करते हैं। इसके लिए काफी अभ्यास आवश्यक है। बचपन से हमने केवल बाहरी वस्तुओ मे मनोनिवेश करना सीखा है, अन्तर्जगत् मे मनोनिवेश करने की शिक्षा नहीं पाई। इसी कारण हममे से अधिकांश अन्तर्यन्त्र की निरीक्षण-शक्ति खो बैठे है। मन को अन्तर्मुखी करना, उसकी बहिर्मुखी गति को रोकना, उसकी समस्त शक्तियो को केन्द्रीभूत कर उस मन के ही ऊपर उनका प्रयोग करना, ताकि वह अपना स्वभाव समझ सके, अपने आपको विश्लेषण करके देख सके—एक अत्यन्त कठिन कार्य है। पर इस विषय मे वैज्ञानिक प्रथा के अनुसार अग्रसर होने के लिए वही तो एकमात्र उपाय है।

इस तरह के ज्ञान की उपयोगिता क्या है ? पहले तो, ज्ञान ही ज्ञान का सर्वोच्च पुरस्कार है, दूसरे, इसकी उपयोगिता भी है—यह समस्त दु खो का हरण करेगा। जब मनुष्य अपने मन का विश्लेषण करते-करते ऐसी एक वस्तु के साक्षात् दर्शन कर लेता है, जिसका किसी काल मे नाश नही, जो स्वरूपतः नित्यपूर्ण और नित्यशुद्ध है, तब उसको फिर दु ख नही रह जाता, उसका सारा विषाद न जाने कहाँ गायब हो जाता है। भय और अपूर्ण वासना ही समस्त दु खो का मूल है। पूर्वोक्त अवस्था के प्राप्त होने पर मनुष्य समझ जाता है कि उसकी मृत्यु किसी काल मे नही है, तब उसे फिर मृत्यु-भय नही रह जाता। अपने को पूर्ण समझ सकने पर असार वासनाएँ फिर नही रहती । पूर्वोक्त कारणद्वय का अभाव हो जाने पर फिर कोई दु ख नही रह जाता। उसकी जगह इसी देह मे परमानन्द की प्राप्ति हो जाती है।

ज्ञानलाभ का एकमात्र उपाय है एकाग्रता। रसायन तत्त्वान्वेषी अपनी प्रयोगशाला मे जाकर अपने मन की समस्त शक्तियों

१० राजयोग

को केन्द्रीभूत करके, जिन वस्तुओ का वह विश्लेषण करता है, उन पर प्रयोग करता है, और इस प्रकार वह उनके रहस्य जान लेता है। ज्योतिषी अपने मन की समुदाय शक्तियों को एकत्र करके दूरबीन के भीतर से आकाश मे प्रक्षिप्त करता है, और बस त्योही सूर्य, चन्द्र और ताराएँ अपना-अपना रहस्य उसके निकट खोल देती हैं। मै जिस विषय पर बातचीत कर रहा हूँ, उस विषय मे मैं जितना मनोनिवेश कर सकूँगा, उतना ही उस विषय का गूढ तत्त्व तुम लोगो के निकट प्रकट कर सकूँगा। तुम लोग मेरी बात सुन रहे हो, तुम लोग जितना इस विषय मे मनोनिवेश करोगे, उतनी ही मेरी बात की स्पष्ट रूप से धारणा कर सकोगे।

मन की शक्तियो को एकाग्र करने के सिवा अन्य किस तरह ससार मे ये समस्त ज्ञान उपलब्ध हुए है ? यदि प्रकृति के द्वार पर आघात करना मालूम हो गया—उस पर कैसे धक्का देना चाहिए, यह ज्ञात हो गया, तो बस प्रकृति अपना सारा रहस्य खोल देती है। उस आघात की शक्ति और तीव्रता एकाग्रता से ही आती है। मानव-मन की शक्ति की कोई सीमा नही। वह जितना ही एकाग्र होता है, उतनी ही उसकी शक्ति एक लक्ष्य पर आती है, बस यही रहस्य है।

मन को बाहरी विषय पर स्थिर करना अपेक्षाकृत सहज है। मन स्वभावत बहिर्मुखी है। किन्तु धर्म, मनोविज्ञान अथवा दर्शन के विषय मे ऐसा नही है। यहाँ तो ज्ञाता और ज्ञेय (विषयी और विषय) एक है। यहाँ प्रमेय (विषय) एक अन्दर की वस्तु है--मन ही यहाँ प्रमेय है। मनस्तत्त्व का अन्वेषण करना ही यहाँ प्रयोजन है, और मन ही मनस्तत्त्व के अन्वेषण का कर्ता है।

अवतरणिका ११

हमें मालूम है कि मन की एक ऐसी शक्ति है, जिससे वह अपने अन्दर जो कुछ हो रहा है उसे देख सकता है—इसको अन्त-पर्यवेक्षण-शक्ति कह सकते हैं। मैं तुमसे बातचीत कर रहा हूँ, फिर साथ ही मैं मानो एक और व्यक्ति होकर बाहर खड़ा हूँ और जो कुछ कह रहा हूँ, वह जान-सुन रहा हूँ। तुम एक ही समय काम और चिन्तन दोनों कर रहे हो, परन्तु तुम्हारे मन का एक और अंश मानो बाहर खड़े होकर तुम जो कुछ चिन्तन कर रहे हो, उसे देख रहा है। मन की समस्त शक्तियों को एकत्रित करके मन पर ही उनका प्रयोग करना होगा। जैसे सूर्य की तीक्ष्ण किरणों के सामने घने अन्धकारमय स्थान भी अपने गुप्त तथ्य खोल देते हैं, उसी तरह यह एकाग्र मन अपने सब अन्तरतम रहस्य प्रकाशित कर देगा। तब हम विश्वास की सच्ची बुनियाद पर पहुँचेंगे। तभी हमको सही-सही धर्म-प्राप्ति होगी। तभी, आत्मा है या नहीं, जीवन केवल इस सामान्य जीवितकाल तक ही सीमित है अथवा अनन्तकालव्यापी है और संसार में कोई ईश्वर है या नहीं, यह सब हम स्वयं देख सकेंगे। सब कुछ हमारे ज्ञानचक्षुओं के सामने उद्भासित हो उठेगा। राजयोग हमें यही शिक्षा देने के लिए अग्रसर होता है। इसमें जितने उपदेश हैं, उन सबका उद्देश्य, प्रथमतः, मन की एकाग्रता का साधन है, इसके बाद है—उसके गम्भीरतम प्रदेश में कितने प्रकार के भिन्न-भिन्न कार्य हो रहे हैं, उनका ज्ञान प्राप्त करना, और तत्पश्चात् उनसे साधारण सत्यों को निकालकर उनसे अपने एक सिद्धान्त पर उपनीत होना। इसी लिए राजयोग की शिक्षा किसी धर्मविशेष पर आधारित नहीं है। तुम्हारा धर्म चाहे जो हो—तुम चाहे आस्तिक हो या नास्तिक, यहूदी या बौद्ध या ईसाई—इससे कुछ बनता-बिगड़ता

१२ राजयोग

= नही, तुम मनुष्य हो, बस यही पर्याप्त है। प्रत्येक मनुष्य में धर्मतत्त्व का अनुसन्धान करने की शक्ति है, उसे उसका अधिकार है। प्रत्येक व्यक्ति का, किसी भी विषय में क्यो न हो, कारण पूछने का अधिकार है, और उसमें ऐसी शक्ति भी है कि वह अपने भीतर से ही उन प्रश्नो के उत्तर पा सके। पर हाँ, उसे इसके लिए कुछ कष्ट उठाना पड़ेगा।

अब तक हमने देखा, इस राजयोग की साधना में किसी प्रकार के विश्वास की आवश्यकता नही। जब तक कोई बात स्वयं प्रत्यक्ष न कर सको, तब तक उस पर विश्वास न करो—राजयोग यही शिक्षा देता है। सत्य को प्रतिष्ठित करने के लिए अन्य किसी सहायता की आवश्यकता नही। क्या तुम कहना चाहते हो कि जाग्रत् अवस्था की सत्यता के प्रमाण के लिए स्वप्न अथवा कल्पना की सहायता की जरूरत है ? नही, कभी नही। इस राजयोग की साधना में दीर्घ काल और निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता है। इस अभ्यास का कुछ अंश शरीर-संयम विषयक है, परन्तु इसका अधिकांश मन संयमात्मक है। हम क्रमशः समझेंगे, मन और शरीर में किस प्रकार का सम्बन्ध है। यदि हम विश्वास करे कि मन शरीर की केवल एक सूक्ष्म अवस्थाविशेष है और मन शरीर पर कार्य करता है, तो हमे यह भी स्वीकार करना होगा कि शरीर भी मन पर कार्य करता है। शरीर के अस्वस्थ होने पर मन भी अस्वस्थ हो जाता है, शरीर स्वस्थ रहने पर मन भी स्वस्थ और तेजस्वी रहता है। जब किसी व्यक्ति को क्रोध आता है, तब उसका मन अस्थिर हो जाता है। मन की अस्थिरता के कारण शरीर भी पूरी तरह अस्थिर हो जाता है। अधिकांश लोगो का मन शरीर के सम्पूर्ण अधीन रहता है। असल

अवतरणिका १३-

मे उनके मन की शक्ति बहुत थोडे परिमाण मे विकसित हुई रहती है। यदि तुम लोग कुछ बुरा न मानो, तो कहूँ, अधिकांश मनुष्य पशु से बहुत थोडे ही उन्नत है, क्योकि अधिकांश स्थलो मे तो उनकी संयम की शक्ति पशु-पक्षियो से कोई विशेष अधिक नही। हममे मन के निग्रह की शक्ति बहुत थोडी है। मन पर यह अधिकार पाने के लिए, शरीर और मन पर आधिपत्य लाने के लिए कुछ बहिरंग साधनाओ की—दैहिक साधनाओ की आवश्यकता है। शरीर जब पूरी तरह अधिकार मे आ जायगा, तब मन को हिलाने-डुलाने का समय आयगा। इस तरह मन जब बहुत-कुछ वश मे आ जायगा, तब हम इच्छानुसार उससे काम ले सकेगे, उसकी वृत्तियो को एकमुखी होने के लिए मजबूर कर सकेगे।

राजयोगी के मतानुसार यह सम्पूर्ण बहिर्जगत् अन्तर्जगत् या सूक्ष्म जगत् का स्थूल विकास मात्र है। सभी स्थलो मे सूक्ष्म को कारण और स्थूल को कार्य समझना होगा। इस नियम से, बहिर्जगत् कार्य है और अन्तर्जगत् कारण। इसी हिसाब से, स्थूल जगत् की परिदृश्यमान शक्तियाँ आभ्यन्तरिक सूक्ष्मतर शक्तियो का स्थूल भाग मात्र है। जिन्होने इन आभ्यन्तरिक शक्तियो का आविष्कार करके उन्हे इच्छानुसार चलाना सीख लिया है, वे सम्पूर्ण प्रकृति को वश मे कर सकते है। सम्पूर्ण जगत को वशीभूत करना और सारी प्रकृति पर अधिकार हासिल करना—इस बृहत् कार्य को योगी अपना कर्त्तव्य समझते है। वे एक ऐसी अवस्था मे जाना चाहते हैं, जहाँ, हम जिन्हे 'प्रकृति के नियम' कहते हैं, वे उन पर कोई प्रभाव नही डाल सकते, जिस अवस्था में वे उन सब को पार कर जाते हैं। तब वे आभ्यन्तरिक और बाह्य समस्त

९४

राजयोग

-प्रकृति पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेते हैं। मनुष्य-जाति की उन्नति और सभ्यता इस प्रकृति को वशीभूत करने की शक्ति पर निर्भर है।

इस प्रकृति को वशीभूत करने के लिए भिन्न-भिन्न जातियाँ भिन्न-भिन्न प्रणालियों का सहारा लेती हैं। जैसे एक ही समाज के भीतर कुछ व्यक्ति वाह्य प्रकृति को और कुछ अन्त प्रकृति को वशीभूत करने की चेष्टा करते हैं, वैसे ही भिन्न-भिन्न जातियों में कोई-कोई जातियाँ वाह्य प्रकृति को, तो कोई-कोई अन्त प्रकृति को वशीभूत करने का प्रयत्न करती हैं। किसी के मत से, अन्त - प्रकृति को वशीभूत करने पर सब कुछ वशीभूत हो जाता है, फिर दूसरों के मत से, वाह्य प्रकृति को वशीभूत करने पर सब कुछ वश में आ जाता है। इन दो सिद्धान्तों के चरम भावों को देखने पर यह प्रतीत होता है कि दोनों ही सिद्धान्त सही हैं, क्योंकि यथार्थत प्रकृति में वाह्य और अभ्यन्तर जैसा कोई भेद नहीं। यह केवल एक काल्पनिक विभाग है। ऐसे विभाग का कोई अस्तित्व ही नहीं, और यह कभी था भी नहीं। वहिर्वादी और अन्तर्वादी जब अपने-अपने ज्ञान की चरम सीमा प्राप्त कर लेंगे, तब दोनों अवश्य एक ही स्थान पर पहुँच जायेंगे। जैसे वहिर्विज्ञानवादी जब अपने ज्ञान को चरम सीमा पर ले जायेंगे, तो अन्त में उन्हें दार्शनिक होना होगा, उसी प्रकार दार्शनिक भी देखेंगे कि वे मन और भूत के नाम से जो दो भेद कर रहे थे, वह वास्तव में कल्पना मात्र है, वह एक दिन बिलकुल विलीन हो जायगी।

जिससे यह बहु उत्पन्न हुआ है जो एक पदार्थ बहु रूपों में प्रकाशित हुआ है, उसका निर्णय करना ही समस्त विज्ञान का मुख्य उद्देश्य और लक्ष्य है। राजयोगी कहते हैं, हम पहले

अवतरणिका १५

अन्तर्जगत् का ज्ञान प्राप्त करेंगे, फिर उसी के द्वारा बाह्य और अन्दर उभय प्रकृति को वशीभूत कर लेंगे। प्राचीन काल से ही लोग इसके लिए प्रयत्नशील रहे हैं। भारतवर्ष में इसकी विशेष चेष्टा होती रही है, परन्तु दूसरी जातियों ने भी इस ओर कुछ प्रयत्न किए हैं। पाश्चात्य देशों में लोग इसको रहस्य या गुप्त-विद्या सोचते थे, जो लोग इसका अभ्यास करने जाते थे, उन पर अघोरी, डाइन, ऐन्द्रजालिक आदि अपवाद लगाकर उन्हें जला दिया अथवा मार डाला जाता था। भारतवर्ष में अनेक कारणों से यह विद्या ऐसे व्यक्तियों के हाथ पड़ी, जिन्होंने इसका ९० प्रतिशत अंश नष्ट कर डाला और शेष को गुप्त रीति से रखने की चेष्टा की। आजकल पश्चिमी देशों में, भारतवर्ष के गुरुओं की अपेक्षा निकृष्टतर अनेक गुरु-नामधारी व्यक्ति दिखाई पड़ते हैं। भारतवर्ष के गुरु फिर भी कुछ जानते थे, पर ये आधुनिक गुरु तो कुछ भी नहीं जानते।

इन सारी योग-प्रणालियों में जो कुछ गुह्य या रहस्यात्मक है, सब छोड़ देना पड़ेगा। जिससे बल मिलता है, उसी का अनुसरण करना चाहिए। अन्यान्य विषयों में जैसा है, धर्म में भी ठीक वैसा ही है—जो तुमको दुर्बल बनाता है, वह समूल त्याज्य है। रहस्य-स्पृहा मानव-मस्तिष्क को दुर्बल कर देती है। इसके कारण ही आज योगशास्त्र नष्ट-सा हो गया है। किन्तु वास्तव में यह एक महाविज्ञान है। चार हजार वर्ष से भी पहले यह आविष्कृत हुआ था। तब से भारतवर्ष में यह प्रणालीबद्ध होकर वर्णित और प्रचारित होता रहा है। यह एक आश्चर्यजनक बात है कि व्याख्याकार जितना आधुनिक है, उसका भ्रम भी उतना ही अधिक है, और लेखक जितना प्राचीन है,