राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
पातजल-योगसूत्र—४ २६१
पातजल-योगसूत्र—४ २६१
प्राचीन योगियो का परिणामवाद (विकासवाद) आज आधुनिक विज्ञान के प्रकाश में अपेक्षाकृत अच्छी तरह समझ में आ सकेगा। फिर भी योगियो की व्याख्या आधुनिक व्याख्या से कही श्रेष्ठ है। आधुनिक मत कहता है, विकास (परिणाम) के दो कारण हैं—'यौन-निर्वाचन' (sexual selection) और 'योग्यतम की अवस्थिति' (survival of the fittest)*। पर ये दो कारण पर्याप्त नही मालूम होते। मान लो, मानवी ज्ञान उतना उन्नत हो गया कि शरीर-धारण तथा पति या पत्नी की प्राप्ति सम्बन्धी प्रतियोगिता उठ गई। तब तो आधुनिक विज्ञानवेत्ताओ के मतानुसार, मानवी उन्नति-प्रवाह रुद्ध हो जायगा और जाति की मृत्यु हो जायगी। फिर, इस मत के फलस्वरूप तो प्रत्येक अत्याचारी व्यक्ति अपने विवेक से छुटकारा पाने की एक युक्ति पा लेता है। ऐसे मनुष्यो की कमी नही, जो दार्शनिक नामधारी बनकर, जितने भी दुष्ट और अनुपयुक्त मनुष्य है (मानो ये ही उपयुक्तता-अनुपयुक्तता के एकमात्र विचारक हैं), उन सबको मार डालकर मनुष्य-जाति की रक्षा करना चाहते हैं! किन्तु प्राचीन परिणामवादी महा-पुरुष पतञ्जलि कहते हैं कि परिणाम या विकास का वास्तविक रहस्य है--प्रत्येक व्यक्ति मे जो पूर्णता पहले से ही निहित है, उसी की अभिव्यक्ति या विकास मात्र। वे कहते हैं कि इस
* डारविन का मत है कि जगत् का क्रमविकास कुछ निर्दिष्ट नियमो के अनुसार होता है, उनमें 'यौन-निर्वाचन' और 'योग्यतम की अवस्थिति' ही प्रधान हैं। प्रत्येक जीव अपना उपयुक्त पति या पत्नी निर्वाचित कर लेता है, और जो सबसे योग्य है, वही अन्त तक बचा रहता है, यही इन दोनो बातो का अर्थ है।
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पूर्णता ही अभिव्यक्ति में आ जा रही है। हमारे अन्दर यह पूर्णतारूप अनन्त तरङ्गराशि आगे को प्रवाहित करने के लिए प्रयत्न कर रही है। ये सङ्घर्ष और होड़ केवल हमारे अज्ञान के फल हैं। ये इसलिए होते हैं कि हम यह नहीं जानते कि यह दरवाजा कैसे खोला जाय और पानी भीतर कैसे लाया जाय। हमारे पीछे जो अनन्त तरङ्गराशि है, वह अपने को प्रकाशित करेगी ही। वही समस्त अभिव्यक्ति का कारण है। केवल जीवन-धारण या इन्द्रियों को तृप्तार्थ करने की चेष्टा उस अभिव्यक्ति का कारण नहीं है। ये सब संघर्ष तो वास्तव में क्षणिक हैं, अनावश्यक हैं, बाह्य व्यापार मात्र हैं। ये सब अज्ञान से पैदा हुए हैं। सारी होड़ बन्द हो जाने पर भी, जब तक हममें से प्रत्येक व्यक्ति पूर्ण नहीं हो जाता, तब तक हमारे भीतर निहित यह पूर्णस्वभाव हमें क्रमशः उन्नति की ओर अग्रसर कराता रहेगा। अतः यह विश्वास करने का कोई कारण नहीं कि होड़ या प्रतियोगिता उन्नति के लिए आवश्यक है। पशु के भीतर मनुष्य गूढ़भाव से निहित है, ज्योंही किवाड़ खोल दिया जाता है, अर्थात् ज्योंही बाधा हट जाती है, त्योंही वह मनुष्य प्रकाशित हो जाता है। इसी प्रकार, मनुष्य के भीतर भी देवता गूढ़भाव से विद्यमान है, केवल अज्ञान का आवरण उसे प्रकाशित नहीं होने देता। जब ज्ञान इस आवरण को चीर डालता है, तब भीतर का वह देवता प्रकाशित हो जाता है।
निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात् ॥४॥
सूत्रार्थ—बनाए हुए चित्त केवल अस्मिता (अहं-तत्त्व) से होते हैं।
पातंजल-योगसूत्र-४ २६३
व्याख्या--कर्मवाद का तात्पर्य यह है कि हमें अपने भले-बुरे कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है, और सारे दर्शनशास्त्रों का एकमात्र उद्देश्य यह है कि मनुष्य अपनी महिमा को जान ले। सभी शास्त्र मनुष्य की—आत्मा की—महिमा की घोषणा कर रहे हैं, फिर उसके साथ-साथ कर्मवाद का भी प्रचार कर रहे हैं। शुभकर्मों का शुभ फल और अशुभ कर्मों का अशुभ फल होता है। यदि शुभ और अशुभ कर्म आत्मा पर प्रभाव डाल सकते हों, तो फिर आत्मा तो कुछ भी नहीं रही। वास्तव में अशुभ कर्म तो पुरुष के अपने स्वरूप के प्रकाश में बाधा भर डालते हैं, और शुभ कर्म उन बाधाओं को दूर कर देते हैं, तभी पुरुष की महिमा प्रकाशित होती है। स्वयं पुरुष में कभी परिवर्तन नहीं होता। तुम चाहे जो करो, तुम्हारी महिमा को—तुम्हारे अपने स्वरूप को कुछ भी नष्ट नहीं कर सकता, क्योंकि कोई भी वस्तु आत्मा पर प्रभाव नहीं डाल सकती। उससे आत्मा पर मानो एक आवरण भर पड़ जाता है, जिससे आत्मा की पूर्णता ढक जाती है।
योगीगण जल्दी-जल्दी कर्म का क्षय कर डालने के लिए काय-व्यूह (शरीरसमूह) का सृजन करते हैं। फिर इन सब शरीरों के लिए वे अपनी अस्मिता या अहंतत्त्व से बहुतसे चित्तों की सृष्टि करते हैं। इन निर्मित चित्तों को, मूल चित्त से उनका भेद स्पष्ट करने के लिए, 'निर्माणचित्त' कहते हैं।
प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम् ॥५॥
सूत्रार्थ—यद्यपि इन विभिन्न बनाए हुए चित्तों के कार्य नाना प्रकार के हैं, तो भी वह एक आदि (मूल) चित्त ही उन सबों का नियन्ता है।
व्याख्या—ये अलग-अलग मन (चित्त), जो अलग-
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अलग देहो में कार्य करते है, 'निर्माणचित्त' कहलाते हैं और इन निर्मित शरीरो को 'निर्माणदेह' कहते है । भूत और मन मानो दो अनन्त भाण्डार के समान है । योगी होने पर ही तुम उन पर अधिकार प्राप्त करने का रहस्य जान सकोगे । तुम्हे तो वह सदैव विदित था, पर तुम उसे भूल भर गए थे । तुम जब योगी हो जाओगे, तो वह फिर से तुम्हारी स्मृति मे आ जायगा । तब तुम उसे लेकर जो इच्छा हो वही कर सकोगे । जिस उपादान से इस बृहत् ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति होती है, यह निर्माणचित्त भी उसी उपादान से निर्मित होता है । मन और भूत आपस में एक दूसरे से बिलकुल भिन्न पदार्थ नही है, वे तो एक ही पदार्थ की दो विभिन्न अवस्थाएँ मात्र है । अस्मिता ही वह उपादान, वह सूक्ष्म वस्तु है, जिससे योगी के ये निर्माणचित्त और निर्माणदेह तैयार होते है । अतएव, योगी जब प्रकृति की इन शक्तियो का रहस्य जान लेते है, तब वे अस्मिता नामक पदार्थ से जितनी इच्छा हो, उतने मन और शरीर निर्माण कर सकते हैं ।
तत्र ध्यानजमनाशयम् ॥६॥
सूत्रार्थ—उन विभिन्न चित्तो में से जो चित्त समाधि द्वारा उत्पन्न होता है, वह वासनाशून्य होता है ।
व्याख्या—विभिन्न व्यक्तियो मे हम जो विभिन्न प्रकार के मन देखते हैं, उनमे वही मन सबसे ऊँचा है, जिसे समाधि-अवस्था प्राप्त हुई है । जो व्यक्ति ओषधि, मन्त्र या तपस्या के बल से कुछ शक्तियाँ प्राप्त कर लेता है, उसकी तब भी वासनाएँ बनी ही रहती हैं, पर जो व्यक्ति योग के द्वारा समाधि प्राप्त कर लेता है, केवल वही समस्त वासनाओ से मुक्त होता है ।