राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
७० राजयोग
७० राजयोग
हुए स्नायु भी शान्त हो जायेंगे और तब जानोगे कि पहले तुमनों कभी यथार्थ विश्राम का सुख नही पाया ।
इस साधना का पहला फल यह देखोगे कि तुम्हारे मुख की कान्ति बदलती जा रही है । मुख की शुष्कता या कठोरता का भाव प्रदर्शित करनेवाली रेखाएँ दूर हो जायँगी । मन की शान्ति मुख से फूटकर बाहर निकलेगी । दूसरे, तुम्हारा स्वर बहुत मधुर हो जायगा । मैने ऐसा एक भी योगी नही देखा, जिनके गले का स्वर कर्कश हो । कुछ महिने के अभ्यास के बाद ही ये चिह्न प्रकट होने लगेगे । इस पहले प्राणायाम का कुछ दिन अभ्यास करने के बाद प्राणायाम की एक दूसरी ऊँची साधना ग्रहण करनी होगी । वह यह है—इडा अर्थात् वाई नासिका द्वारा फेफड़े को धीरे-धीरे वायु से पूरा करो । उसके साथ स्नायु-प्रवाह मे मन का सयम करो, सोचो कि तुम मानो स्नायु-प्रवाह को मेरुमज्जा के नीचे भेजकर कुण्डलिनी-शक्ति के आधारभूत, मूलाधारस्थित त्रिकोणाकृति पद्म पर बडे जोर से आघात कर रहे हो । इसके बाद इस स्नायु-प्रवाह को कुछ क्षण के लिए उसी जगह धारण किए रहो । तत्पश्चात् कल्पना करो कि उस स्नायिक प्रवाह को श्वास के साथ दूसरी ओर से अर्थात् पिंगला द्वारा ऊपर खीच रहे हो । फिर दाहिनी नासिका से वायु धीरे-धीरे बाहर फेको । इसका अभ्यास तुम्हारे लिए कुछ कठिन ज्ञात होगा । सहज उपाय है—अँगूठे से दाहिनी नाक बन्द करके बाईं नाक से धीरे-धीरे वायु भरो । फिर अँगूठे और तर्जनी से दोनो नथुने बन्द कर लो और सोचो, मानो तुम स्नायु-प्रवाह को नीचे भेज रहे हो और सुषुम्ना के मूल देश मे आघात कर रहे हो । इसके बाद अँगूठा हटाकर दाहिनी नाक द्वारा वायु बाहर निकालो । फिर
अध्यात्म प्राण का संयम ७१
बाई नासिका तर्जनी से बन्द करके दाहिनी नाक से धीरे-धीरे वायु-पूरण करो और फिर पहले की तरह दोनो नासिका-छिद्रो को बन्द कर लो। हिन्दुओं के समान प्राणायाम का अभ्यास करना इस देश (अमेरिका) के लिए कठिन होगा, क्योकि हिन्दू बाल्यकाल से ही इसका अभ्यास करते हैं, उनके फेफडे इसके अभ्यस्त हैं। यहाँ चार सेकन्ड से आरम्भ करके धीरे-धीरे बढाने पर अच्छा होगा। चार सेकन्ड तक वायु-पूरण करो, सोलह सेकन्ड बन्द करो और फिर आठ सेकन्ड में वायु का रेचन करो। इससे एक प्राणायाम होगा। पर उस समय मूलाधारस्थ त्रिकोणाकार पद्म पर मन स्थिर करना भूल न जाना। इस प्रकार की कल्पना से तुमको साधना मे बडी सहायता मिलेगी। एक तीसरे प्रकार का प्राणायाम यह है — धीरे-धीरे भीतर श्वास खींचो, फिर तनिक भी देर किए बिना धीरे-धीरे वायु रेचन करके बाहर ही श्वास कुछ देर के लिए रुद्ध कर रखो, संख्या पहले की प्राणायाम की तरह है। पूर्वोक्त प्राणायाम और इसमें भेद इतना ही है कि पहले के प्राणायाम में सांस भीतर रोकनी पडती है और यहाँ बाहर। यह प्राणायाम पहले से सीधा है। जिस प्राणायाम मे साँस भीतर रोकनी पड़ती है, उसका अधिक अभ्यास अच्छा नही। उसका सबेरे चार बार और शाम को चार बार अभ्यास करो। बाद में धीरे-धीरे समय और संख्या बढा सकते हो। तुम क्रमश देखोगे कि तुम बहुत सहज ही यह कर सक रहे हो और इससे तुम्हे बहुत आनन्द भी मिल रहा है। अतएव जब देखो कि तुम यह बहुत सहज ही कर सक रहे हो, तब बडी सावधानी और सतर्कता के साथ सख्या चार से छ बढा सकते हो। अनियमित रूप से साधना करने पर तुम्हारा अनिष्ट हो सकता है।