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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

> श्येनवत् सुखदुःखी त्यागवियोगाभ्याम् ॥५॥

परिशिष्ट २८५

वैराग्यादभ्यासाच्च ॥३६॥

अर्थ—वैराग्य और अभ्यास से भी (ध्यान सिद्ध होता है)।

तात्त्वाभ्यासान्नेति नेतीति त्यागाद्विवेकसिद्धिः ॥७४॥

अर्थ—प्रकृति के प्रत्येक तत्त्व को 'यह नहीं', 'यह नहीं', ऐसा कहकर त्याग सकने से विवेक सिद्ध होता है।

चतुर्थ अध्याय

आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ॥३॥

अर्थ—वेद मे एक से अधिक बार श्रवण का उपदेश है, अतएव पुनः-पुन श्रवण आवश्यक है।

श्येनवत् सुखदुःखी त्यागवियोगाभ्याम् ॥५॥

अर्थ—जैसे वाज पक्षी, मास छीन लिए जाने पर, दुःखी और स्वय इच्छापूर्वक उसको त्याग देने से सुखी होता है, (वैसे ही साधु पुरुष इच्छापूर्वक सबका त्याग करके सुखी होते हैं)।

अहिनिर्व्वयनीवत् ॥६॥

अर्थ—जैसे सर्प शरीरस्थ जीर्ण केचुली को हेय समझकर अनायास त्याग देता है।

असाधनानुचिन्तनं बन्धाय भरतवत् ॥८॥

अर्थ—जो विवेकज्ञान का साधन नही है, उसका चिन्तन न करे, क्योकि वह बन्धन का हेतु है; दृष्टान्त—राजा भरत।

बहुभिर्योगे विरोधो रागादिभिः कुमारीशंखवत् ॥९॥

अर्थ—बहुत से लोगो का सग, रागादि का कारण होने से, ध्यान में विघ्नस्वरूप है, दृष्टान्त—कुमारी के हाथ में शंख के कंगन।

२८६ राजयोग

द्वाभ्यामपि तथैव ॥१०॥

अर्थ—दो मनुष्यो के एक साथ रहने पर भी ऐसा ही है।

निराश सुखी पिंगलावत् ॥११॥

अर्थ—आशा को त्याग देनेवाला सुखी होता है; दृष्टान्त—पिंगला नाम की वेश्या।

बहुशास्त्रगुरूपासनेऽपि सारादानं षट्पदवत् ॥१३॥

अर्थ—जिस प्रकार मधुकर बहुत से फूलो से मधु सग्रह करता है, उसी प्रकार यद्यपि बहुत से शास्त्रो और गुरुओ की उपासना की जाती है, तो भी उनमें से केवल सार को लेना चाहिए।

इषुकारवन्नैकचित्तस्य समाधिहानिः ॥१४॥

अर्थ—बाण बनानेवाले के समान एकाग्रचित्त रहने पर समाधि भग नही होती।

कृतनियमलंघनादानर्थक्यं लोकवत् ॥१५॥

अर्थ—जैसे लौकिक विषय में कृतनियमो का उल्लंघन करने पर महा अनर्थ होता है, वैसे ही इसमे भी।

प्रणतितद्ब्रह्मचर्योपसर्पणानि कृत्वा सिद्धिर्बहुकालात्तद्वत् ॥१९॥

अर्थ—प्रणति, ब्रह्मचर्य और गुरुसेवा के द्वारा, इन्द्र के समान, बहुत समय के बाद सिद्धि प्राप्त होती है।

न कालनियमो वामदेववत् ॥२०॥

अर्थ—ज्ञानोत्पत्ति का कोई कालनियम नही है। जैसे, वामदेव मुनि को (गर्भावस्था मे ज्ञान का उदय) हुआ था।

लब्धातिशययोगाद्वा तद्वत् ॥२४॥

अर्थ—जिस मनुष्य ने अतिशय यानी ज्ञान की पराकाष्ठा