प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
About this granth
Prem Darshan (प्रेम-दर्शन) is Hanuman Prasad Poddar's detailed Hindi commentary on the Narada Bhakti Sutra. The sutra, a short text of eighty-four aphorisms attributed to the sage Narada, defines bhakti as supreme love for God ("sa tvasmin paramapremarupa"). Poddar (1892–1971), known as Bhaiji, was the founding editor of the magazine Kalyan and a central figure of the Gita Press.
The commentary groups the sutras into four sections: the nature and marks of supreme devotion; the means to devotion, giving up ego and the value of holy company; the indescribable nature of loving devotion and the difference between secondary and primary bhakti; and the eleven forms of attachment to God and the pre-eminence of bhakti. Opening essays introduce Narada, the nature of devotion as love, and single-minded love, and Poddar draws often on the gopis and the saints to illustrate the sutras.
This is the Gita Press, Gorakhpur edition; the copy records its fortieth reprint in Samvat 2077. At about 178 pages, it is an accessible guide for readers on the path of devotion.
प्रेमरूपा भक्तिके लक्षण और उदाहरण ४१
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥
(६।४६-४७)
'तपस्वियोंसे, शास्त्र-ज्ञानियोंसे और सकाम कर्मियोंसे भी योगी
श्रेष्ठ है; अतएव हे अर्जुन ! तू योगी बन। परन्तु सम्पूर्ण योगियोंमें भी
वह भक्ति-योगी मेरे मतमें परम श्रेष्ठ है जो मुझमें श्रद्धावान् है और
अन्तरात्माको मुझमें लगाकर निरन्तर मुझे भजता है।'
भगवान्ने फिर आज्ञा की है—
तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥
(गीता ८।७)
'इसलिये हे अर्जुन ! तू सब समय (बिना विराम) मेरा स्मरण
कर और (स्मरण करता हुआ ही मेरे लिये ही) युद्ध कर। इस प्रकार
मुझमें ही मन-बुद्धि अर्पण करके तू निस्सन्देह मुझको ही प्राप्त
होगा।'
मानापमान, लाभ-हानि, जय-पराजय, सुख-दुःख आदिकी परवा
न करके, आसक्ति और फलकी इच्छा छोड़कर, शरीर और संसारमें
अपने लिये अहंता-ममतासे रहित होकर, एकमात्र परम प्रियतम
श्रीभगवान्को ही परम आश्रय, परम गति, परम सुहृद् समझकर,
अनन्यभावसे, अत्यन्त श्रद्धाके साथ, प्रेमपूर्वक निरन्तर तैलधारावत्
उनके नाम, गुण, प्रभाव और स्वरूपका चिन्तन करते हुए परमानन्दमें
मग्न रहना और इस प्रकार चिन्तनपरायण रहते हुए ही केवल उन
परम प्रियतम भगवान्के लिये, उनकी रुचि तथा इच्छाके अनुसार,
उन्हींके प्रीत्यर्थ, उन्हींको सुख पहुँचानेके दृढ़ और परम स्वार्थसे
४२ प्रेम-दर्शन
प्रेरित होकर, सर्वथा निःस्वार्थभावसे समस्त दैहिक, वाचिक और
मानसिक कर्मोंका आचरण करना। यदि किसी कारणवश क्षणभरके
लिये भी उनका चिन्तन-स्मरण छूट जाय तो जलसे निकाली हुई
मछलीसे भी अनन्तगुणा अधिक व्याकुलताका अनुभव करना, यही
सर्वोच्च भक्ति है।
ऐसा पूर्ण समर्पणकारी प्रेमी भक्त त्रैलोक्यके राज्यसुखकी
तो बात ही क्या है, अपुनरावर्त्ती मोक्षके लिये भी, किसी भी
हालतमें अपने प्रियतम भगवान्का स्मरण छोड़ना नहीं चाहता।
भगवान् ऐसे भक्तकी प्रशंसा करते हुए भक्त उद्धवसे कहते हैं—
न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शंकरः।
न च संकर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान्॥
निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम्।
अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यङ्घ्रिरेणुभिः॥
निष्किंचना मय्यनुरक्तचेतसः
शान्ता महान्तोऽखिलजीववत्सलाः।
कामैरनालब्धधियो जुषन्ति यत्
तन्निरपेक्ष्यं न विदुः सुखं मम॥
(श्रीमद्भा० ११।१४।१५–१७)
'हे उद्धव ! इस प्रकारके तुम भक्त मुझको जैसे प्रिय हो, वैसे प्रिय
ब्रह्मा, शंकर, बलराम, लक्ष्मी और अपनी आत्मा भी नहीं है। ऐसे
किसी वस्तुकी इच्छा न रखनेवाले, शान्तचित्त, निर्वैर, सर्वत्र समभावसे
मुझको देखनेवाले और निरन्तर मेरा मनन करनेवाले प्रेमी भक्तोंकी
चरणरजसे अपनेको पवित्र करनेके लिये मैं सदा-सर्वदा उनके
पीछे-पीछे घूमा करता हूँ। मुझमें चित्तको अनुरक्त कर रखनेवाले,
सर्वस्व मुझको अर्पण करके अकिंचन बने हुए ऐसे शान्त और मेरे
नाते सब जीवोंके प्रति स्नेह करनेवाले तथा सब प्रकारकी कामनाओंसे
प्रेमरूपा भक्तिके लक्षण और उदाहरण ४३
शून्य हृदयवाले महात्मा जिस परमसुखका अनुभव करते हैं, उस
निरपेक्ष परमानन्दको दूसरे लोग नहीं जानते।' बस, श्रीनारदजीके
मतसे यही भक्ति है। ऐसा भक्त समस्त आचरण श्रीभगवान्के अर्पण
करके अनवच्छिन्नरूपसे भगवत्स्मरण करता रहता है और कहीं
तनिक भी भूल जानेपर परम व्याकुल हो जाता है।
अस्त्येवमेवम् ॥ २० ॥
२०-ठीक ऐसा ही है।
देवर्षि नारद पिछले सूत्रमें बतलाये हुए सिद्धान्तकी दृढ़ताके
लिये कहते हैं कि वस्तुतः भक्तिका यही स्वरूप है।
यथा व्रजगोपिकानाम् ॥ २१ ॥
२१-जैसे व्रजगोपियोंकी ( भक्ति ) ।
भक्तिका लक्षण बतलाकर अब देवर्षि उदाहरणमें प्रेमिका-
शिरोमणि प्रातःस्मरणीया श्रीगोपिकाओंका नाम लेते हैं। वस्तुतः
गोपियोंकी ऐसी ही महिमा है। जगत्में ऐसा कौन है जो गोपियोंके
प्रेमके तत्त्वका बखान कर सके? उनका तन, मन, धन, लोक,
परलोक सब श्रीकृष्णके अर्पित था। वे दिन-रात श्रीकृष्णका ही
चिन्तन करतीं, गद्गद वाणीसे निरन्तर श्रीकृष्णका ही गुणगान करतीं
और सर्वत्र सर्वदा श्रीकृष्णको ही देखा करती थीं। स्वयं भगवान्
श्रीकृष्णने उनसे कहा है—
न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां
स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः।
या माभजन् दुर्जरगेहशृङ्खलाः
संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना॥
( श्रीमद्भा० १०।३२।२२)
'हे गोपिकाओ! तुमने मेरे लिये गृहस्थकी कठिन बेड़ियोंको
तोड़कर मेरा भजन किया है। तुम्हारा यह कार्य सर्वथा निर्दोष है। मैं
४४ प्रेम-दर्शन
देवताओंकी आयुपर्यन्त भी तुम्हारे इस उपकारका बदला नहीं चुका
सकता। तुम अपनी उदारतासे ही मुझे ऋणमुक्त करना।'
उद्धवको सँदेसा देकर भेजते समय भगवान् श्रीकृष्णने प्रेमाश्रु
बहाते हुए गद्गद वाणीसे कहा था—
ता मन्मनस्का मत्प्राणा मदर्थे त्यक्तदैहिकाः।
मामेव दयितं प्रेष्ठमात्मानं मनसा गताः।
ये त्यक्तलोकधर्माश्च मदर्थे तान् बिभर्म्यहम्॥
मयि ताः प्रेयसां प्रेष्ठे दूरस्थे गोकुलस्त्रियः।
स्मरन्त्योऽङ्ग विमुह्यन्ति विरहौत्कण्ठ्यविह्वलाः॥
धारयन्त्यतिकृच्छ्रेण प्रायः प्राणान् कथञ्चन।
प्रत्यागमनसन्देशैर्बल्लव्यो मे मदात्मिकाः॥
(श्रीमद्भा० १०।४६।४—६)
'हे उद्धव! गोपियोंने अपना मन मुझको समर्पण कर दिया है, मैं
ही उनके प्राण हूँ, मेरे लिये उन्होंने अपने देहके सारे व्यवहार छोड़ दिये
हैं। जो लोग मेरे लिये समस्त लौकिक धर्मोंको छोड़ देते हैं, उनको
मैं सुख पहुँचाता हूँ। वे गोपियाँ मुझको प्रियसे भी अति प्रिय समझती
हैं, मेरे दूर रहनेपर मुझे स्मरण करके वे दारुण विरहवेदनासे व्याकुल
होकर अपने देहकी सुधि भूल जाती हैं। मेरे बिना वे बड़ी ही कठिनतासे
किसी प्रकार प्राण धारण कर रही हैं, मेरे पुनः ब्रज जानेके सन्देशके
आधारपर ही वे जी रही हैं। मैं उन गोपियोंकी आत्मा हूँ और वे मेरी हैं।'
उद्धवने ब्रजमें आकर जब प्रेममयी गोपियोंकी दशा देखी, उन्हें
सब ओर, बाहर-भीतर श्रीकृष्णके दर्शन करते पाया और जब उनके
मुखसे सुना—
[१]
नाहिन रह्यो हियमहँ ठौर।
नंदनंदन अछत कैसे आनिये उर और॥
चलत चितवत दिवस जागत, सुपन सोवत रात।
हृदयते वह स्याम मूरति छिन न इत उत जात॥
कहत कथा अनेक ऊधौ! लोक-लाज दिखात।
कहा करौं तन प्रेमपूरन, घट न सिंधु समात॥
स्याम गात सरोज आनन, ललित गति मृदु हास।
'सूर' ऐसे रूप कारन मरत लोचन प्यास॥
[२]
ऊधौ! जोग जोग हम नाहीं।
अबला ग्यान सार कहा जानें, कैसे ध्यान धराहीं॥
ते ये मूँदन नैन कहत हौ, हरि मूरति जिन माहीं।
ऐसी कथा कपटकी मधुकर हमते सुनी न जाहीं॥
स्त्रवन चीर अरु जटा बँधावहु, ये दुख कौन समाहीं।
चंदन तजि अँग भसम बतावत, बिरह अनल अति दाहीं॥
जोगी भरमत जेहि लगि भूले, सो तो है हम पाहीं।
'सूरदास' सो न्यारो न पल छिन, ज्यों घटते परिछाहीं॥
गोपियोंने कहा—'उद्धवजी! योग उन्हें जाकर सिखाओ, जहाँ
श्यामसुन्दरका वियोग हो। यहाँ तो देखो, सदा ही संयोग है;
हमारा प्यारा श्याम सदा-सर्वदा हमारे साथ ही रहता है।'
तब उद्धवकी आँखें खुलीं, वे गोपियोंके शुद्ध प्रेमके प्रबल
प्रवाहमें बह गये—
सुनि गोपीके बैन, नेम ऊधौके भूले।
गावत गुन गोपाल फिरत कुंजनमें फूले॥
खिन गोपिनके पग परै, धन्य सोइ है नेम।
धाइ धाइ द्रुम भेंटही, ऊधौ छाके प्रेम॥
उन्होंने भक्तिप्रणत चित्तसे कहा—
४६ प्रेम-दर्शन
एताः परं तनुभृतो भुवि गोपवध्वो
गोविन्द एव निखिलात्मनि रूढभावाः।
वाञ्छन्ति यद् भवभियो मुनयो वयं च
किं ब्रह्मजन्मभिरनन्तकथारसस्य॥
नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः
स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः।
रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ-
लब्धाशिषां य उदगाद् व्रजवल्लवीनाम्॥
आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां
वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।
या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा
भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥
(श्रीमद्भा० १०।४७।५८, ६०-६१)
'जगत्में इन गोपललनाओंका ही देह धारण करना सफल है,
क्योंकि इनका चित्त विश्वात्मा भगवान् श्रीगोविन्दमें लगा हुआ
है, जिनकी भवभयसे भीत हुए मुनिगण तथा हमलोग सभी इच्छा
करते हैं। सत्य है, जो श्रीअनन्तकी लीला-कथाओंके रसिक हैं,
उन्हें ब्राह्मणोंके तीनों जन्मों (जन्म, यज्ञोपवीत और यज्ञदीक्षा)-
की क्या आवश्यकता है? रासलीलाके समय भगवान् श्रीहरिके
भुजदण्डको कण्ठहार बनाकर पूर्णकाम हुई इन व्रजबालाओंको
श्रीहरिका जो प्रसाद प्राप्त हुआ है, वैसा निरन्तर हृदयमें
रहनेवाली श्रीलक्ष्मीजी और कमलकी-सी कान्ति और सुगन्धिसे
युक्त सुरसुन्दरियोंको भी नहीं मिला; फिर औरोंकी तो बात ही
क्या है? इन महाभागा गोपियोंने कठिनतासे छोड़े जा सकनेवाले
बन्धुओंको और आर्यधर्मको त्यागकर श्रुति जिसकी खोज करती
है, उस मुकुन्दपदवीका अनुसरण किया है। अहो! क्या ही उत्तम
हो, यदि मैं आगामी जन्ममें इस वृन्दावनकी लता, ओषधि या
झाड़ियोंमेंसे कोई होऊँ, जिनपर इन गोपियोंकी चरणधूलि पड़ती
है।' मथुराकी कुलांगनाओंने गोपियोंकी दशाका वर्णन करके
उनके जीवनको धन्य बताते हुए कहा है—
या दोहनेऽवहने मथनोपलेप-
प्रेङ्खेङ्खनार्भयरुदितोक्षणमार्जनादौ ।
गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठ्यो
धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयानाः ॥
(श्रीमद्भा० १०।४४।१५)
'जो गोपियाँ गायोंका दूध दुहते समय, धान आदि कूटते समय,
दही बिलोते समय, आँगन लीपते समय, बालकोंको झुलाते समय,
रोते हुए बच्चोंको लोरी देते समय, घरोंमें छिड़काव करते तथा
झाडू देते समय प्रेमपूर्ण चित्तसे, आँखोंमें आँसू भरे, गद्गद वाणीसे
श्रीकृष्णके गुणगान किया करती हैं, उन श्रीकृष्णमें चित्त निवेशित
करनेवाली गोपरमणियोंको धन्य है!'
इन गोपियोंकी जितनी महिमा गायी जाय, उतनी ही थोड़ी है।
सर्वत्यागी व्रजवासी भक्तोंने तो गोपीपद-पंकजपराग ही बनना चाहा
है। सत्य ही कहा है—
गोपी प्रेमकी धुजा।
जिन घनस्याम किये बस अपने उर धरि स्यामभुजा॥
महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव-सदृश महान् त्यागी महापुरुषोंने तो गोपियोंको
प्रेममार्गका गुरु माना है। महान् भक्त श्रीनागरीदासजी कहते हैं—
जयति ललितादि देवीय व्रज श्रुतिरिचा,
कृष्ण प्रिय केलि आधीर अंगी।
जुगल-रस-मत्त आनंदमय रूपनिधि,
सकल सुख समयकी छाँह संगी॥
४८ प्रेम-दर्शन
गौरमुख हिमकरनकी जु किरनावली,
स्रवत मधु गान हिय पिय तरंगी।
'नागरी' सकल संकेत आकारिनी,
गनत गुनगननि मति होति पंगी॥
एक व्रजभक्तने कहा है—
ये हरिरस ओपी गोपी सब तियतें न्यारी।
कमलनयन गोविंदचंदकी प्रानपियारी॥
निरमत्सर जे संत तिनहिं चूड़ामनि गोपी।
निरमल प्रेम प्रबाह सकल मरजादा लोपी॥
जे ऐसे मरजाद मेटि मोहन गुन गावैं।
क्यों नहिं परमानंद प्रेमभगती सुख पावैं॥
गोपियोंकी महिमा तभी कुछ समझमें आ सकती है, जब साधक
विषयोंसे परम वैराग्य धारणकर प्रेमपथपर कुछ अग्रसर होता है।
तत्रापि न माहात्म्यज्ञानविस्मृत्यपवादः ॥ २२॥
२२-इस अवस्थामें भी (गोपियोंमें) माहात्म्यज्ञानकी
विस्मृतिका अपवाद नहीं।
अर्थात् गोपियाँ भगवान् श्रीकृष्णके प्रभाव, रहस्य और गुणोंको
जानती थीं। कुछ लोगोंका कहना है कि प्रेममें माहात्म्यज्ञान नहीं
रहता। माहात्म्यज्ञान होगा तो प्रेम नहीं रहेगा, परन्तु गोपियोंमें ऐसी
बात नहीं थी। गोपियाँ श्रीकृष्णको साक्षात् पुरुषोत्तमभगवान् जानती
हुई ही अपना प्रियतम समझती थीं। लौकिक प्रेम और भगवत्प्रेममें
यही खास भेद है। भगवत्प्रेममें वस्तुतः ऐसा ही होता है। जो लोग
कहते हैं कि गोपियाँ श्रीकृष्णको भगवान् नहीं जानती थीं, वे
श्रीमद्भागवतके नीचे लिखे श्लोकोंका मनन करें—
मैवं विभोऽर्हति भवान् गदितुं नृशंसं
संत्यज्य सर्वविषयांस्तव पादमूलम्।
प्रेमरूपा भक्तिके लक्षण और उदाहरण ४९
भक्ता भजस्व दुरवग्रह मा त्यजास्मान्
देवो यथाऽऽदिपुरुषो भजते मुमुक्षून्॥
यत्पत्यपत्यसुहृदामनुवृत्तिरंग
स्त्रीणां स्वधर्म इति धर्मविदा त्वयोक्तम्।
अस्त्वेवमेतदुपदेशपदे त्वयीशे
प्रेष्ठो भवांस्तनुभृतां किल बन्धुरात्मा॥
यर्ह्यम्बुजाक्ष तव पादतलं रमाया
दत्तक्षणं क्वचिदरण्यजनप्रियस्य।
अस्प्राक्ष्म तत्प्रभृति नान्यसमक्षमंग
स्थातुं त्वयाभिरमिता बत पारयामः॥
श्रीर्यत्पदाम्बुजरजश्चकमे तुलस्या
लब्ध्वापि वक्षसि पदं किल भृत्यजुष्टम्।
यस्याः स्ववीक्षणकृतेऽन्यसुरप्रयास-
स्तद्वद् वयं च तव पादरजः प्रपन्नाः॥
(१०।२९।३१-३२, ३६-३७)
व्यक्तं भवान् व्रजभयार्तिहरोऽभिजातो
देवो यथाऽऽदिपुरुषः सुरलोकगोप्ता।
(१०।२९।४१)
न खलु गोपिकानन्दनो भवा-
नखिलदेहिनामन्तरात्मदृक् ।
विखनसार्थितो विश्वगुप्तये
सख उदेयिवान् सात्वतां कुले॥
(१०।३१।४)
'हे विभो! आप ऐसे कठोर शब्द (वापस जानेकी बात) न
कहिये। हमने अन्य सम्पूर्ण विषयोंको छोड़कर एकमात्र आपके
ही चरणकमलोंका आश्रय लिया है। हे स्वच्छन्द! जिस प्रकार
५० प्रेम-दर्शन
आदिपुरुष श्रीनारायण मुमुक्षुओंको भजते हैं, (उनके इच्छानुसार
उन्हें स्वीकार करते हैं) उसी प्रकार आप हमें अंगीकार कीजिये,
त्यागिये नहीं। हे हरि! आप धर्मको जाननेवाले हैं (फिर आप
कैसे कहते हैं कि तुमलोग लौट जाओ, आपकी शरण आनेपर
भी क्या कोई कभी वापस लौटता है)। आपने जो कहा कि
पति, पुत्र और बन्धु-बान्धवोंकी सेवा करना ही स्त्रियोंका परम
धर्म है, सो यह उपदेश उपदेशके स्थान आप ईश्वरके विषयमें
ही रहे; क्योंकि समस्त देहधारियोंके प्रियतम बन्धु और आत्मा
तो आप ही हैं। हे कमललोचन! जिस समय श्रीलक्ष्मीजीको
(श्रीविष्णुरूपमें) कभी-कभी आनन्दित करनेवाले आपके चरण-
कमलोंको हमने स्पर्श किया था और वनवासी तपस्वियोंके प्रिय
आपने हमें आनन्दित किया था, तभीसे हमारे लिये अन्यत्र कहीं
ठहरना असम्भव हो गया है। जिनकी कृपादृष्टि पानेके लिये
देवगण अत्यन्त प्रयास करते हैं, वे लक्ष्मीजी बिना किसी
प्रतिद्वन्द्वीके आपके वक्षःस्थलमें स्थान पाकर भी तुलसीजीके
सहित अन्य भक्तोंसे सेवित आपकी चरणरजकी इच्छा करती हैं,
हम भी निस्सन्देह आपकी उसी चरणरजकी ही शरणमें आयी हैं।
क्योंकि देवताओंकी रक्षा करनेवाले आप आदिपुरुष परमात्मा ही
व्रजमण्डलका भय और दुःख दूर करनेके लिये प्रकट होकर
अवतीर्ण हुए हैं। यह निश्चय है कि आप केवल यशोदाके ही
पुत्र नहीं हैं, वरं समस्त देहधारियोंके अन्तरात्माके साक्षी हैं। हे
सखे! ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे ही आपने सम्पूर्ण जगत्की रक्षा
करनेके लिये यदुकुलमें अवतार लिया है।'
ऐसे अनेकों प्रमाणोंसे तथा युक्तियोंसे यह सर्वथा सिद्ध है कि
गोपियोंने श्रीकृष्णको साक्षात् सच्चिदानन्दघन भगवान् समझकर
ही उन्हें आत्मसमर्पण किया था।
प्रेमरूपा भक्तिके लक्षण और उदाहरण ५१
तद्विहीनं जाराणामिव ॥ २३ ॥
२३-उसके बिना ( भगवान्को भगवान् जाने बिना किया
जानेवाला ऐसा प्रेम ) जारोंके ( प्रेमके ) समान है।
माहात्म्यज्ञान बिना स्त्रियोंके द्वारा किसी पुरुषके प्रति किया
जानेवाला ऐसा प्रेम जारोंका-सा प्रेम होता है। जिस प्रेममें सर्वार्पण
है, जिसमें लौकिक स्वार्थकी तनिक-सी गन्ध भी नहीं है, ऐसा प्रेम
केवल भगवान्के प्रति ही हो सकता है। यद्यपि जाने-अनजाने किसी
प्रकार भी भगवान्के प्रति किया हुआ प्रेम निष्फल नहीं होता, परन्तु
जानकर होनेवाले प्रेममें विशेषता होती है। भगवान् हमारे प्रियतम हैं,
इस कल्पनामें ही कितना अपार आनन्द है। फिर जिनको वे भगवान्
परम प्रियतमरूपमें प्राप्त हो जायँ, उनके सुखका तो कहना ही क्या
है ? गोपियाँ इसी परम पवित्र दिव्य सुखकी भागिनी थीं। इसीसे
जीवन्मुक्त महात्मा शुकदेव मुनिने मृत्युके लिये तैयार हुए राजा
परीक्षित्को यह पवित्र प्रेमलीला सुनायी थी। अतएव यह प्रेम
भगवत्-माहात्म्यके ज्ञानसे युक्त परम पवित्र था।
नास्त्येव तस्मिंस्तत्सुखसुखित्वम् ॥ २४ ॥
२४-उसमें ( जारके प्रेममें ) प्रियतमके सुखसे सुखी होना नहीं है।
व्यभिचारी मनुष्य कामवश होकर केवल अपने सुखके लिये,
अपनी इन्द्रियोंकी तृप्तिके लिये प्रीति किया करते हैं; वे अपने
प्रेमास्पदके सुखसे सुखी नहीं होते। गोपियोंके प्रेममें यह भाव नहीं
था। लौकिक कामजनित प्रीतिमें प्रेमास्पद पुरुष जार होता है और
उसके अंग-संगकी इच्छा होती है। यहाँ प्रेमास्पद साक्षात् विश्वात्मा
भगवान् थे और गोपियोंके मनोंमें अंग-संगकी कामना नहीं थी।
गोपियाँ केवल श्रीकृष्ण-सुखकी अभिलाषिणी थीं। उन्होंने अपना
तन, मन, बुद्धि, रूप, यौवन, धन, प्राण आदि सम्पूर्ण वस्तुओंको
प्रियतम श्रीकृष्णकी पूजन-सामग्री बना दिया था। अपना सर्वस्व
५२ प्रेम-दर्शन
देकर वे श्रीकृष्णको सुख पहुँचाना चाहती थीं। जिस बातमें श्रीकृष्णकी
प्रसन्नता होती, वही करना उनका धर्म था। उसीमें उन्हें परम सुखकी
अनुभूति होती थी। इसके अतिरिक्त उनके मनमें अन्य प्रकारसे
होनेवाले सुखकी कामना तो दूर रही, कल्पना भी नहीं थी। यही तो
काम और प्रेमका अन्तर है। काम चाहता है दूसरेके द्वारा अपने सुखी
होना, और प्रेम चाहता है अपने द्वारा प्रियतमको सुखी करना और
उसे सुखी देखकर ही सुखी होना। श्रीचैतन्यचरितामृतमें गोपियोंके
प्रेमका वर्णन करते हुए बहुत ही ठीक कहा गया है—
आत्मेन्द्रिय प्रीति-इच्छा, तार नाम काम। कृष्णेन्द्रिय प्रीति-इच्छा धरे प्रेम नाम॥
कामेर तात्पर्य निज संभोग केवल। कृष्ण-सुख तात्पर्य प्रेम तो प्रबल॥
आत्म-सुख-दुःख गोपी ना करे विचार। कृष्ण-सुख-हेतु करे सब व्यवहार॥
लोकधर्म, वेदधर्म, देहधर्म कर्म। लज्जा, धैर्य, देहसुख, आत्मसुख मर्म॥
सर्व त्याग करये करे कृष्णेर भजन। कृष्णसुख हेतु करे प्रेमेर सेवन॥
इहाके कहिये कृष्णे दृढ़ अनुराग। स्वच्छ धौत वस्त्र जैसे नाहिं कोन दाग॥
अतएव काम प्रेमे बहुत अंतर। काम अंधतम प्रेम निर्मल भास्कर॥
अतएव गोपीगणे नाहि कामगंध। कृष्णसुख हेतु मात्र कृष्णेर संबंध॥
भगवान् श्रीकृष्णको सर्वस्व अर्पण, पलभरके लिये भूल
जानेमें परम व्याकुलता, श्रीकृष्णके प्रभाव और माहात्म्यका
सम्यक् ज्ञान और श्रीकृष्णके सुखमें ही सुखी होना, यही चार
बातें गोपी-प्रेममें मुख्य हैं।
यह गोपी-प्रेम परम पवित्र और अलौकिक है। इसमें जो पाप
या व्यभिचार देखते हैं, उनपर श्रीकृष्ण दया करें।
☐ ☐
प्रेमरूपा भक्ति फलरूपा है
सा तु कर्मज्ञानयोगेभ्योऽप्यधिकतरा ॥ २५ ॥
२५-वह (प्रेमरूपा भक्ति) तो कर्म, ज्ञान और योगसे भी
श्रेष्ठतर है।
कर्म, ज्ञान और योग तीनों ही भगवत्प्राप्तिके साधन हैं, परन्तु
भक्ति इन तीनोंमें सबसे श्रेष्ठ है। उनमें वर्ण, आश्रम, अधिकार
आदिका विचार है; साथ ही गिरनेका भय भी है, परन्तु सच्ची
भक्तिमें भगवान्की पूरी सहायता रहनेके कारण कोई भी भय नहीं
है तथा इसमें स्त्री, पुरुष, ब्राह्मण, शूद्र आदि सभीका अधिकार
है। गोसाईं तुलसीदासजी महाराज कहते हैं—
जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं॥
ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी॥
सुनु खगेस हरि भगति बिहाई। जे सुख चाहहिं आन उपाई॥
ते सठ महासिंधु बिनु तरनी। पैरि पार चाहहिं जड़ करनी॥
उमा जोग जप दान तप नाना मख ब्रत नेम।
राम कृपा नहिं करहिं तसि जसि निष्केवल प्रेम॥
पन्नगारि सुनु प्रेम सम भजन न दूसर आन।
यह बिचारि मुनि पुनि पुनि करत राम गुन गान॥
स्वयं श्रीभगवान् कहते हैं—
न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता॥
भक्त्याहमेकया ग्राह्यः श्रद्धयात्मा प्रियः सताम्।
भक्तिः पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात्॥
(श्रीमद्भा० ११।१४।२०-२१)
'जिस प्रकार मेरी दृढ़भक्ति मुझे वश करती है, उस प्रकार
५४ प्रेम-दर्शन
मुझको योग, ज्ञान, धर्म, स्वाध्याय, तप और त्याग वशमें नहीं
कर सकते। सन्तोंका प्रिय आत्मारूप मैं केवल श्रद्धायुक्त भक्तिके
द्वारा वशमें हो सकता हूँ, मेरी भक्ति चाण्डाल आदिको भी
पवित्रहृदय बनानेमें समर्थ है।'
इसी प्रकार श्रीभगवान्ने गीतामें भी कहा है—
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप॥
(११।५३-५४)
'हे अर्जुन! जैसा तुमने मुझको देखा है, ऐसा वेद, तप, दान,
यज्ञ आदिसे मैं नहीं देखनेमें आता। हे परंतप अर्जुन! अनन्यभक्तिके
द्वारा ही इस प्रकार मेरा देखा जाना, मुझे तत्त्वसे जानना और
मुझमें प्रवेश पाना सम्भव है।'
फलरूपत्वात् ॥ २६ ॥
२६-क्योंकि (वह भक्ति) फलरूपा है।
वस्तुतः यह भक्ति फलरूपा है, साधन नहीं है। जो
भक्ति ज्ञानका साधन मानी जाती है, वह गौणी भक्ति
साधारण उपासना है, प्रेमरूपा भक्ति नहीं है। प्रेमरूपा भक्ति तो
समस्त साधनोंका फल है।
तीर्थाटन साधन समुदाई जोग बिराग ग्यान निपुनाई॥
नाना कर्म धर्म ब्रत दाना संजम दम जप तप मख नाना॥
भूत दया द्विज गुर सेवकाई बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई॥
जहाँ लगि साधन बेद बखानी। सब कर फल हरि भगति भवानी॥
ईश्वरस्याप्यभिमानद्वेषित्वाद् दैन्यप्रियत्वाच्च ॥ २७ ॥
२७-ईश्वरको भी अभिमानसे द्वेषभाव है और दैन्यसे प्रियभाव है।
प्रेमरूपा भक्ति फलरूपा है ५५
कर्म, ज्ञान और योगके साधकोंको अपने बलका और
साधनका अभिमान हो सकता है। भगवान्का तो नाम ही दर्पहारी
है। यद्यपि वस्तुतः भगवान्का न किसीमें द्वेष है, न राग है। उनके
लिये सभी समान हैं। वे सभीका उद्धार करते हैं। हाँ, उद्धारके
साधन भिन्न-भिन्न हैं। अभिमानीका उद्धार उसे दण्ड देकर करते
हैं और दीन सेवकका उसे प्रेमसे गले लगाकर। इसीसे भगवान्के
क्रोधको भी वरके तुल्य बतलाया गया है। अभिमानीके प्रति
भगवान् द्वेषीकी-सी लीला करते हैं और दीनके साथ प्रेमीकी-
सी। इसीसे दीनबन्धु, अशरण-शरण और ‘कंगालके धन’ आदि
उनके नाम हैं। यथार्थमें तो अभिमानीके प्रति भी उनके हृदयमें
प्रेम ही होता है, इसीलिये तो वे उसका अभिमान नष्ट करते हैं।
सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ॥
संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना॥
ताते करहिं कृपानिधि दूरी। सेवक पर ममता अति भूरी॥
इतना होनेपर भी दण्डमें द्वेष दीखता ही है, परन्तु दीन
अमानी गरीबको तो आप हृदयसे लगा लेते हैं। उसका छोटे-
से-छोटा काम करनेमें भी नहीं सकुचाते। भक्तजन तो स्वाभाविक
ही अपनेको किंकर समझते हैं, वे कहते हैं—
सर्वसाधनहीनस्य पराधीनस्य सर्वथा।
पापपीनस्य दीनस्य कृष्ण एव गतिर्मम॥
‘हे प्रभो! मुझ समस्त साधनोंसे हीन, मायाके सर्वथा पराधीन
हुए, पापोंसे लदे हुए दीनकी तो केवल तुम ही गति हो।’
जाउँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे।
काको नाम पतितपावन जग, केहि अति दीन पियारे॥
यह दीनता उस अभावकी स्थितिका नाम नहीं है, जिसमें मनुष्य
धन, मान, वैभव आदिके अभावसे ग्रस्त होकर उनकी प्राप्तिके
५६ प्रेम-दर्शन
लिये व्याकुल रहा करता है। यह दीनता तो उस निरभिमानता और
अहंकारशून्यताका नाम है, जो बड़े-से-बड़े वैभवशाली सम्राट्को
भी भगवत्कृपासे प्राप्त हो सकती है। इस दीनताका अर्थ है अभिमान
और कर्तृत्व-अहंकारका नाश हो जाना। यह समझना कि मैं और
मेरा कुछ भी नहीं है, जो कुछ है सो सब भगवान् है और सब
भगवान्का है, सब कुछ उन्हींकी शक्ति और प्रेरणासे होता है, करने-
करानेवाले वे ही हैं।
परन्तु भगवान्की प्यारी यह सच्ची दीनता सहज ही नहीं प्राप्त
होती। अभिमानका सारा भूत उतरे बिना दीनता नहीं आती। वर्ण,
जाति, धन, मान, विद्या, साधन, स्वास्थ्य आदिका अभिमान और
कर्तापनका अहंकार मनुष्यमें ऐसी दीनता उत्पन्न नहीं होने देता;
ऊपरसे मनुष्य दम्भपूर्वक दीन बनता है, भगवान्के सामने अपनेको
दीन कहता है, रोनेका स्वाँग भरता है; परन्तु उसकी दीनताकी
परीक्षा तो तभी होती है, जब बड़े-से-बड़े सांसारिक पदार्थों और
साधनोंकी प्राप्तिमें भी स्वाभाविक दीनता ज्यों-की-त्यों बनी रहे।
जो सब लोगोंके सामने अपनेसे हीन स्थितिके दूसरे मनुष्योंद्वारा दीन
और पापी कहा जाना केवल सह ही नहीं लेता, वरं उसे सत्य
समझकर प्रसन्न होता है और प्रभु-प्राप्तिके लिये सदैव जिसका
चित्त खिन्न रहा करता है, ऐसे ही खिन्न-दीन भगवान्को प्यारे होते
हैं। सच्ची भक्तिमें अपने पुरुषार्थ या साधनका अभिमान आ ही नहीं
सकता, इसीलिये भक्ति श्रेष्ठ है।
तस्या ज्ञानमेव साधनमित्येके ॥ २८ ॥
२८-उसका (भक्तिका) साधन ज्ञान ही है, किन्हीं
(आचार्यों)-का यह मत है।
यद्यपि भक्तिमें इस ज्ञानकी तो परम आवश्यकता है कि मैं
जिसकी भक्ति करता हूँ वे ही सबके स्वामी, सबके आधार,
प्रेमरूपा भक्ति फलरूपा है ५७
सबके महेश्वर, जगत्के उत्पन्न, पालन और संहार करनेवाले,
मायाके पति, अज, अविनाशी, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वात्मा,
निर्गुण, निर्विकार, निराकार, सगुण, साकार भगवान् हैं, उनसे
श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं। क्योंकि इतना ज्ञान भी यदि न होगा
तो श्रद्धा नहीं होगी; श्रद्धा बिना प्रीति नहीं होगी और प्रीति बिना
भक्ति दृढ़ नहीं होगी।
जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती॥
प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई॥
परन्तु इसमें अद्वैतज्ञानके साधनकी आवश्यकता नहीं होती।
केवल श्रद्धा और भावसे ही परमात्माकी भक्ति प्राप्त हो जाती
है। गृध्रराज, गजेन्द्र, ध्रुव, शबरी आदिने केवल भगवान्की ऐसी
ही भक्तिसे भगवान्को प्राप्त किया था।
अन्योन्याश्रयत्वमित्यन्ये ॥ २९ ॥
२९-दूसरे (आचार्यों)-का मत है कि भक्ति और ज्ञान
परस्पर एक-दूसरेके आश्रित हैं।
ऐसा भी होता है। गौणी भक्तिसे भगवान्के तत्त्वका ज्ञान होता है
और तत्त्वके जाननेसे भगवान्में अत्यन्त प्रेम उत्पन्न होता है। परन्तु
केवल भक्तिके प्रेमीजन इस मतकी परवा नहीं करते। क्योंकि वे इस
बातको जानते हैं कि जब निर्मल प्रेमस्वरूपा भक्तिका पूर्ण उदय
होता है तब किसीका ज्ञान अलग रह ही नहीं जाता। प्रेमी और
प्रेमास्पद दोनों एक हो जाते हैं। फिर किसका ज्ञान किसको होगा ?
स्वयं फलरूपतेति ब्रह्मकुमाराः * ॥ ३० ॥
३०-ब्रह्मकुमारोंके (सनत्कुमारादि और नारदके) मतसे
भक्ति स्वयं फलरूपा है।
- पाठभेद 'ब्रह्मकुमारः'।
अतएव यह भक्ति ही साधन है और भक्ति ही साध्य है। मूल
भी वही और फल भी वही। भक्तगण भक्तिके लिये ही भक्ति
करते हैं। क्योंकि भक्ति स्वयं फलरूपा है। वह न किसी साधनसे
मिलती है और न कोई उससे श्रेष्ठ वस्तु है जिसकी प्राप्तिका
वह साधन हो।
सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना॥
राजगृहभोजनादिषु तथैव दृष्टत्वात् ॥ ३१ ॥
३१-राजगृह और भोजनादिमें ऐसा ही देखा जाता है।
यह पूर्वकथित भक्तिकी फलरूपताको समझनेके लिये
उदाहरण है।
न तेन राजपरितोषः क्षुधाशान्तिर्वा ॥ ३२ ॥
३२-न उससे (जान लेनेमात्रसे) राजाकी प्रसन्नता होगी,
न क्षुधा मिटेगी।
केवल राजमहलका वर्णन सुनने और जान लेनेसे काम
नहीं चलता। राजा धर्मात्मा है, शक्तिशाली है, प्रजाहितैषी है,
रूपगुणसम्पन्न है, यह बात भी जान ली; परन्तु इससे क्या हुआ,
इस जाननेमात्रसे राजा प्रसन्न थोड़े ही हो गया। इसी प्रकार जान
लिया कि हलवा मीठा होता है, घी और शक्करसे बनता है,
बड़ा स्वादिष्ट है; परन्तु इससे भूख तो नहीं मिटती। इसी तरह
केवल शब्दज्ञानसे न तो भगवान्की प्रसन्नता होती है और न हमें
शान्ति ही मिलती है। यद्यपि भगवान्के लिये सभी समान
हैं तथापि उनकी प्रसन्नता तो भक्तिसे ही मिलती है। वे स्वयं
कहते हैं—
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥
(गीता ९।२९)
प्रेमरूपा भक्ति फलरूपा है ५९
'मैं सब भूतोंमें सम हूँ, न कोई मेरा द्वेष्य है और न प्रिय
है; परन्तु जो मुझको भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं
उनमें हूँ।'
तस्मात्सैव ग्राह्या मुमुक्षुभिः ॥ ३३ ॥
३३-अतएव (संसारके बन्धनसे) मुक्त होनेकी इच्छा
रखनेवालोंको भक्ति ही ग्रहण करनी चाहिये।
भक्तिसे भवबन्धन तो अनायास कट ही जाता है, साक्षात्
भगवान् उसके प्रेमास्पद बनकर उसके साथ दिव्य लीला
करते हैं।
अति दुर्लभ कैवल्य परम पद। संत पुरान निगम आगम बद॥
राम भजत सोइ मुकुति गोसाईं। अनइच्छित आवइ बरिआई॥
अन्यान्य बड़े-बड़े साधनोंसे भी सहजमें न मिलनेवाली अति
दुर्लभ मुक्ति बिना ही माँगे बलात् आती है, परन्तु वह भक्त तो—
मुक्ति निरादर भगति लुभाने॥
मुक्तिकी ओर आँख उठाकर भी नहीं देखता। ऐसी सुलभ
और सर्वोपरि स्थितिरूप भक्तिको छोड़कर दूसरे साधनको कोई
क्यों करे? श्रद्धालु और बुद्धिमान् पुरुषोंको केवल भक्ति ही
करनी चाहिये।
☐ ☐
प्रेमरूपा भक्तिके साधन और
सत्संगकी महिमा
तस्याः साधनानि गायन्त्याचार्याः ॥ ३४ ॥
३४-आचार्यगण उस भक्तिके साधन बतलाते हैं।
कर्म और ज्ञानकी अपेक्षा भक्तिकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन
करके अब देवर्षि नारद भक्तिशास्त्रके प्रधान प्रवर्तक और भक्ति-
तत्त्वके अनुभवी आचार्यों एवं सन्त-भक्तोंद्वारा गान किये हुए उस
श्रेष्ठतम भक्तिके साधनोंका वर्णन करते हैं।
तत्तु विषयत्यागात् संगत्यागाच्च ॥ ३५ ॥
३५-वह ( भक्ति-साधन ) विषयत्याग और संगत्यागसे
सम्पन्न होता है।
जीवके मनमें स्वाभाविक ही प्रेमका स्रोत है, क्योंकि जीव
परमानन्दस्वरूप परमप्रेमरूप भगवान्का ही सनातन चिदंश है। परन्तु
विषयोंके प्रति प्रवाहित होनेसे उसके प्रेमकी धारा दूषित हो गयी है
और इसीसे वह प्रेम दुःख उत्पन्न करनेवाले कामके रूपमें परिणत
हो रहा है और इसी कारण उसके परमात्ममुखी दिव्य स्वरूपका
प्रकाश नहीं होता। प्रेमके दिव्य स्वरूपके प्रकाशके लिये उसकी
विषयाभिमुखी गतिको पलटकर ईश्वराभिमुखी करनेकी आवश्यकता
है। इसके लिये दो उपाय हैं—१-विषयोंका स्वरूपसे त्याग और
२-विषयोंकी आसक्तिका त्याग। जो लोग यह मानते हैं कि विषयोंमें
आसक्त रहते और यथेच्छ अमर्यादित विषयोंका संग्रह एवं उपभोग
करते हुए ही भगवान्की भक्ति प्राप्त हो जायगी अथवा भगवद्भक्तिके
मार्गमें विषय और विषयासक्तिके त्यागकी कोई आवश्यकता ही
नहीं है, वे बहुत बड़ी भूलमें हैं। भक्तिमें तो अपने भोगके लिये कोई