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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 60 of 178

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Page 60

अतएव यह भक्ति ही साधन है और भक्ति ही साध्य है। मूल
भी वही और फल भी वही। भक्तगण भक्तिके लिये ही भक्ति
करते हैं। क्योंकि भक्ति स्वयं फलरूपा है। वह न किसी साधनसे
मिलती है और न कोई उससे श्रेष्ठ वस्तु है जिसकी प्राप्तिका
वह साधन हो।
सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना॥
राजगृहभोजनादिषु तथैव दृष्टत्वात् ॥ ३१ ॥
३१-राजगृह और भोजनादिमें ऐसा ही देखा जाता है।
यह पूर्वकथित भक्तिकी फलरूपताको समझनेके लिये
उदाहरण है।
न तेन राजपरितोषः क्षुधाशान्तिर्वा ॥ ३२ ॥
३२-न उससे (जान लेनेमात्रसे) राजाकी प्रसन्नता होगी,
न क्षुधा मिटेगी।
केवल राजमहलका वर्णन सुनने और जान लेनेसे काम
नहीं चलता। राजा धर्मात्मा है, शक्तिशाली है, प्रजाहितैषी है,
रूपगुणसम्पन्न है, यह बात भी जान ली; परन्तु इससे क्या हुआ,
इस जाननेमात्रसे राजा प्रसन्न थोड़े ही हो गया। इसी प्रकार जान
लिया कि हलवा मीठा होता है, घी और शक्करसे बनता है,
बड़ा स्वादिष्ट है; परन्तु इससे भूख तो नहीं मिटती। इसी तरह
केवल शब्दज्ञानसे न तो भगवान्‌की प्रसन्नता होती है और न हमें
शान्ति ही मिलती है। यद्यपि भगवान्‌के लिये सभी समान
हैं तथापि उनकी प्रसन्नता तो भक्तिसे ही मिलती है। वे स्वयं
कहते हैं—
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥
(गीता ९।२९)