प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in contextप्रेमरूपा भक्तिके साधन और
सत्संगकी महिमा
तस्याः साधनानि गायन्त्याचार्याः ॥ ३४ ॥
३४-आचार्यगण उस भक्तिके साधन बतलाते हैं।
कर्म और ज्ञानकी अपेक्षा भक्तिकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन
करके अब देवर्षि नारद भक्तिशास्त्रके प्रधान प्रवर्तक और भक्ति-
तत्त्वके अनुभवी आचार्यों एवं सन्त-भक्तोंद्वारा गान किये हुए उस
श्रेष्ठतम भक्तिके साधनोंका वर्णन करते हैं।
तत्तु विषयत्यागात् संगत्यागाच्च ॥ ३५ ॥
३५-वह ( भक्ति-साधन ) विषयत्याग और संगत्यागसे
सम्पन्न होता है।
जीवके मनमें स्वाभाविक ही प्रेमका स्रोत है, क्योंकि जीव
परमानन्दस्वरूप परमप्रेमरूप भगवान्का ही सनातन चिदंश है। परन्तु
विषयोंके प्रति प्रवाहित होनेसे उसके प्रेमकी धारा दूषित हो गयी है
और इसीसे वह प्रेम दुःख उत्पन्न करनेवाले कामके रूपमें परिणत
हो रहा है और इसी कारण उसके परमात्ममुखी दिव्य स्वरूपका
प्रकाश नहीं होता। प्रेमके दिव्य स्वरूपके प्रकाशके लिये उसकी
विषयाभिमुखी गतिको पलटकर ईश्वराभिमुखी करनेकी आवश्यकता
है। इसके लिये दो उपाय हैं—१-विषयोंका स्वरूपसे त्याग और
२-विषयोंकी आसक्तिका त्याग। जो लोग यह मानते हैं कि विषयोंमें
आसक्त रहते और यथेच्छ अमर्यादित विषयोंका संग्रह एवं उपभोग
करते हुए ही भगवान्की भक्ति प्राप्त हो जायगी अथवा भगवद्भक्तिके
मार्गमें विषय और विषयासक्तिके त्यागकी कोई आवश्यकता ही
नहीं है, वे बहुत बड़ी भूलमें हैं। भक्तिमें तो अपने भोगके लिये कोई