प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in contextचलत चितवत दिवस जागत, सुपन सोवत रात।
हृदयते वह स्याम मूरति छिन न इत उत जात॥
कहत कथा अनेक ऊधौ! लोक-लाज दिखात।
कहा करौं तन प्रेमपूरन, घट न सिंधु समात॥
स्याम गात सरोज आनन, ललित गति मृदु हास।
'सूर' ऐसे रूप कारन मरत लोचन प्यास॥
[२]
ऊधौ! जोग जोग हम नाहीं।
अबला ग्यान सार कहा जानें, कैसे ध्यान धराहीं॥
ते ये मूँदन नैन कहत हौ, हरि मूरति जिन माहीं।
ऐसी कथा कपटकी मधुकर हमते सुनी न जाहीं॥
स्त्रवन चीर अरु जटा बँधावहु, ये दुख कौन समाहीं।
चंदन तजि अँग भसम बतावत, बिरह अनल अति दाहीं॥
जोगी भरमत जेहि लगि भूले, सो तो है हम पाहीं।
'सूरदास' सो न्यारो न पल छिन, ज्यों घटते परिछाहीं॥
गोपियोंने कहा—'उद्धवजी! योग उन्हें जाकर सिखाओ, जहाँ
श्यामसुन्दरका वियोग हो। यहाँ तो देखो, सदा ही संयोग है;
हमारा प्यारा श्याम सदा-सर्वदा हमारे साथ ही रहता है।'
तब उद्धवकी आँखें खुलीं, वे गोपियोंके शुद्ध प्रेमके प्रबल
प्रवाहमें बह गये—
सुनि गोपीके बैन, नेम ऊधौके भूले।
गावत गुन गोपाल फिरत कुंजनमें फूले॥
खिन गोपिनके पग परै, धन्य सोइ है नेम।
धाइ धाइ द्रुम भेंटही, ऊधौ छाके प्रेम॥
उन्होंने भक्तिप्रणत चित्तसे कहा—