प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in contextप्रेमरूपा भक्तिके लक्षण और उदाहरण ४३
शून्य हृदयवाले महात्मा जिस परमसुखका अनुभव करते हैं, उस
निरपेक्ष परमानन्दको दूसरे लोग नहीं जानते।' बस, श्रीनारदजीके
मतसे यही भक्ति है। ऐसा भक्त समस्त आचरण श्रीभगवान्के अर्पण
करके अनवच्छिन्नरूपसे भगवत्स्मरण करता रहता है और कहीं
तनिक भी भूल जानेपर परम व्याकुल हो जाता है।
अस्त्येवमेवम् ॥ २० ॥
२०-ठीक ऐसा ही है।
देवर्षि नारद पिछले सूत्रमें बतलाये हुए सिद्धान्तकी दृढ़ताके
लिये कहते हैं कि वस्तुतः भक्तिका यही स्वरूप है।
यथा व्रजगोपिकानाम् ॥ २१ ॥
२१-जैसे व्रजगोपियोंकी ( भक्ति ) ।
भक्तिका लक्षण बतलाकर अब देवर्षि उदाहरणमें प्रेमिका-
शिरोमणि प्रातःस्मरणीया श्रीगोपिकाओंका नाम लेते हैं। वस्तुतः
गोपियोंकी ऐसी ही महिमा है। जगत्में ऐसा कौन है जो गोपियोंके
प्रेमके तत्त्वका बखान कर सके? उनका तन, मन, धन, लोक,
परलोक सब श्रीकृष्णके अर्पित था। वे दिन-रात श्रीकृष्णका ही
चिन्तन करतीं, गद्गद वाणीसे निरन्तर श्रीकृष्णका ही गुणगान करतीं
और सर्वत्र सर्वदा श्रीकृष्णको ही देखा करती थीं। स्वयं भगवान्
श्रीकृष्णने उनसे कहा है—
न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां
स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः।
या माभजन् दुर्जरगेहशृङ्खलाः
संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना॥
( श्रीमद्भा० १०।३२।२२)
'हे गोपिकाओ! तुमने मेरे लिये गृहस्थकी कठिन बेड़ियोंको
तोड़कर मेरा भजन किया है। तुम्हारा यह कार्य सर्वथा निर्दोष है। मैं