प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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प्रेरित होकर, सर्वथा निःस्वार्थभावसे समस्त दैहिक, वाचिक और
मानसिक कर्मोंका आचरण करना। यदि किसी कारणवश क्षणभरके
लिये भी उनका चिन्तन-स्मरण छूट जाय तो जलसे निकाली हुई
मछलीसे भी अनन्तगुणा अधिक व्याकुलताका अनुभव करना, यही
सर्वोच्च भक्ति है।
ऐसा पूर्ण समर्पणकारी प्रेमी भक्त त्रैलोक्यके राज्यसुखकी
तो बात ही क्या है, अपुनरावर्त्ती मोक्षके लिये भी, किसी भी
हालतमें अपने प्रियतम भगवान्का स्मरण छोड़ना नहीं चाहता।
भगवान् ऐसे भक्तकी प्रशंसा करते हुए भक्त उद्धवसे कहते हैं—
न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शंकरः।
न च संकर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान्॥
निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम्।
अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यङ्घ्रिरेणुभिः॥
निष्किंचना मय्यनुरक्तचेतसः
शान्ता महान्तोऽखिलजीववत्सलाः।
कामैरनालब्धधियो जुषन्ति यत्
तन्निरपेक्ष्यं न विदुः सुखं मम॥
(श्रीमद्भा० ११।१४।१५–१७)
'हे उद्धव ! इस प्रकारके तुम भक्त मुझको जैसे प्रिय हो, वैसे प्रिय
ब्रह्मा, शंकर, बलराम, लक्ष्मी और अपनी आत्मा भी नहीं है। ऐसे
किसी वस्तुकी इच्छा न रखनेवाले, शान्तचित्त, निर्वैर, सर्वत्र समभावसे
मुझको देखनेवाले और निरन्तर मेरा मनन करनेवाले प्रेमी भक्तोंकी
चरणरजसे अपनेको पवित्र करनेके लिये मैं सदा-सर्वदा उनके
पीछे-पीछे घूमा करता हूँ। मुझमें चित्तको अनुरक्त कर रखनेवाले,
सर्वस्व मुझको अर्पण करके अकिंचन बने हुए ऐसे शान्त और मेरे
नाते सब जीवोंके प्रति स्नेह करनेवाले तथा सब प्रकारकी कामनाओंसे