प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in contextप्रेमरूपा भक्ति फलरूपा है
सा तु कर्मज्ञानयोगेभ्योऽप्यधिकतरा ॥ २५ ॥
२५-वह (प्रेमरूपा भक्ति) तो कर्म, ज्ञान और योगसे भी
श्रेष्ठतर है।
कर्म, ज्ञान और योग तीनों ही भगवत्प्राप्तिके साधन हैं, परन्तु
भक्ति इन तीनोंमें सबसे श्रेष्ठ है। उनमें वर्ण, आश्रम, अधिकार
आदिका विचार है; साथ ही गिरनेका भय भी है, परन्तु सच्ची
भक्तिमें भगवान्की पूरी सहायता रहनेके कारण कोई भी भय नहीं
है तथा इसमें स्त्री, पुरुष, ब्राह्मण, शूद्र आदि सभीका अधिकार
है। गोसाईं तुलसीदासजी महाराज कहते हैं—
जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं॥
ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी॥
सुनु खगेस हरि भगति बिहाई। जे सुख चाहहिं आन उपाई॥
ते सठ महासिंधु बिनु तरनी। पैरि पार चाहहिं जड़ करनी॥
उमा जोग जप दान तप नाना मख ब्रत नेम।
राम कृपा नहिं करहिं तसि जसि निष्केवल प्रेम॥
पन्नगारि सुनु प्रेम सम भजन न दूसर आन।
यह बिचारि मुनि पुनि पुनि करत राम गुन गान॥
स्वयं श्रीभगवान् कहते हैं—
न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता॥
भक्त्याहमेकया ग्राह्यः श्रद्धयात्मा प्रियः सताम्।
भक्तिः पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात्॥
(श्रीमद्भा० ११।१४।२०-२१)
'जिस प्रकार मेरी दृढ़भक्ति मुझे वश करती है, उस प्रकार