प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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देकर वे श्रीकृष्णको सुख पहुँचाना चाहती थीं। जिस बातमें श्रीकृष्णकी
प्रसन्नता होती, वही करना उनका धर्म था। उसीमें उन्हें परम सुखकी
अनुभूति होती थी। इसके अतिरिक्त उनके मनमें अन्य प्रकारसे
होनेवाले सुखकी कामना तो दूर रही, कल्पना भी नहीं थी। यही तो
काम और प्रेमका अन्तर है। काम चाहता है दूसरेके द्वारा अपने सुखी
होना, और प्रेम चाहता है अपने द्वारा प्रियतमको सुखी करना और
उसे सुखी देखकर ही सुखी होना। श्रीचैतन्यचरितामृतमें गोपियोंके
प्रेमका वर्णन करते हुए बहुत ही ठीक कहा गया है—
आत्मेन्द्रिय प्रीति-इच्छा, तार नाम काम। कृष्णेन्द्रिय प्रीति-इच्छा धरे प्रेम नाम॥
कामेर तात्पर्य निज संभोग केवल। कृष्ण-सुख तात्पर्य प्रेम तो प्रबल॥
आत्म-सुख-दुःख गोपी ना करे विचार। कृष्ण-सुख-हेतु करे सब व्यवहार॥
लोकधर्म, वेदधर्म, देहधर्म कर्म। लज्जा, धैर्य, देहसुख, आत्मसुख मर्म॥
सर्व त्याग करये करे कृष्णेर भजन। कृष्णसुख हेतु करे प्रेमेर सेवन॥
इहाके कहिये कृष्णे दृढ़ अनुराग। स्वच्छ धौत वस्त्र जैसे नाहिं कोन दाग॥
अतएव काम प्रेमे बहुत अंतर। काम अंधतम प्रेम निर्मल भास्कर॥
अतएव गोपीगणे नाहि कामगंध। कृष्णसुख हेतु मात्र कृष्णेर संबंध॥
भगवान् श्रीकृष्णको सर्वस्व अर्पण, पलभरके लिये भूल
जानेमें परम व्याकुलता, श्रीकृष्णके प्रभाव और माहात्म्यका
सम्यक् ज्ञान और श्रीकृष्णके सुखमें ही सुखी होना, यही चार
बातें गोपी-प्रेममें मुख्य हैं।
यह गोपी-प्रेम परम पवित्र और अलौकिक है। इसमें जो पाप
या व्यभिचार देखते हैं, उनपर श्रीकृष्ण दया करें।
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