प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in contextहो, यदि मैं आगामी जन्ममें इस वृन्दावनकी लता, ओषधि या
झाड़ियोंमेंसे कोई होऊँ, जिनपर इन गोपियोंकी चरणधूलि पड़ती
है।' मथुराकी कुलांगनाओंने गोपियोंकी दशाका वर्णन करके
उनके जीवनको धन्य बताते हुए कहा है—
या दोहनेऽवहने मथनोपलेप-
प्रेङ्खेङ्खनार्भयरुदितोक्षणमार्जनादौ ।
गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठ्यो
धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयानाः ॥
(श्रीमद्भा० १०।४४।१५)
'जो गोपियाँ गायोंका दूध दुहते समय, धान आदि कूटते समय,
दही बिलोते समय, आँगन लीपते समय, बालकोंको झुलाते समय,
रोते हुए बच्चोंको लोरी देते समय, घरोंमें छिड़काव करते तथा
झाडू देते समय प्रेमपूर्ण चित्तसे, आँखोंमें आँसू भरे, गद्गद वाणीसे
श्रीकृष्णके गुणगान किया करती हैं, उन श्रीकृष्णमें चित्त निवेशित
करनेवाली गोपरमणियोंको धन्य है!'
इन गोपियोंकी जितनी महिमा गायी जाय, उतनी ही थोड़ी है।
सर्वत्यागी व्रजवासी भक्तोंने तो गोपीपद-पंकजपराग ही बनना चाहा
है। सत्य ही कहा है—
गोपी प्रेमकी धुजा।
जिन घनस्याम किये बस अपने उर धरि स्यामभुजा॥
महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव-सदृश महान् त्यागी महापुरुषोंने तो गोपियोंको
प्रेममार्गका गुरु माना है। महान् भक्त श्रीनागरीदासजी कहते हैं—
जयति ललितादि देवीय व्रज श्रुतिरिचा,
कृष्ण प्रिय केलि आधीर अंगी।
जुगल-रस-मत्त आनंदमय रूपनिधि,
सकल सुख समयकी छाँह संगी॥