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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

DevanagariHindipublished178 pages

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प्रेमरूपा भक्तिके लक्षण और उदाहरण ५१
तद्विहीनं जाराणामिव ॥ २३ ॥
२३-उसके बिना ( भगवान्‌को भगवान् जाने बिना किया
जानेवाला ऐसा प्रेम ) जारोंके ( प्रेमके ) समान है।
माहात्म्यज्ञान बिना स्त्रियोंके द्वारा किसी पुरुषके प्रति किया
जानेवाला ऐसा प्रेम जारोंका-सा प्रेम होता है। जिस प्रेममें सर्वार्पण
है, जिसमें लौकिक स्वार्थकी तनिक-सी गन्ध भी नहीं है, ऐसा प्रेम
केवल भगवान्‌के प्रति ही हो सकता है। यद्यपि जाने-अनजाने किसी
प्रकार भी भगवान्‌के प्रति किया हुआ प्रेम निष्फल नहीं होता, परन्तु
जानकर होनेवाले प्रेममें विशेषता होती है। भगवान् हमारे प्रियतम हैं,
इस कल्पनामें ही कितना अपार आनन्द है। फिर जिनको वे भगवान्
परम प्रियतमरूपमें प्राप्त हो जायँ, उनके सुखका तो कहना ही क्या
है ? गोपियाँ इसी परम पवित्र दिव्य सुखकी भागिनी थीं। इसीसे
जीवन्मुक्त महात्मा शुकदेव मुनिने मृत्युके लिये तैयार हुए राजा
परीक्षित्‌को यह पवित्र प्रेमलीला सुनायी थी। अतएव यह प्रेम
भगवत्-माहात्म्यके ज्ञानसे युक्त परम पवित्र था।
नास्त्येव तस्मिंस्तत्सुखसुखित्वम् ॥ २४ ॥
२४-उसमें ( जारके प्रेममें ) प्रियतमके सुखसे सुखी होना नहीं है।
व्यभिचारी मनुष्य कामवश होकर केवल अपने सुखके लिये,
अपनी इन्द्रियोंकी तृप्तिके लिये प्रीति किया करते हैं; वे अपने
प्रेमास्पदके सुखसे सुखी नहीं होते। गोपियोंके प्रेममें यह भाव नहीं
था। लौकिक कामजनित प्रीतिमें प्रेमास्पद पुरुष जार होता है और
उसके अंग-संगकी इच्छा होती है। यहाँ प्रेमास्पद साक्षात् विश्वात्मा
भगवान् थे और गोपियोंके मनोंमें अंग-संगकी कामना नहीं थी।
गोपियाँ केवल श्रीकृष्ण-सुखकी अभिलाषिणी थीं। उन्होंने अपना
तन, मन, बुद्धि, रूप, यौवन, धन, प्राण आदि सम्पूर्ण वस्तुओंको
प्रियतम श्रीकृष्णकी पूजन-सामग्री बना दिया था। अपना सर्वस्व