प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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देवताओंकी आयुपर्यन्त भी तुम्हारे इस उपकारका बदला नहीं चुका
सकता। तुम अपनी उदारतासे ही मुझे ऋणमुक्त करना।'
उद्धवको सँदेसा देकर भेजते समय भगवान् श्रीकृष्णने प्रेमाश्रु
बहाते हुए गद्गद वाणीसे कहा था—
ता मन्मनस्का मत्प्राणा मदर्थे त्यक्तदैहिकाः।
मामेव दयितं प्रेष्ठमात्मानं मनसा गताः।
ये त्यक्तलोकधर्माश्च मदर्थे तान् बिभर्म्यहम्॥
मयि ताः प्रेयसां प्रेष्ठे दूरस्थे गोकुलस्त्रियः।
स्मरन्त्योऽङ्ग विमुह्यन्ति विरहौत्कण्ठ्यविह्वलाः॥
धारयन्त्यतिकृच्छ्रेण प्रायः प्राणान् कथञ्चन।
प्रत्यागमनसन्देशैर्बल्लव्यो मे मदात्मिकाः॥
(श्रीमद्भा० १०।४६।४—६)
'हे उद्धव! गोपियोंने अपना मन मुझको समर्पण कर दिया है, मैं
ही उनके प्राण हूँ, मेरे लिये उन्होंने अपने देहके सारे व्यवहार छोड़ दिये
हैं। जो लोग मेरे लिये समस्त लौकिक धर्मोंको छोड़ देते हैं, उनको
मैं सुख पहुँचाता हूँ। वे गोपियाँ मुझको प्रियसे भी अति प्रिय समझती
हैं, मेरे दूर रहनेपर मुझे स्मरण करके वे दारुण विरहवेदनासे व्याकुल
होकर अपने देहकी सुधि भूल जाती हैं। मेरे बिना वे बड़ी ही कठिनतासे
किसी प्रकार प्राण धारण कर रही हैं, मेरे पुनः ब्रज जानेके सन्देशके
आधारपर ही वे जी रही हैं। मैं उन गोपियोंकी आत्मा हूँ और वे मेरी हैं।'
उद्धवने ब्रजमें आकर जब प्रेममयी गोपियोंकी दशा देखी, उन्हें
सब ओर, बाहर-भीतर श्रीकृष्णके दर्शन करते पाया और जब उनके
मुखसे सुना—
[१]
नाहिन रह्यो हियमहँ ठौर।
नंदनंदन अछत कैसे आनिये उर और॥