प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in contextप्रेमरूपा भक्तिके लक्षण और उदाहरण ४१
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥
(६।४६-४७)
'तपस्वियोंसे, शास्त्र-ज्ञानियोंसे और सकाम कर्मियोंसे भी योगी
श्रेष्ठ है; अतएव हे अर्जुन ! तू योगी बन। परन्तु सम्पूर्ण योगियोंमें भी
वह भक्ति-योगी मेरे मतमें परम श्रेष्ठ है जो मुझमें श्रद्धावान् है और
अन्तरात्माको मुझमें लगाकर निरन्तर मुझे भजता है।'
भगवान्ने फिर आज्ञा की है—
तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥
(गीता ८।७)
'इसलिये हे अर्जुन ! तू सब समय (बिना विराम) मेरा स्मरण
कर और (स्मरण करता हुआ ही मेरे लिये ही) युद्ध कर। इस प्रकार
मुझमें ही मन-बुद्धि अर्पण करके तू निस्सन्देह मुझको ही प्राप्त
होगा।'
मानापमान, लाभ-हानि, जय-पराजय, सुख-दुःख आदिकी परवा
न करके, आसक्ति और फलकी इच्छा छोड़कर, शरीर और संसारमें
अपने लिये अहंता-ममतासे रहित होकर, एकमात्र परम प्रियतम
श्रीभगवान्को ही परम आश्रय, परम गति, परम सुहृद् समझकर,
अनन्यभावसे, अत्यन्त श्रद्धाके साथ, प्रेमपूर्वक निरन्तर तैलधारावत्
उनके नाम, गुण, प्रभाव और स्वरूपका चिन्तन करते हुए परमानन्दमें
मग्न रहना और इस प्रकार चिन्तनपरायण रहते हुए ही केवल उन
परम प्रियतम भगवान्के लिये, उनकी रुचि तथा इच्छाके अनुसार,
उन्हींके प्रीत्यर्थ, उन्हींको सुख पहुँचानेके दृढ़ और परम स्वार्थसे