प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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एताः परं तनुभृतो भुवि गोपवध्वो
गोविन्द एव निखिलात्मनि रूढभावाः।
वाञ्छन्ति यद् भवभियो मुनयो वयं च
किं ब्रह्मजन्मभिरनन्तकथारसस्य॥
नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः
स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः।
रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ-
लब्धाशिषां य उदगाद् व्रजवल्लवीनाम्॥
आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां
वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।
या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा
भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥
(श्रीमद्भा० १०।४७।५८, ६०-६१)
'जगत्में इन गोपललनाओंका ही देह धारण करना सफल है,
क्योंकि इनका चित्त विश्वात्मा भगवान् श्रीगोविन्दमें लगा हुआ
है, जिनकी भवभयसे भीत हुए मुनिगण तथा हमलोग सभी इच्छा
करते हैं। सत्य है, जो श्रीअनन्तकी लीला-कथाओंके रसिक हैं,
उन्हें ब्राह्मणोंके तीनों जन्मों (जन्म, यज्ञोपवीत और यज्ञदीक्षा)-
की क्या आवश्यकता है? रासलीलाके समय भगवान् श्रीहरिके
भुजदण्डको कण्ठहार बनाकर पूर्णकाम हुई इन व्रजबालाओंको
श्रीहरिका जो प्रसाद प्राप्त हुआ है, वैसा निरन्तर हृदयमें
रहनेवाली श्रीलक्ष्मीजी और कमलकी-सी कान्ति और सुगन्धिसे
युक्त सुरसुन्दरियोंको भी नहीं मिला; फिर औरोंकी तो बात ही
क्या है? इन महाभागा गोपियोंने कठिनतासे छोड़े जा सकनेवाले
बन्धुओंको और आर्यधर्मको त्यागकर श्रुति जिसकी खोज करती
है, उस मुकुन्दपदवीका अनुसरण किया है। अहो! क्या ही उत्तम