केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
About this granth
The Kena Upanishad (केनोपनिषद्) belongs to the Talavakara (Jaiminiya) Brahmana of the Samaveda and takes its name from its first word, kena, 'by whom?'. Its first two sections describe Brahman as what moves the mind, speech, breath and senses while remaining beyond their reach. The last two tell the parable of the yaksha: Agni, Vayu and Indra, proud of their powers, cannot burn or blow away a single blade of grass before a mysterious being, until Uma Haimavati reveals to Indra that it was Brahman.
This Gita Press, Gorakhpur edition (No. 68) is notable for including both of Shankaracharya's commentaries on the text, the word-by-word pada-bhashya and the argumentative vakya-bhashya, each with Hindi translation. The publisher's note explains that Shankara wrote the second to bring out the meaning through reasoning. Mantra, meaning, Sanskrit commentary and its translation are set side by side, and an index of mantras closes the volume.
The imprint records over 132,000 copies printed from Samvat 1992 onward; this is the twentieth edition of Samvat 2053.
४ केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
सकामस्य तु ज्ञानरहितस्य केव- | ज्ञानरहित सकाम साधकके केवल
लानि श्रौतानि स्मार्तानि च | श्रौत और स्मार्त कर्म दक्षिण
कर्माणि दक्षिणमार्गप्रतिपत्तये | मार्गकी प्राप्ति और पुनरावर्तनके
पुनरावृत्तये च भवन्ति । स्वाभा- | हेतु होते हैं । इनके सिवा
विक्या त्वशास्त्रीयया प्रवृत्त्या | अशास्त्रीय स्वच्छन्द वृत्तिसे तो पशु-
पश्चादिस्थावरान्ता अधोगतिः | से लेकर स्थावरपर्यन्त अधोगति ही
स्यात् । “अथैतयोः पथोर्न कतरेण | होती है । “ये [ स्वच्छन्द प्रवृत्ति-
च न तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदा- | वाले जीव उत्तरायण और
वर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व | दक्षिणायन ] इन दोनोंमेंसे किसी
म्रियस्वेत्येतत्तृतीयँ स्थानम्” | मार्गसे नहीं जाते; वे निरन्तर
(छा० उ० ५।१०।८) इतिश्रुतेः; | आवर्तन करनेवाले क्षुद्र जीव होते
| हैं; उनका ‘जन्म लो और मरो’
| यह तीसरा स्थान (मार्ग) है”
वाक्य-भाष्य
कस्मादिति चेदात्मनो हि यथा- | कि क्यों ? तो उसका कारण यह है कि
वद्विज्ञानं कर्मणा विरुध्यते । | आत्माका यथार्थ ज्ञान कर्मका विरोधी
निरतिशयब्रह्मस्वरूपो ह्यात्मा | है, क्योंकि जिसका ज्ञान कराना अभीष्ट
विजिज्ञापयिषितः, “तदेव ब्रह्म | है वह आत्मा तो सर्वोत्कृष्ट ब्रह्मस्वरूप
त्वं विद्धि नेदं यदिदम् ०” | ही है, जैसा कि “तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि
(के० उ० १।४) इत्यादि श्रुतेः । | नेदं यदिदमुपासते” इत्यादि श्रुतिका
न हि स्वराज्येऽभिषिक्तो ब्रह्मत्वं | कथन है । जो पुरुष स्वाराज्यपर
गमितः कश्चन नमितुमिच्छत्यतो | अभिषिक्त होकर ब्रह्मभावको प्राप्त हो
ब्रह्मास्मीति सम्बुद्धो न कर्म | गया है वह किसीके भी सामने झुकने-
कारयितुं शक्यते । न ह्यात्मानम् | की इच्छा नहीं करता । अतः जिसने
अवाप्तार्थं ब्रह्म मन्यमानः प्रवृत्तिं | यह जान लिया है कि ‘मैं ब्रह्म हूँ’
प्रयोजनवतीं पश्यति । न च | उससे कर्म नहीं कराया जा सकता ।
| अपने आत्माको आप्तकाम ब्रह्म मानने-
| वाला पुरुष किसी भी प्रवृत्तिको
| प्रयोजनवती नहीं देखता और कोई भी
मन्त्रवर्णात् । | मन्त्रवर्णसे भी [ यही बात सिद्ध होती है ] ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५
पद-भाष्य
“प्रजा ह तिस्रोऽत्यायमीयुः” | इस श्रुतिसे और “तीन प्रसिद्ध
(ऐ० आ० २।१।१।४) इति च | प्रजाओंने धर्मत्याग किया" इस
मन्त्रवर्णात् । | मन्त्रवर्णसे भी [ यही बात सिद्ध होती है ] ।
विशुद्धसत्त्वस्य तु निष्कामस्य | जो इस जन्म और पूर्व जन्ममें
ज्ञानाधिकारि- एव बाह्यादनित्यात् | किये हुए कर्मोंके संस्कारविशेषसे
निरूपणम् साध्यसाधनसम्बन्धाद् | उद्भूत बाह्य एवं अनित्य साध्य-
इह कृतात्पूर्वकृताद्वा संस्कार- | साधनके सम्बन्धसे विरक्त हो गया
विशेषोद्भावाद्विरक्तस्य प्रत्यगात्म- | है उस विशुद्धचित्त निष्काम पुरुष-
विषया जिज्ञासा प्रवर्तते । | को ही प्रत्यगात्मविषयक जिज्ञासा हो सकती है । यही बात
तदेतद्वस्तु प्रश्नप्रतिवचनलक्षण्या | 'केनेषितम्' इत्यादि प्रश्नोत्तररूपा
वाक्य-भाष्य
निष्प्रयोजना प्रवृत्तिरतो विरुध्यत | प्रवृत्ति बिना प्रयोजनके हो नहीं
एव कर्मणा ज्ञानम् । अतः कर्म- | सकती, अतः कर्मसे ज्ञानका विरोध
विषयेऽनुक्तिः,विज्ञानविशेषविषया | है ही। इसीलिये कर्मकाण्डमें आत्म-
एव जिज्ञासा । | ज्ञानका उल्लेख नहीं है; अर्थात् जिज्ञासा किसी विज्ञानविशेषके सम्बन्धमें ही होती है।
कर्मानारम्भ इति चेन्न; | यदि कहो कि तब तो कर्मका
निष्कामस्य संस्कारार्थत्वात् । | आरम्भ ही न किया जाय तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि निष्काम कर्म पुरुषका संस्कार करनेवाला है ।
यदि ह्यात्मविज्ञानेनात्माविद्या- | पूर्व०-यदि आत्माके अज्ञानका
विषयत्वात्परितित्याजायिषितं कर्म | कारण होनेसे आत्मज्ञानद्वारा कर्मका परित्याग कराना ही अभीष्ट है तो
ततः "प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूराद- | "कीचड़को धोनेकी अपेक्षा तो उसे
स्पर्शनं वरम्” (म० वन०२।४९) | दूरसे न छूना ही अच्छा है" इस
६ $\qquad\qquad\qquad\qquad$ केनोपनिषद् $\qquad\qquad\qquad\qquad$ [ खण्ड १
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का यथार्थ पाठ (Transcription) दिया गया है:
६ $\qquad\qquad\qquad\qquad$ केनोपनिषद् $\qquad\qquad\qquad\qquad$ [ खण्ड १
पद-भाष्य
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रुत्या प्रदर्श्यते 'केनेषितम्' | श्रुतिद्वारा दिखलायी जाती है। |
| इत्याद्यया । काठके चोक्तम् | कठोपनिषद्में तो कहा है— |
| “पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भू- | “स्वयम्भू परमात्माने इन्द्रियोंको |
| स्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्त- | बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया |
| रात्मन्। कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मा- | है; इसलिये इन्द्रियाँ बाहरकी ओर |
| नमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्” | ही देखती हैं, अन्तरात्माको नहीं |
| (क०उ० २।१।१) इत्यादि । | देखतीं; किसी-किसी बुद्धिमान्ने |
| “परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो | ही अमरत्वकी इच्छा करते हुए |
| अपनी इन्द्रियोंको रोककर | |
| प्रत्यगात्माका साक्षात्कार किया है” | |
| इत्यादि । तथा अथर्ववेदीय (मुण्डक) | |
| उपनिषद्में भी कहा है—“ब्रह्मनिष्ठ | |
| पुरुष कर्मद्वारा प्राप्त होनेवाले |
वाक्य-भाष्य
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इत्यनारम्भ एव कर्मणः श्रेयान् । | उक्तिके अनुसार कर्मको आरम्भ न |
| अल्पफलत्वादायासबहुलत्वात् | करना ही उत्तम है क्योंकि वह अल्प |
| तत्त्वज्ञानादेव च श्रेयःप्राप्तेः | फलवाला और अधिक परिश्रमवाला |
| इति चेत् । | है तथा आत्यन्तिक कल्याण तत्त्व- |
| विज्ञानसे ही होता है। |
| (पार्श्व-टिप्पणी) | संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|---|
| सत्यम्; एतदविद्याविषयं | सिद्धान्ती-ठीक है, परन्तु यह | |
| चित्तशुद्धये | कर्माल्पफलत्वादि- | अविद्यामूलक कर्म “जो भोगोंकी |
| कर्मावश्यकम् | दोषवद्बन्धरूपं च | कामना करता है” तथा “इस प्रकार |
| प्राप्तज्ञानस्य तु | सकामस्य “कामान् | जो कामना करनेवाला है” इत्यादि |
| तदनारम्भः | यः कामयते” (मु०उ० | श्रुतियोंके अनुसार सकाम पुरुषके लिये |
| ३।२।२) “इति नु कामयमानः” | ही अल्पफलत्वादि दोषोंसे युक्त तथा | |
| इत्यादिश्रुतिभ्यः; न निष्कामस्य । | बन्धनकारक है; निष्काम पुरुषके लिये | |
| तस्य तु संस्कारार्थान्येव कर्माणि | नहीं। उसके लिये तो कर्म अपने | |
| निर्वर्तक (निष्पन्न करनेवाले) और | ||
| आश्रयभूत प्राणोंके विज्ञानके सहित |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७
पद-भाष्य
निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन । | लोकोंकी परीक्षा कर वैराग्यको प्राप्त
| हो जाय, क्योंकि कृत (कर्म) के
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् | द्वारा अकृत (नित्यस्वरूप मोक्ष)
| प्राप्त नहीं हो सकता । उसका
समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्” | विशेष ज्ञान प्राप्त करनेके लिये तो
(मु० उ० १ । २ । १२) | उस (जिज्ञासु) को हाथमें समिधा
| लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरुके ही
इत्याद्याथर्वणे च । | पास जाना चाहिये” इत्यादि ।
एवं हि विरक्तस्य प्रत्यगात्म- | केवल इस प्रकारसे ही विरक्त
(निवृत्ताज्ञानस्य) विषयं विज्ञानं श्रोतुं | पुरुषको प्रत्यगात्मविषयक विज्ञानके
(कृतकृत्यता-) मन्तुं विज्ञातुं च | श्रवण, मनन और साक्षात्कारकी
(प्रदर्शनम्) सामर्थ्यमुपपद्यते, | क्षमता हो सकती है, और किसी
नान्यथा । एतस्माच्च प्रत्यगात्म- | तरह नहीं । इस प्रत्यगात्माके
वाक्य-भाष्य
भवन्ति तन्निर्वर्तकाश्रयप्राण- | संस्कारके ही कारण होते हैं। “देवयाजी
विज्ञानसहितानि । “देवयाजी | श्रेष्ठ हैं या आत्मयाजी” इस प्रकार
श्रेयानात्मयाजी वा” इत्युपक्र- | आरम्भ करके वाजसनेय श्रुतिमें कहा
म्यात्मयाजी तु करोति “इदं | है कि आत्मयाजी अपने संस्कारके
मेऽनेनाङ्गं संस्क्रियते इति” संस्का- | लिये ही यह समझकर कर्म करता है
रार्थमेव कर्माणीति वाजसनेयके। | कि “इससे मेरे इस अंगका संस्कार
“महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं | होगा” । “यह शरीर महायज्ञ और
क्रियते तनुः” (मनु० २ । २८) | यज्ञोंद्वारा ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिके योग्य
“यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि | किया जाता है।” “यज्ञ, दान और तप-
मनीषिणाम्” (गीता १८ । ५) | ये विद्वानोंको पवित्र करनेवाले ही हैं”
इत्यादि स्मृतेश्च । | इत्यादि स्मृतियोंसे भी यही बात सिद्ध
| होती है ।
प्राणादिविज्ञानं च केवलं कर्म- | अकेला या कर्मके साथ मिला हुआ
समुच्चितं वा सकामस्य प्राणात्म- | होनेपर भी प्राणादि विज्ञान सकाम
८ केनोपनिषद् [ खण्ड १
────────────────────────────────────────────────────
पद-भाष्य
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| ब्रह्मविज्ञानात्संसारबीजमज्ञानं | ब्रह्मतत्त्वविज्ञानसे ही कामना और |
| कामकर्मप्रवृत्तिकारणमशेषतो | कर्मकी प्रवृत्तिका कारण तथा |
| निवर्तते, “तत्र को मोहः कः | संसारका बीजभूत अज्ञान पूर्णतया |
| शोक एकत्वमनुपश्यतः” ( ई० | निवृत्त हो सकता है; जैसा कि |
| उ० ७) इति मन्त्रवर्णात्, | “उस अवस्थामें एकत्व देखनेवाले |
| “तरति शोकमात्मवित्” ( छा० | पुरुषको क्या मोह और क्या शोक |
| उ० ७। १। ३) इति, “भिद्यते | हो सकता है” इत्यादि मन्त्रवर्ण |
| हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। | तथा “आत्मज्ञानी शोकको पार कर |
| क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे | जाता है” “उस परावरको देख |
| परावरे” (मु० उ० २। २। ८) | लेनेपर उसकी हृदय-ग्रन्थि टूट जाती |
| इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । | है, सारे सन्देह नष्ट हो जाते हैं |
| और समस्त कर्म क्षीण हो जाते हैं” | |
| इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है । |
वाक्य-भाष्य
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| प्राप्त्यर्थमेव भवति । निष्कामस्य | पुरुषके लिये तो प्राणत्व-प्राप्तिका ही |
| त्वात्मज्ञानप्रतिबन्धनिर्माष्ट्र्यै | कारण होता है, किन्तु निष्काम पुरुष- |
| भवति; आदर्शनिर्माजर्नवत् । | के लिये वह दर्पणके मार्जनके समान |
| उत्पन्नात्मविद्यस्य त्वनारम्भो | आत्मज्ञानके प्रतिबन्धकोंका निवर्तक |
| निरर्थकत्वात् । “कर्मणा वध्यते | होता है । हाँ, जिसे आत्मज्ञान प्राप्त |
| जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते । | हो गया है उसके लिये निष्प्रयोजन |
| तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति यतयः | होनेके कारण कर्मके आरम्भकी अपेक्षा |
| पारदर्शिनः” ( महा० शा० | नहीं है । जैसा कि “जीव कर्मसे बँधता |
| २४२ । ७) इति । “क्रिया- | है और आत्मज्ञानसे मुक्त हो जाता है, |
| पथश्चै व पुरस्तात्संन्यासश्च तयोः | इसलिये पारदर्शी यतिजन कर्म नहीं |
| संन्यास एवात्यरेचयत्” इति | करते” “पूर्वकालमें कर्ममार्ग और |
| संन्यास [ दो मार्ग ] थे उनमें संन्यास | |
| ही उत्कृष्ट था” “किन्हींने त्यागसे |
खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ९
खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ९
❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧
पद-भाष्य
कर्मसहितादपि ज्ञानादेतत् सिध्यतीति चेत् ? | पूर्व०-यह बात तो कर्मसहित ज्ञानसे भी सिद्ध हो सकती है न ?
न; वाजसनेयके तस्यान्य- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि वाजसनेय (बृहदारण्यक) श्रुतिमें उस (कर्मसहित ज्ञान) को अन्य फलका कारण बतलाया है। “मुझे स्त्री प्राप्त हो” इस प्रकार आरम्भ करके वाजसनेय श्रुतिमें “यह लोक पुत्रद्वारा प्राप्त किया जा सकता है और किसी कर्मसे नहीं; कर्मसे पितृलोक मिलता है और विद्या (उपासना) से देवलोक” इस प्रकार उसे आत्मासे भिन्न लोकत्रय-का ही कारण बतलाया है।
समुच्चयवाद-खण्डनम् कारणत्ववचनात् । “जाया मे स्यात्” (बृ० उ० १।४।१७) इति प्रस्तुत्य “पुत्रेणायं लोको जय्यो नान्येन कर्मणा, कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोकः” (बृ० उ० १।५।१६) इत्यात्मनोऽन्यस्य लोकत्रयस्य कारणत्वमुक्तं वाजसनेयके ।
वाक्य-भाष्य
“त्यागेनैके०” (कै० उ० १।२) “नान्यः पन्था विद्यते०” (श्वे० उ० ३।८) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । | [अमरत्व प्राप्त किया]” तथा “[इसके सिवा] और कोई मार्ग नहीं है” इत्यादि श्रुतियोंसे भी सिद्ध होता है ।
न्यायाच्च; उपायभूतानि हि कर्माणि संस्कारद्वारेण ज्ञानस्य । ज्ञानेन त्वमृतत्वप्राप्तिः, “अमृतत्वं हि विन्दते” (के० उ० २।४) “विद्यया विन्दतेऽमृतम्” (के० उ० २।४) इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यश्च । न हि नद्याः पारगो नावं | युक्तिसे भी [कर्म ज्ञानके साक्षात् साधन नहीं हैं।] कर्म तो चित्तशुद्धिके द्वारा ज्ञानके साधन हैं। अमृतत्वकी प्राप्ति तो ज्ञानसे ही होती है जैसा कि “[ज्ञानसे] अमृतत्व ही प्राप्त कर लेता है” “विद्यासे अमृतको पा लेता है” इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंसे प्रमाणित होता है। जो मनुष्य नदीके पार पहुँच गया है वह अपने अभीष्ट
१० केनोपनिषद् [ खण्ड १
१० केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
तत्रैव च पारिव्राज्यविधाने | वहाँ (उस बृहदारण्यकोपनिषद्-
हेतुरुक्तः “किं प्रजया करिष्यामो | में) ही संन्यास ग्रहण करनेमें
येषां नोऽयमात्मायं लोकः” | यह हेतु बतलाया है—"हम प्रजा-
(बृ० उ० ४।४।२२) इति। | को लेकर क्या करेंगे, जिन हमें
तत्रायं हेत्वर्थः-प्रजाकर्मतत्स- | कि यह आत्मलोक ही अभीष्ट
युक्तविद्याभिर्मनुष्यपितृदेवलोक- | है ?" उस हेतुका अभिप्राय
त्रयसाधनैरानात्मलोकप्रतिपत्ति- | इस प्रकार है—'मनुष्यलोक,
कारणैः किं करिष्यामः। न चा- | पितृलोक और देवलोक—इन
स्माकं लोकत्रयमनित्यं साधन- | तीन लोकोंके साधन अनात्म-
साध्यमिष्टम्, येषामस्माकं स्वाभा- | लोकोंकी प्राप्तिके हेतुभूत प्रजा,
कर्म और कर्मसहित ज्ञानसे हमें
क्या करना है; क्योंकि हमलोगोंको
जिन्हें कि, स्वाभाविक, अजन्मा,
वाक्य-भाष्य
न मुञ्चति यथेष्टदेशगमनं प्रति | स्थानपर जानेके लिये स्वतन्त्रता प्राप्त
स्वातन्त्र्ये सति। | होनेपर भी नौकाको न छोड़े—ऐसा
कभी नहीं होता।
न हि स्वभावसिद्धं वस्तु | जो वस्तु स्वतः सिद्ध है उसे कोई
सिषाधयिषति सा- | भी पुरुष साधनोंसे सिद्ध नहीं करना
[आत्मनः] धनैः। स्वभावसिद्ध- | चाहता । आत्मा भी स्वभाव-सिद्ध है;
[अविकार्यत्वादि-] श्चात्मा, तथा न | और इसीलिये वह प्राप्त करनेकी इच्छा
[निरूपणम्] आविषयिषितः, | करने योग्य नहीं है, क्योंकि आत्मस्वरूप
आत्मत्वे सति नित्यप्राप्तत्वात् । | होनेके कारण यह नित्य-प्राप्त ही है।
नापि विविकारयिषितः; आत्मत्वे | इसी प्रकार उसका विकार भी इष्ट
सति नित्यत्वादविकारित्वात् | नहीं है क्योंकि आत्मा होनेके साथ ही
अविषयत्वादमूर्तत्वाच्च । | वह नित्य, अविकारी, अविषय तथा
अमूर्त्त भी है।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११
पद-भाष्य
विकोऽजोऽजरोऽमृतोऽभयो न | अजर, अमर, अभय और जो कर्मसे
घटता-बढ़ता नहीं है वह नित्य-
वर्धते कर्मणा नो कनीयान्नित्यश्च | लोक ही इष्ट है, साधनद्वारा प्राप्त
लोक इष्टः । स च नित्यत्वान्ना- | होनेवाला अनित्य लोकत्रय तो इष्ट
है नहीं । और वह (आत्मलोक)
विद्यानिवृत्तिव्यतिरेकेणान्यसाधन- | तो नित्य होनेके कारण अविद्या-
निवृत्तिके सिवा अन्य किसी भी
निष्पाद्यः । तस्मात्प्रत्यगात्म- | साधनसे प्राप्त होने योग्य है नहीं।
अतः हमको आत्मा और ब्रह्मके
ब्रह्मविज्ञानपूर्वकः सर्वैषणासंन्यास | एकत्वज्ञानपूर्वक सब प्रकारकी
एव कर्तव्य इति । | एषणाओंका त्याग ही करना चाहिये।
वाक्य-भाष्य
श्रुतेश्च “न वर्धते कर्मणा” | इसके सिवा श्रुतिसे “आत्मा कर्मसे
(बृ० उ० ४ । ४ । २३) इत्यादि । | बढ़ता नहीं है” इत्यादि और स्मृतिसे
भी “यह आत्मा अविकार्य कहा
स्मृतेश्च “अविकार्योऽयमुच्यते” | जाता है” इत्यादि कहा गया
(गीता २ । २५) इति । न च | है। “शुद्ध और पापरहित” इत्यादि
सञ्चिकीर्षितः “शुद्धमपाप- | श्रुतियोंसे [ प्रकट होता है कि ]
आत्माका संस्कार करना भी अभीष्ट
विद्धम्” (ई० उ० ८) इत्यादि- | नहीं है । इसके सिवा अपनेसे
अभिन्न होनेके कारण भी वह संस्कार्य
श्रुतिभ्यः; अनन्यत्वाच्च; अन्ये- | नहीं है क्योंकि संस्कार अन्य वस्तुके
नान्यत्संस्क्रियते । न चात्म- | द्वारा अन्यका ही हुआ करता है।
आत्मासे भिन्न कोई क्रिया भी नहीं है;
नोऽन्यभूता क्रिया अस्ति, न च | और स्वयं आत्माके योगसे ही आत्मा-
स्वेनैवात्मना स्वमात्मानं सञ्चि- | के संस्कारकी इच्छा कोई न करेगा ।
कीर्षेत्। न च वस्त्वन्तराधानं | एक वस्तुका दूसरी वस्तुपर आधान
करना अथवा एक वस्तुको दूसरी
नित्यप्राप्तिर्वा वस्त्वन्तरस्य | वस्तुका प्राप्त होना नित्य नहीं हो
१२ केनोपनिषद् [ खण्ड १
१२ केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
कर्मसहभावित्वाविरोधाच्च प्रत्य- | इसके सिवा आत्मा और ब्रह्मके
ज्ञानकर्मविरोध- गात्मब्रह्मविज्ञानस्य । | एकत्वज्ञानका कर्मके साथ-साथ
प्रदर्शनम् | होनेमें विरोध भी है । जिसमें
न ह्युपात्तकारकफल- | [ कर्ता-कर्मादि ] कारक और
भेदविज्ञानेन कर्मणा प्रत्यस्त- | [ स्वर्गादि ] फलका भेद स्वीकार
मितसर्वभेददर्शनस्य प्रत्यगात्म- | किया गया है उस कर्मके साथ
ब्रह्मविषयस्य सहभावित्वम् | सम्पूर्ण भेददृष्टिसे रहित ब्रह्म और
उपपद्यते, वस्तुप्राधान्ये सति | आत्माकी एकताके ज्ञानका रहना
अपुरुषतन्त्रत्वाद्ब्रह्मविज्ञानस्य । | संगत नहीं है, क्योंकि ब्रह्मज्ञान
तस्माद्दृष्टादृष्टेभ्यो बाह्यसाधन- | तो वस्तुप्रधान होनेके कारण पुरुष
साध्येभ्यो विरक्तस्य प्रत्यगात्म- | ( कर्ता ) के अधीन नहीं है ।
विषया ब्रह्मजिज्ञासेयम् 'केनेषि- | अतः इस 'केनेषितम्' इत्यादि
तम्' इत्यादिश्रुत्या प्रदर्श्यते । | श्रुतिके द्वारा यह दृष्ट और अदृष्ट
शिष्याचार्यप्रश्नप्रतिवचनरूपेण | बाह्यसाधन एवं साध्योंसे विरक्त
कथनं तु सूक्ष्मवस्तुविषयत्वात् | हुए पुरुषकी ही प्रत्यगात्मविषयक
सुखप्रतिपत्तिकारणं भवति । | ब्रह्मजिज्ञासा दिखलायी जाती है ।
केवलतर्कागम्यत्वं च दर्शितं | शिष्य और आचार्यके प्रश्नोत्तररूपसे
भवति । | यह कथन वस्तुका सुगमतासे ज्ञान
| करानेमें कारण है क्योंकि यह
| विषय सूक्ष्म है । इसके सिवा
| केवल तर्कद्वारा इसकी अगम्यता
| भी दिखलायी गयी है ।
वाक्य-भाष्य
नित्या । नित्यत्वं चेष्टं मोक्षस्य । | सकती; और मोक्षकी नित्यता ही इष्ट
अत उत्पन्नविद्यस्य कर्मारम्भो- | है। इसलिये जिसे आत्मज्ञान हो गया है
ऽनुपपन्नः, अतो व्यावृत्तबाह्यबुद्धेः | उसके लिये कर्मका आरम्भ नहीं बन
आत्मविज्ञानाय केनेषितमित्या- | सकता। अतः जिसकी बाह्य-बुद्धि निवृत्त
द्यारम्भः । | हो गयी है उसे आत्मतत्त्वका ज्ञान
| करानेके लिये 'केनेषितम्' इत्यादि
| उपनिषद् आरम्भ की जाती है ।
१. अर्थात् आत्मापर परमानन्दत्व आदि गुणोंका आधान या उसका ब्रह्माण्ड-
बाह्य ब्रह्मको प्राप्त होना नित्य नहीं हो सकता ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३
पद-भाष्य
"नैषा तर्केण मतिरापनेया" | "यह बुद्धि तर्कद्वारा प्राप्त होने
(क० उ० १।२।९) | योग्य नहीं है" इस श्रुतिसे भी यही
गुरुपसत्तिः इतिश्रुतेश्च। "आचार्य- | बात सिद्ध होती है। अतः "आचार्य-
वान्पुरुषो वेद" (छा० उ० ६। | वान् पुरुष [ब्रह्मको] जानता है"
१४।२) "आचार्याद्धैव विद्या | "आचार्यसे प्राप्त हुई विद्या ही
विदिता साधिष्ठं प्रापदिति" | उत्कृष्टताको प्राप्त होती है" "उसे
साष्टाङ्ग प्रणामके द्वारा जानो"
(छा०उ०४।९।३) "तद्विद्धि | इत्यादि श्रुति-स्मृतिके नियमानुसार
प्रणिपातेन" (गीता ४।३४) | किसी शिष्यने प्रत्यगात्मविषयक
ज्ञानके सिवा कोई और शरण
इत्यादिश्रुतिस्मृतिनियमाच्च कश्चि- | (आश्रय) न देखकर उस निर्भय,
द्गुरुं ब्रह्मनिष्ठं विधिवदुपety | नित्य, कल्याणमय अचल पदकी
प्रत्यगात्मविषयादन्यत्र शरणम् | इच्छा करते हुए किसी ब्रह्मनिष्ठ
गुरुके पास विधिपूर्वक जाकर
अपश्यन्नभयं नित्यं शिवमचलम् | पूछा—यही बात [आगेकी श्रुतिसे]
इच्छन्प्रपच्छेति कल्प्यते- | कल्पना की जाती है-
वाक्य-भाष्य
प्रवृत्तिलिङ्गाद्विशेषार्थः प्रश्न | [मन आदि अचेतन पदार्थोंकी]
उपपन्नः। रथादीनां हि चेतना- | प्रवृत्तिरूप लिङ्गसे [उनकी प्रेरणा
करनेवाले] किसी विशेष तत्त्वके
वदधिष्ठितानां प्रवृत्तिर्दृष्टा न | विषयमें प्रश्न करना ठीक ही है, क्योंकि
रथ आदि [अचेतन पदार्थों] की
अनधिष्ठितानाम्। मन आदीनां | प्रवृत्ति भी चेतन प्राणियोंसे अधिष्ठित
च अचेतनानां प्रवृत्तिर्दृश्यते। | होकर ही देखी है, उनसे अधिष्ठित
हुए बिना नहीं देखी। मन आदि
तद्धि लिङ्गं चेतनावतोऽधिष्ठातुः | अचेतन पदार्थोंकी भी प्रवृत्ति देखी
ही जाती है। यही उनके चेतन
अस्तित्वे। करणानि हि मन | अधिष्ठाताके अस्तित्वका अनुमापक
आदीनि नियमेन प्रवर्तन्ते। | लिङ्ग है। मन आदि इन्द्रियाँ नियमसे
१४ केनोपनिषद् [ खण्ड १
१४ केनोपनिषद् [ खण्ड १
प्रेरकविषयक प्रश्न
ॐ केनेषितं पतति प्रेषितं मनः । केन प्राणः प्रथमः
प्रैति युक्तः । केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क
उ देवो युनक्ति ॥ १ ॥
यह मन किसके द्वारा इच्छित और प्रेरित होकर अपने विषयोंमें
गिरता है ? किससे प्रयुक्त होकर प्रथम ( प्रधान ) प्राण चलता है ?
प्राणी किसके द्वारा इच्छा की हुई यह वाणी बोलते हैं ? और कौन देव
चक्षु तथा श्रोत्रको प्रेरित करता है ? ॥ १ ॥
पद-भाष्य
केन इषितं केन कर्त्रा इषितम् | केन इषितम्—किस कर्ताके
| द्वारा इच्छित अर्थात् अभिप्रेत हुआ
इष्टमभिप्रेतं सत् मनः पतति | मन अपने विषयकी ओर जाता
वाक्य-भाष्य
तन्नासति चेतनावत्यधिष्ठातरि | प्रवृत्त हो रही हैं उनकी प्रवृत्ति बिना
| किसी चेतन अधिष्ठाताके बन नहीं
उपपद्यते । तद्विशेषस्य चानधि- | सकती । इस प्रकार सामान्य चेतनका
गमाच्चेतनावत्सामान्ये चाधिगते | ज्ञान होनेपर भी उसके विशेष रूपका
| ज्ञान न होनेके कारण यह विशेष-विषयक
विशेषार्थः प्रश्न उपपद्यते । | प्रश्न उचित ही है ।
केनेषितम् केनेष्टं कस्येच्छा- | केन इषितम्—किससे इच्छा किया
| हुआ अर्थात् किसकी इच्छामात्रसे मन
मात्रेण मनः पतति गच्छति | अपने विषयोंकी ओर गिरता अर्थात्
| जाता है ? यानी वह किसकी इच्छासे
स्वविषये नियमेन व्याप्रियत | अपने विषयमें नियमानुसार व्यापार
इत्यर्थः । मनुतेऽनेनेति विज्ञान- | करता है ? जिससे मनन करते हैं वह
निमित्तमन्तःकरणं मनः प्रेषितम् | विज्ञाननिमित्तक अन्तःकरण मन है ।
| यहाँ 'किसके द्वारा प्रेषित हुआ-सा'—
इवेत्युपमार्थः । न त्विषित- | ऐसा उपमापरक अर्थ लेना चाहिये ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५
पद-भाष्य
गच्छति स्वविषयं प्रतीति सम्बध्यते | है—यहाँ 'पतति' क्रियाके साथ
| 'स्वविषयं प्रति' का सम्बन्ध
इषेराभीक्ष्ण्यार्थस्य गत्यर्थस्य चेहा- | (अन्वय) है । यहाँ आभीक्ष्ण्य
| और गत्यर्थक * 'इष्' धातु सम्भव
सम्भवादिच्छार्थस्यैवैतद्रूपमिति | न होनेके कारण यह इच्छार्थक
| 'इष्' धातुका ही [ इषितम् ] रूप
गम्यते । इषितमिति इट्प्रयोग- | है—ऐसा जाना जाता है। [ 'इष्टम्'
| के स्थानमें 'इषितम्' ] यह इट्-प्रयोग
स्तुच्छान्दसः । तस्यैव प्रपूर्वस्य | छान्दस (वैदिक)† है। उस प्र-पूर्वक
| 'इष् धातुका ही प्रेरणा अर्थमें
नियोगार्थे प्रेषितमित्येतत् । | 'प्रेषितम्' रूप हुआ है । यदि
तत्र प्रेषितमित्येवोक्ते प्रेषयितृ- | यहाँ केवल 'प्रेषितम्' इतना ही
| कहा होता तो प्रेषण करनेवाले
प्रेषणविशेषविषयाकाङ्क्षा स्यात्— | और उसके प्रेषण-प्रकारके
| सम्बन्धमें ऐसी शङ्का हो सकती थी
केन प्रेषयितृविशेषेण, कीदृशं | कि किस प्रेषकविशेषके द्वारा और
वा प्रेषणमिति । इषितमिति तु | किस प्रकार प्रेषण किया हुआ ?
| अतः यहाँ 'इषितम्' इस विशेषणके
विशेषणे सति तदुभयं निवर्तते, | रहनेसे ये दोनों शङ्काएँ निवृत्त हो
| जाती हैं, क्योंकि 'इससे किसीकी
कस्येच्छामात्रेण प्रेषितमित्यर्थ- | इच्छामात्रसे प्रेषित हुआ' यह विशेष
| अर्थ हो जाता है ।
विशेषनिर्धारणात् । |
वाक्य-भाष्य
प्रेषितशब्दयोरर्थाविह सम्भवतः। | 'इषित' और 'प्रेषित' शब्दोंके मुख्य
| अर्थ यहाँके लिये सम्भव नहीं हैं,
न हि शिष्यानिव मन आदीनि | क्योंकि आत्मा मन आदिको विषयोंकी
- इष् धातुके अर्थ आभांक्ष्ण्य ( बारम्बार होना ) गति और इच्छा हैं ।
† व्याकरणका यह सिद्धान्त है कि 'छन्दसि दृष्टानुविधिः' वेदमें जो प्रयोग जैसे
देखे गये हैं वहाँके लिये उनका वैसा ही विधान माना गया है ।
१६ केनोपनिषद् [ खण्ड १
१६ केनोपनिषद् [ खण्ड १
❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧
पद-भाष्य
मन्त्रार्थ-मीमांसा
(संस्कृत)
यद्येषोऽर्थोऽभिप्रेतः स्यात्, केनेषितमित्येतावत्तैव सिद्धत्वात्प्रेषितमिति न वक्तव्यम् । अपि च शब्दाधिक्यादर्थाधिक्यं युक्तमिति इच्छया कर्मणा वाचा वा केन प्रेषितमित्यर्थविशेषोऽवगन्तुं युक्तः ।
न, प्रश्नसामर्थ्यात्; देहादिसंघातादनित्यात्कर्मकार्याद्विरक्तः
(हिन्दी)
शङ्का—यदि यही अर्थ अभिमत था तो 'केनेषितम्' इतनेहीसे सिद्ध हो सकनेके कारण 'प्रेषितम्' ऐसा और नहीं कहना चाहिये था। इसके अतिरिक्त शब्दोंकी अधिकतासे अर्थकी अधिकता होनी उचित है इसलिये 'इच्छा' कर्म अथवा वाणी इनमेंसे किसके द्वारा प्रेषित, इस प्रकार प्रेषकविशेषका ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक होगा ।
समाधान—नहीं, प्रश्नकी सामर्थ्यसे यह बात प्रतीत नहीं होती; क्योंकि इससे यह निश्चय होता है कि जो पुरुष देहादि सङ्घातरूप अनित्य कर्म और कार्यसे विरक्त हो गया है
वाक्य-भाष्य
(संस्कृत)
विषयेभ्यः प्रेषयत्यात्मा । विविक्त-नित्यचित्स्वरूपतया तु निमित्तमात्रं प्रवृत्तौ नित्यचिकित्साधिष्ठातृवत् ।
(हिन्दी)
ओर इस प्रकार नहीं भेजता जैसे गुरु शिष्योंको । यह तो सबसे विलक्षण और नित्य चित्स्वरूप होनेके कारण नित्य चिकित्साके अधिष्ठाता [ चकोर पक्षी ] के समान उनकी प्रवृत्तिमें केवल निमित्तमात्र है ।
१. राजा लोग जब भोजन करते हैं तो उसमें विष मिला हुआ तो नहीं है इसकी परीक्षाके लिये उसे चकोरके सामने रख देते हैं । विषमिश्रित अन्नको देखकर चकोरकी आँखोंका रंग बदल जाता है । इस प्रकार चकोरकी केवल सन्निधिमात्रसे ही राजाकी भोजनमें प्रवृत्ति हो जाती है । इसके लिये उसे और कुछ नहीं करना पड़ता ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७
❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦
पद-भाष्य
अतोऽन्यत्कूटस्थं नित्यं वस्तु | और इनसे पृथक् कूटस्थ नित्य
बुभुत्समानः पृच्छतीति साम- | वस्तुको जाननेकी इच्छा करनेवाला
र्थ्यादुपपद्यते । इतरथा इच्छावा- | है वही यह बात पूछ रहा है ।
क्कर्मभिर्देहादिसंघातस्य प्रेरयितृत्वं | अन्यथा इच्छा, वाक् और कर्मके
द्वारा तो इस देहादि सङ्घातका
प्रेरकत्व प्रसिद्ध ही है [ अर्थात्
इच्छा, वाणी और कर्मके द्वारा यह
प्रसिद्धमिति प्रश्नोऽनर्थक एव
देहादि सङ्घात मनको प्रेरित
किया करता है—इस बातको तो
सभी जानते हैं ] । अतः यह प्रश्न
स्यात् । | निरर्थक ही हो जाता ।
एवमपि प्रेषितशब्दस्यार्थो न | शङ्का—किन्तु इस प्रकार भी
प्रदर्शित एव । | ‘प्रेषित’ शब्दका अर्थ तो प्रदर्शित
हुआ ही नहीं ।
न; संशयवतोऽयं प्रश्न इति | समाधान—नहीं, यह प्रश्न
किसी संशयालुका है इसीसे
प्रेषितशब्दस्यार्थविशेष उपपद्यते । | ‘प्रेषित’ शब्दका अर्थविशेष
उपपन्न हो सकता है [अर्थात्
किं यथाप्रसिद्धमेव कार्यकारण- | जिसे ऐसा सन्देह है कि ] यह
संघातस्य प्रेषयितृत्वम्, किं वा | प्रेरक-भाव सर्वप्रसिद्ध भूत और
इन्द्रियोंके संघातरूप देहमें है,
संघातव्यतिरिक्तस्य स्वतन्त्रस्य | अथवा उस सङ्घातसे भिन्न किसी
स्वतन्त्र वस्तुमें ही केवल इच्छामात्रसे
इच्छामात्रेणैव मनआदिप्रेषयितृ- | मन आदिकी प्रेरकता है ? इस
वाक्य-भाष्य
प्राण इति नासिकाभवः, | यहाँ प्रकरणवश ‘प्राण’ शब्दसे
नासिकामें रहनेवाला वायु समझना
प्रकरणातू । प्रथमत्वं प्रचलन- | चाहिये । चलन-क्रिया प्राण-निमित्तक
क्रियायाः प्राणनिमित्तत्वात्स्वतो | होनेसे प्राणको प्रधान माना गया है ।
१८ केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
त्वम्, इत्यस्यार्थस्य प्रदर्शनार्थं | प्रकार इस अभिप्रायको प्रदर्शित
| करनेके लिये ही 'किसके द्वारा
केनेषितं पतति प्रेषितं मन इति | इच्छित और प्रेषित किया हुआ मन
| [अपने विषयकी ओर] जाता है' ऐसे
विशेषणद्वयमुपपद्यते । | दो विशेषण ठीक हो सकते हैं ।
ननु स्वतन्त्रं मनः स्वविषये | यदि कहो कि यह बात तो
| प्रसिद्ध ही है कि मन स्वतन्त्र है
मनःप्रभृतीनां स्वयं पततीति प्रसि- | और वह स्वयं ही अपने विषयोंकी
पारतन्त्र्य- द्धम्; तत्र कथं प्रश्न | ओर जाता है; फिर उसके विषयमें
प्रदर्शनम् उपपद्यत इति, उच्यते— | यह प्रश्न कैसे बन सकता है ?
| तो इसके उत्तरमें हमारा कहना है
यदि स्वतन्त्रं मनः प्रवृत्ति- | कि यदि मन प्रवृत्ति-निवृत्तिमें
| स्वतन्त्र होता तो सभीको अनिष्ट-
निवृत्तिविषये स्यात्, तर्हि सर्वस्य | चिन्तन होना ही नहीं चाहिये था ।
अनिष्टचिन्तनं न स्यात् । अनर्थं | किन्तु मन जान-बूझकर भी अनर्थ-
च जानन्सङ्कल्पयति । अभ्यग्र- | चिन्तन करता है और रोके
वाक्य-भाष्य
विषयावभासमात्रं करणानां | इन्द्रियोंकी स्वतः प्रवृत्ति तो केवल
| विषयोंका प्रकाशनमात्र ही है । मन
प्रवृत्तिः । चलिक्रिया तु प्राण- | आदिमें चलन-क्रिया तो प्राण-
स्यैव मनआदिषु । तस्मात्प्राथम्यं | हीकी है; इसीलिये प्राणकी प्रधानता
प्राणस्य । प्रैति गच्छति युक्तः | है । वह प्राण किससे युक्त अर्थात्
| प्रेरित होकर गमन करता यानी
प्रयुक्त इत्येतत् । वाचो वदनं किं | चलता है । वाणीका भाषण भी किस
निमित्तं प्राणिनां चक्षुःश्रोत्रयोश्च | निमित्तसे होता है ? प्राणियोंके नेत्र
| और श्रोत्रोंको प्रेरित करनेवाला कौन
को देवः प्रयोक्ता । करणानाम् | देव है ? अर्थात् जो चेतन तत्त्व
अधिष्ठाता चेतनावान्यः स किं- | इन्द्रियोंका अधिष्ठाता है वह किन
विशेषण इत्यर्थः ॥ १ ॥ | विशेषणोंसे युक्त है ? ॥ १ ॥
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९
पद-भाष्य
दुःखे च कार्ये वार्यमाणमपि प्रव- | जानेपर भी अत्यन्त दुःखमय
र्तत एव मनः। तस्माद्युक्त एव | कार्यमें भी प्रवृत्त हो ही जाता है।
केनेषितमित्यादिप्रश्नः। | अतः 'केनेषितम्' इत्यादि प्रश्न
उचित ही है।
केन प्राणः युक्तः नियुक्तः | किसके द्वारा नियुक्त यानी
प्रेरितः सन् प्रैति गच्छति स्व- | प्रेरित हुआ प्राण अपने व्यापारमें
व्यापारं प्रति । प्रथम इति प्राण- | प्रवृत्त होता है? 'प्रथम' यह प्राणका
विशेषणं स्यात्, तत्पूर्वकत्वात् | विशेषण हो सकता है, क्योंकि
सर्वेन्द्रियप्रवृत्तीनाम् । | समस्त इन्द्रियोंकी प्रवृत्तियाँ प्राण-
पूर्वक ही होती हैं।
केन इषितां वाचम् इमां | लौकिक पुरुष किसके द्वारा
शब्दलक्षणां वदन्ति लौकिकाः। | इच्छित यह शब्दरूपा वाणी बोलते
तथा चक्षुः श्रोत्रं च स्वे स्वे | हैं? तथा कौन देव—द्योतनवान्
विषये क उ देवः द्योतनवान् | (प्रकाशमान) व्यक्ति चक्षु एवं
युनक्ति नियुङ्क्ते प्रेरयति ॥१॥ | श्रोत्रेन्द्रियको अपने-अपने व्यापारमें
नियुक्त-प्रेरित करता है-॥१॥
पद-भाष्य
एवं पृष्टवते योग्यायाह गुरुः। | इस प्रकार पूछनेवाले योग्य
शिष्यसे गुरुने कहा—तू जो
शृणु यत् त्वं पृच्छसि, मनआदि- | पूछता है कि मन आदि इन्द्रिय-
समूहको अपने विषयोंकी ओर
करणजातस्य को देवः स्वविषयं | प्रेरित करनेवाला कौन देव है और
वह उन्हें किस प्रकार प्रेरित करता
प्रति प्रेरयिता कथं वा प्रेरयतीति। | है, सो सुन—
२० केनोपनिषद् खण्ड १
२० केनोपनिषद् खण्ड १
❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦
आत्माका सर्वनियन्तृत्व
श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो ह वाचं स उ
प्राणस्य प्राणश्चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्मा-
ल्लोकादमृता भवन्ति ॥ २ ॥
जो श्रोत्रका श्रोत्र, मनका मन और वाणीका भी वाणी है वही
प्राणका प्राण और चक्षुका चक्षु है [-ऐसा जानकर] धीर पुरुष संसारसे
मुक्त होकर इस लोकसे जाकर अमर हो जाते हैं ॥ २ ॥
पद-भाष्य
श्रोत्रस्य श्रोत्रं शृणोत्यनेनेति | श्रोत्रस्य श्रोत्रम्—जिससे श्रवण
श्रोत्रम्, शब्दस्य श्रवणं प्रति | करते हैं वह 'श्रोत्र' है अर्थात्
करणं शब्दाभिव्यञ्जकं श्रोत्र- | शब्दके श्रवणमें साधन यानी
मिन्द्रियम्, तस्य श्रोत्रं सः | शब्दका अभिव्यञ्जक श्रोत्रेन्द्रिय है।
यस्त्वया पृष्टः 'चक्षुः श्रोत्रं क | उसका भी श्रोत्र वह है जिसके
उ देवो युनक्ति' इति । | विषयमें तूने पूछा है कि 'चक्षु और श्रोत्रको कौन देव नियुक्त करता है?'
वाक्य-भाष्य
श्रोत्रस्य श्रोत्रम् इत्यादिप्रति- | 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' इत्यादि उत्तर
वचनं निर्विशेषस्य निमित्तत्वार्थम्। | देना निर्विशेष आत्माका निमित्तत्व बतलानेके लिये है । इस 'श्रोत्रस्य
विक्रियादिविशेषरहितस्यात्मनो | श्रोत्रम्' इत्यादि रूपसे उत्तर देनेका
मनआदिप्रवृत्तौ निमित्तत्वम् | यही तात्पर्य है कि विक्रिया आदि समस्त
इत्येतच्छ्रोत्रस्य श्रोत्रमित्यादिप्रति- | विशेषोंसे रहित आत्माका मन आदि-
वचनस्यार्थः; अनुगमात् । तदनु- | की प्रवृत्तिमें कारणत्व है१ यही इससे जाना जाता है, क्योंकि इस श्रुतिके अक्षर
गतानि ह्यत्रास्मिन्नर्थेऽक्षराणि। | भी इसी अर्थमें अनुगत हैं।
१—अर्थात् वह सर्वथा निर्विकार और निर्विशेष होनेपर भी मन आदिको प्रेरित करनेवाला है ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१
पद-भाष्य
असावेवंविशिष्टः श्रोत्रादीनि | शङ्का—प्रश्नके उत्तरमें तो यह
नियुङ्क्त इति वक्तव्ये, नन्वेत- | बतलाना चाहिये था कि इस
दननुरूपं प्रतिवचनं श्रोत्रस्य | प्रकारके गुणोंवाला व्यक्ति श्रोत्रादि-
श्रोत्रमिति। | को प्रेरित करता है; उसमें यह
| कहना कि वह श्रोत्रका श्रोत्र है—
| ठीक उत्तर नहीं है।
नैष दोषः, तस्यान्यथाविशेषा- | समाधान—यह कोई दोष नहीं
नवगमात्। यदि हि श्रोत्रादि- | है, क्योंकि उस प्रेरकका और
व्यापारव्यतिरिक्तेन स्वव्यापा- | किसी प्रकार कोई विशेषरूप नहीं
रेण विशिष्टः श्रोत्रादिनियोक्ता | जाना जा सकता। यदि दराँती
अवगम्येत दात्रादिप्रयोक्तृवत्, | आदिका प्रयोग करनेवालेके समान
तदेदमननुरूपं प्रतिवचनं स्यात्। | श्रोत्रादि व्यापारसे अतिरिक्त किसी
न त्विह श्रोत्रादीनां प्रयोक्ता | अपने व्यापारसे विशिष्ट कोई
स्वव्यापारविशिष्टो लवित्रादि- | श्रोत्रादिका नियोक्ता ज्ञात होता तो
वदधिगम्यते। श्रोत्रादीनामेव तु | यह उत्तर अनुचित होता। किन्तु
संहतानां व्यापारेणालोचन- | यहाँ खेत काटनेवालेके समान कोई
सङ्कल्पाध्यवसायलक्षणेन फलाव- | श्रोत्रादिका स्वव्यापारविशिष्ट प्रयोक्ता
| ज्ञात नहीं है। अवयव-सहयोगसे
| उत्पन्न हुए श्रोत्रादिका जो चिदा-
| भासकी फलव्याप्तिका लिङ्गरूप
| आलोचना, सङ्कल्प एवं निश्चय
| आदिरूप व्यापार है उसीसे यह
वाक्य-भाष्य
कथम्? शृणोत्यनेनेति श्रोत्रम्; | कैसे ? [सो इस प्रकार कि] जिससे
तस्य शब्दावभासकत्वं श्रोत्रत्वम्। | प्राणी सुनते हैं उसे 'श्रोत्र' कहते हैं।
शब्दोपलब्धिरूपतयावभासकत्वं न | उसका जो शब्दको प्रकाशित करना है
स्वतः, श्रोत्रस्याचिद्रूपत्वात्, | वह 'श्रोत्रत्व' है। श्रोत्रका जो शब्द-
आत्मनश्च चिद्रूपत्वात्। | के उपलब्धिरूपसे प्रकाशकत्व है वह
| स्वतः नहीं है; क्योंकि वह अचेतन
| है और आत्मा चेतनरूप है।
२२ keनोपनिषद् [ खण्ड १
२२ keनोपनिषद् [ खण्ड १
❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦
पद-भाष्य
सानलिङ्गेनावगम्यते—अस्ति हि श्रोत्रादिभिरसंहतः, यत्प्रयोजन-प्रयुक्तः श्रोत्रादिकलापः गृहादिवदिति । संहतानां परार्थत्वादवगम्यते श्रोत्रादीनां प्रयोक्ता। तस्मादनुरूपमेवेदं प्रतिवचनं श्रोत्रस्य श्रोत्रमित्यादि ।
जाना जाता है कि गृह आदिके समान जिसके प्रयोजनसे श्रोत्रादि कारण-कलाप प्रवृत्त हो रहा है वह श्रोत्रादिसे असंहत ( पृथक् ) कोई तत्त्व अवश्य है। संहत पदार्थ परार्थ (दूसरेके साधनरूप) हुआ करते हैं; इसीसे कोई श्रोत्रादिका प्रयोक्ता अवश्य है—यह जाना जाता है। अतः यह 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' इत्यादि उत्तर ठीक ही है।
[पार्श्व-टिप्पणी: आत्मनः श्रोत्रादि-प्रकाशकत्वम्]
कः पुनरत्र पदार्थः श्रोत्रस्य श्रोत्रमित्यादेः ? न ह्यत्र श्रोत्रस्य श्रोत्रान्तरेणार्थः, यथा प्रकाशस्य प्रकाशान्तरेण ।
शङ्का—किन्तु इस 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' इत्यादि पदका यहाँ क्या अर्थ अभिप्रेत है ? क्योंकि जिस तरह एक प्रकाशको दूसरे प्रकाशका प्रयोजन नहीं होता उसी तरह एक श्रोत्रको दूसरे श्रोत्रसे तो कोई प्रयोजन है ही नहीं।
वाक्य-भाष्य
यच्छ्रोत्रस्योपलब्धृत्वेनावभासकत्वं तदात्मनिमित्तत्वाच्छ्रोत्रस्य श्रोत्रमित्युच्यते; यथा क्षत्रस्य क्षत्रं यथा चोदकस्यौष्ण्यमग्निनिमित्तमिति दग्धुरप्युदकस्य दग्धाग्निरुच्यते; उदकमपि ह्यग्निसंयोगादग्निरुच्यते, तद्वद्
श्रोत्रका जो उपलब्ध्वारूपसे अवभासकत्व है वह आत्मनिमित्तक होनेसे आत्माको 'श्रोत्रका श्रोत्र' ऐसा कहा जाता है, जैसे क्षत्रिय जातिका [ नियामक कर्म ] क्षत्र कहलाता है; अथवा जैसे [ उष्ण ] जलकी उष्णता अग्निके कारण होती है; इसलिये उस जलानेवाले जलको भी जलानेवाला अग्नि कहा जाता है; और अग्निके संयोगसे जल भी अग्नि कहा जाता है, उसी प्रकार
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३
पद-भाष्य
नैष दोषः। अयमत्र पदार्थः— समाधान—यह भी कोई दोष
श्रोत्रं तावत्स्वविषयव्यञ्जनसमर्थं नहीं है। यहाँ इस पदका अर्थ
दृष्टम् । तत्तु स्वविषयव्यञ्जन- इस प्रकार है—श्रोत्र अपने विषय-
सामर्थ्यं श्रोत्रस्य चैतन्ये ह्यात्म- को अभिव्यक्त करनेमें समर्थ है—
ज्योतिषि नित्येऽसंहते सर्वान्तरे यह देखा ही जाता है। किन्तु
सति भवति, न असति इति । श्रोत्रका वह अपने विषयको अभि-
अतः श्रोत्रस्य श्रोत्रमित्याद्युप- व्यक्त करनेका सामर्थ्य नित्य,
पद्यते । तथा च श्रुत्यन्तराणि— असंहत, सर्वान्तर चेतन आत्म-
“आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते” ज्योतिके रहनेपर ही रह सकता है, न
(बृ० उ० ४।३।६) “तस्य भासा रहनेपर नहीं रह सकता। अतः
सर्वमिदं विभाति” (क० उ० उसे ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ इत्यादि कहना
२।२।१५, श्वे० ६।१४, उचित ही है। “यह अपने ही
मु० २।२।१०) “येन सूर्यस्त- प्रकाशसे प्रकाशित है” “उसके
पति तेजसेद्धः” (तै० ब्रा० ३। प्रकाशसे ही यह सब प्रकाशित
१२।९।७) इत्यादीनि । होता है” “जिस तेजसे प्रदीप्त हुआ
सूर्य तपता है” इत्यादि श्रुतियाँ भी
इसी अर्थकी द्योतक हैं। तथा
वाक्य-भाष्य
अनित्यं यत्संयोगादुपलब्धृत्वं आत्मामें ] जिनके संयोगसे अनित्य
उपलब्धृत्व है वे श्रोत्रादि करण कहलाते
तत्करणं श्रोत्रादि । उदकस्येव हैं। जलके दाहकत्वके समान आत्मामें
दग्धृत्वमनित्यं हि तत्र तत्। उपलब्धृत्व अनित्य ही है। जैसे
अग्निमें नित्य उष्णता रहनेके कारण
यत्र तु नित्यमुपलब्धृत्वमग्ना- वह दग्धा कहलाता है उसी प्रकार
विवौष्ण्यं स नित्योपलब्धिस्वरूप- जिसमें नित्य-उपलब्धृत्व रहता है वह
नित्य उपलब्धिस्वरूप होनेके कारण उप-
त्वादग्ध्नेवोपलब्धोच्यते । श्रोत्रा- लब्धा कहा जाता है। श्रोत्रादि निमित्तोंके
होनेपर जो आत्मामें श्रोतृत्ववादिकी उप-
दिषु श्रोतृत्वानुपलब्धिरनित्या लब्धि होती है वह अनित्य है और केवल
नित्या चात्मन्यतः श्रोत्रस्य आत्मामें वह नित्य है, अतः 'श्रोत्रस्य