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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

८० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [दूसरा अधिकरण

८० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [दूसरा अधिकरण

(१) बालद्रव्यं ग्रामवृद्धा वर्धयेयुराव्यवहारप्रापणात्; देवद्रव्यं च ।
(२) अपत्यदारान् मातापितरौ भ्रातॄनप्राप्तव्यवहारान्भगिनीः कन्या विधवाश्चाबिभ्रतः शक्तिमतो द्वादशपणो दण्डोऽन्यत्र पतितेभ्यः; अन्यत्र मातुः ।
(३) पुत्रदारमप्रतिविधाय प्रव्रजतः पूर्वः साहसदण्डः; स्त्रियं च प्रव्राजयतः । लुप्तव्यवायः प्रव्रजेदापृच्छय धर्मस्थान्, अन्यथा नियम्येत ।
(४) वानप्रस्थादन्यः प्रव्रजितभावः, सजातादन्यः सङ्घः, सामुत्थायकादन्यः समयानुबन्धो वा नास्य जनपदमपिनिविशेत ।
(५) न च तत्रारामा विहारार्थाः शालाः स्युः । नटनर्तनगायन-


वह बालक, वृद्ध, व्याधिग्रस्त, विपत्तिपीड़ित और अनाथ व्यक्तियों का भरण-पोषण करे । संतानहीन ( बन्ध्या ) और पुत्रवती अनाथ स्त्रियों तथा उनके बच्चों की भी राजा रक्षा करे ।

(१) नाबालिग बच्चे की सम्पत्ति पर गाँव के वृद्ध पुरुषों का अधिकार रहे । उसको वे बढ़ाते रहें और बालिग हो जाने पर उसकी सम्पत्ति को उसे वापिस कर दें । इसी प्रकार देव-सम्पत्ति पर भी ग्राम-वृद्धों का ही अधिकार हो, जो कि उसकी वृद्धि में तत्पर रहें ।

(२) जब कोई पुरुष समर्थ होने पर भी, अपने लड़के-बच्चों, स्त्रियों, माता-पिता, नाबालिग भाई, अविवाहित तथा विधवा बहिन आदि का भरण-पोषण न करे तो राजा उसे बारह पणों (सोने का सिक्का) का दंड दे । किन्तु ये लड़के, स्त्री आदि यदि किसी कारण से पतित हो गए हों तो सम्बन्धी उनका भरण-पोषण करने के लिए बाध्य नहीं हैं । यह निषेध माता के सम्बन्ध में नहीं, माता यदि पतिता भी हो गई हो तो उसका भरण-पोषण और उसकी रक्षा करनी चाहिए ।

(३) पुत्र तथा स्त्री के जीवन-निर्वाह का उचित प्रबन्ध किये बिना ही यदि कोई पुरुष, संन्यास ग्रहण कर ले तो राजा को उसे प्रथम साहस दंड देना चाहिए । यही दंड उस पुरुष को भी दिया जाना चाहिए जो अपनी स्त्री को संन्यासिनी हो जाने को प्रेरित करे । जब मनुष्य के मैथुन-सम्बन्धी कामविकार शांत हो जांय तब उसे धर्माधिकारी पुरुषों की अनुमति लेकर संन्यास आश्रम में प्रवेश करना चाहिए, इस राज्य-नियम का उल्लङ्घन करने वाले व्यक्ति को कारागार में बंद कर दिया जाय ।

(४) वानप्रस्थ के अतिरिक्त कोई दूसरा संन्यासी जनपद में न रहना चाहिए, इसी प्रकार राजभक्त जनसंघ के अतिरिक्त तथा स्थानीय सहकारी संस्थाओं के अतिरिक्त कोई दूसरी संस्था या दूसरा संघ राज्य में न पनपने पावे, जो द्रोह या फूट फैलाने वाला सिद्ध हो ।

(५) गाँवों में कोई भी नाट्यगृह, विहार तथा क्रीडा-शालाएँ नहीं होनी

प्र० १७ : अ० १ ] जनपदों की स्थापना ८१

वादकवाग्जीवनकुशीलवा वा न कर्मविघ्नं कुर्युः। निराश्रयत्वाद् ग्रामाणां क्षेत्राभिरतत्वाच्च पुरुषाणां कोशविष्टद्रव्यधान्यरसवृद्धिर्भवतीति ।

(१) परचक्राटवीग्रस्तं व्याधिदुर्भिक्षपीडितम् ।
देशं परिहरेद्राजा व्ययक्रीडाश्च वारयेत् ॥
(२) दण्डविष्टिकराबाधैः रक्षेदुपहतां कृषिम् ।
स्तेनव्यालविषग्राहैर्व्याधिभिश्च पशुव्रजान् ॥
(३) वल्लभैः कार्मिकैः स्तेनैरन्तपालैश्च पीडितम् ।
शोधयेत्पशुसङ्घैश्च क्षीयमाणं वणिक्पथम् ॥
(४) एवं द्रव्यद्विपवनं सेतुबन्धमथाकरान् ।
रक्षेत्पूर्वकृतान्राजा नवांश्चाभिप्रवर्तयेत् ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे जनपदनिवेशः प्रथमोऽध्यायः;
आदितः एकविंशः ॥

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चाहिए। नट, नर्तक, गायक, वादक, भाण और कुशीलव आदि गाँवों में अपना खेल दिखा कर कृषि आदि कार्यों में विघ्न उत्पन्न न करें। क्योंकि गाँवों में नाट्यशालाएँ आदि न होने से ग्रामवासी अपने-अपने कृषिकर्म में संलग्न रहते हैं, जिससे कि राज-कोष की अभिवृद्धि होती है और सारा देश धन-धान्य से समृद्ध होता है ।

( १ ) राजा को चाहिए कि वह शत्रुओं, जंगली लोगों, व्याधियों एवं दुर्भिक्षों से अपने देश को बचावे। वह उन क्रीडाओं का भी बहिष्कार कराये जो धन का अप-व्यय और विलासप्रियता को बढ़ाने वाली हों ।

( २ ) राजा को चाहिए कि दंड, विष्टि ( बेगार ), कर ( टैक्स ) आदि की बाधा से कृषि की रक्षा करे । इसी प्रकार चोर, हिंसक जंतु, विष-प्रयोग तथा अन्य कष्टों से भी किसानों के पशुओं की रक्षा करे ।

( ३ ) वल्लभ ( राजप्रिय ), कार्मिक ( राज-कर वसूल करने वाले ), चोर, अंतपाल ( सीमारक्षक ) और व्याघ्र आदि, राजपुरुषों, लुटरों एवं हिंसक जंतुओं से ग्रस्त व्यापार-मार्गों का भी राजा परिशोधन करे। अर्थात् अपने देश से इन सब आपत्तियों को दूर करे ।

( ४ ) इस प्रकार राजा प्रथम तो लकड़ी के जंगल, हाथियों के जंगल, सेतुबन्ध तथा खानों की रक्षा करे और तदुपरान्त आवश्यकतानुसार नये जंगल, सेतुबंध आदि का निर्माण करवाये।

अध्यक्ष-प्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में प्रथम अध्याय समास ।

—: ० :—

६ कौ०

प्रकरण १८
अध्याय २

भूमिच्छिद्र-विधानम्

(१) अकृष्यायां भूमौ पशुभ्यो विवीतानि प्रयच्छेत् । प्रदिष्टाभयस्थावरजङ्गमानि च ब्राह्मणेभ्यो ब्रह्मसोमारण्यानि, तपोवनानि च तपस्विभ्यो गोरुतपराणि प्रयच्छेत् । तावन्मात्रमेकद्वारं खातगुप्तं स्वादुफलगुल्मगुच्छमकण्टकिद्रुममुत्तानतोयाशयं दान्तमृगचतुष्पदं भग्ननखदंष्ट्रव्यालं मार्गायुकहस्तिहस्तिनीकलभं मृगवनं विहारार्थं राज्ञः कारयेत् ।
(२) सर्वातिथिभृगं प्रत्यन्ते चान्यन्मृगवनं भूमिवशेन वा निवेशयेत् ।
(३) कुप्यप्रदिष्टानां च द्रव्याणामेकैकशो वा वनं निवेशयेत्; द्रव्यवनकर्मान्तानटवीश्च द्रव्यवनापाश्रयाः ।
(४) प्रत्यन्ते हस्तिवनमटव्यारक्ष्यं निवेशयेत् । नागवनाध्यक्षः पार्वतं


ऊसर भूमि को उपयोगी बनाने का विधान

(१) ऊसर भूमि में पशुओं के लिए चरागाहें बनवानी चाहिए। जिस भूमि को वृक्ष-लता एवं मृग आदि के लिए छोड़ दिया गया हो, ऐसे दो कोस तक फैल हुए जंगल को वेदाध्यायी ब्राह्मणों को वेदाध्ययन एवं सोमयाग के लिए दे देना चाहिए; इसी प्रकार के तपोवनों को तपस्वियों के लिए दे देना चाहिए । ऐसे ही दो कोस परिमाण के मृगवन को राजा अपने विहार के लिए तैयार कराये । उस विहारवन के दो दरवाजे हों, उसके चारों ओर खुदी हुई खाई हो, उसमें स्वादिष्ट फल, लता, गुल्म एवं वृक्ष हों, वह काँटेदार पेड़ों से रहित हो, उसमें कम गहरे सरोवर हों, मनुष्यों से परिचित मृग हो, मृगया के लिए वहाँ ऐसे व्याघ्र, हाथी, हथिनौ तथा उनके बच्चे रखे गये हों, जिनके नख एवं दाँत न हों ।

(२) उसके ही समीप एक दूसरा मृगवन ऐसा तैयार कराया जाय, जिसमें देश-देशांतरों के जानवर लाकर रखे गये हों ।

(३) कुप्याध्यक्ष प्रकरण में निर्दिष्ट चंदन, पलाश, अशोक आदि लकड़ी के लिए अलग-अलग वन बसाये जाँय । लकड़ी के जंगलों की सम्पूर्ण व्यवस्था, जंगलों के अध्यक्ष तथा जंगलों पर जीवन बिताने वाले पुरुष करें ।

(४) जनपद की सीमा पर जंगल के अध्यक्षों के संरक्षण में एक हस्तिवन भी स्थापित करना चाहिए । हस्तिवन के अध्यक्षों को आवश्यक है कि वे स्वयं तथा

प्र० १८ : अ० २ ] भूमि को उपयोगी बनाने का विधान ८३

नादेयं सारसमानूपं च नागवनं विदितपर्यन्तप्रवेशनिष्कासनं नागवनपालैः पालयेत् । हस्तिघातिनं हन्युः । दन्तयुगं स्वयं मृतस्याहरतः सपादचतुष्पणो लाभः ।

(१) नागवनपाला हस्तिपकपादपाशिकसैमिकवनचरकपार्किकर्मिक-सखाहस्तिमूत्रपुरीषच्छन्नगन्धा भल्लातकीशाखाप्रतिच्छन्नाः पञ्चभिः सप्त-भिर्वा हस्तिबन्धकीभिः सह चरन्तः शय्यास्थानपद्याण्डकूलपातोद्देशेन हस्तिकुलपर्यग्रं विद्युः ।

(२) यूथचरमेकचरं निर्यूथं यूथपतिं हस्तिनं व्यालं मत्तं पोतं बद्ध-मुक्तं च निबन्धेन विद्युः । अनीकस्थप्रमाणैः प्रशस्तव्याञ्जनाचारान्हस्तिनो गृह्णीयुः । हस्तिप्रधानो हि विजयो राज्ञाम् । परानीकव्यूहदुर्गस्कन्धावार-प्रमर्दना ह्यतिप्रमाणशरीराः प्राणहरकर्माणो हस्तिन इति ।


अपने सहयोगी वनपालों के सहयोग से पर्वत, नदी, जलाशय तथा किसी जलमय स्थान से होकर हस्तिवनों के अंदर जाने वाले मार्गों की भली-भाँति देख-रेख रखे । हाथियों को मारने वाले प्रत्येक व्यक्ति को प्राणदण्ड की सजा मिलनी चाहिए । मृतक हाथी के दाँतों को उखाड़कर जो स्वयं ही राजपुरुषों के सुपुर्द कर दे, उसे सवा चार पण पुरस्कार स्वरूप दिया जाना चाहिए ।

( १ ) हस्तिवन के रक्षकों को चाहिए कि वे हस्तिपक ( महावत ), पादपाशिक ( हाथियों को जाल में फँसाने वाला ), सैमिक ( सीमारक्षक ) वनचरक ( जंगली मनुष्य ) और पारिकर्मिक ( हाथियों की परिचर्या में निपुण ) आदि पुरुषों को साथ लेकर जंगल में हाथियों के समूह का पता लगायें । अपने साथ वे हाथी के मल-मूत्र के गंध के समान किसी वस्तु को, हाथियों को वश में करने वाली पाँच-सात हथिनियों को भी साथ में लेकर और स्वयं को भल्लातकी ( भिलावे ) की शाखा में छिपाये हुए, हाथियों के पड़ाव, उनके पैरों के निशान, उनके मल-मूत्र त्यागने की जगह और उनके द्वारा गिराये गए नदी-कगारों आदि का सुराग लेकर हस्तिसमूहों का पता लगायें ।

( २ ) झुंड के साथ घूमने वाले, अकेले विचरण करने वाले, झुंड से फूटे हुए, झुंडप्रमुख, दुष्टप्रकृति, उन्मत्त, शिशुहस्ति, बंधनमुक्त आदि हाथियों से संबंधित जितने भी विवरण हैं, उनकी जानकारी, हस्तिवनरक्षक अपनी गणनापुस्तक ( स्टाकबुक ) से प्राप्त करें । हस्तिविद्या में निपुण पुरुषों के निर्देशानुसार श्रेष्ठ लक्षणों से युक्त हाथियों को ही पकड़ना चाहिए, क्योंकि हाथी ही राजा की विजय के प्रधान साधन हैं । भारी भरकम हाथी ही शत्रुसेना, उसकी व्यूह-रचना, उसके दुर्ग तथा उसकी छावनियों को कुचलने वाले और उसके प्राणों तक को ले लेने वाले होते हैं ।