कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
९२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
९२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
पूर्वोत्तरं भागमाचार्यपुरोहितेज्यातोयस्थानं मन्त्रिणश्चावसेयुः । पूर्वदक्षिणं भागं महानसं हस्तिशाला कोष्ठागारं च । ततः परं गन्धमाल्यधान्यरस-पण्याः प्रधानकारवः क्षत्रियाश्च पूर्वी दिशमधिवसेयुः । दक्षिणपूर्वं भागं भाण्डागारमक्षपटलं कर्मनिष्ठाश्च । दक्षिणपश्चिमं भागं कुप्यगृहमायुधागारं च । ततः परं नगरधान्यव्यावहारिककार्मान्तिकबलाध्यक्षाः पक्वान्न-सुरामांसपण्याः रूपाजीवास्तालावचरा वैश्याश्च दक्षिणां दिशमधिवसेयुः । पश्चिमदक्षिणं भागं खरोष्ट्रगुप्तिस्थानं कर्मगृहं च । पश्चिमोत्तरं भागं यानरथशालाः । ततः परं ऊर्णासूत्रवेणुचर्मवर्मशस्त्रावरणकारवः शूद्राश्च पश्चिमां दिशमधिवसेयुः । उत्तरपश्चिमं भागं पण्यभैषज्यगृहम्, उत्तरपूर्वं भागं कोशो गवाश्वं च । ततः परं नगरराजदेवतालोहमणिकारवो ब्राह्मणाश्चोत्तरां दिशमधिवसेयुः । वास्तुच्छिद्रानुलासेषु श्रेणीप्रवहणिकनिकाया आवसेयुः ।
उपयोगी हो । गृह-भूमि के बीच से उत्तर की ओर नवें हिस्से में, निशांत-प्रणिधि प्रकरण में निर्दिष्ट नियमों के अनुसार, अंतःपुर का निर्माण कराना चाहिये, जिसका द्वार पूरब या पश्चिम की ओर हो । अन्तःपुर के पूर्वोत्तर भाग में आचार्य, पुरोहित के भवन, यज्ञशाला, जलाशय और मंत्रियों के भवन बनवाये जाँय । अन्तःपुर के पूर्व-दक्षिण भाग में महानस ( रसोईघर ), हस्तिशाला और कोष्ठागार ( भंडार ) हों । उसके आगे पूरब दिशा में इत्र, तेल, पुष्पहार, अन्न, घी, तेल की दुकानें और प्रधान कारीगरों एवं क्षत्रियों के निवासस्थान होने चाहिए । दक्षिण-पूरब में भांडागार, राजकीय पदार्थों के आय-व्यय का स्थान और सोने-चाँदी की दुकानें होनी चाहिए । इसी प्रकार दक्षिण-पश्चिम दिशा में शस्त्रागार तथा सोने-चाँदी के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं को रखने का स्थान होना चाहिये । उससे आगे, दक्षिण दिशा में नगराध्यक्ष, धान्याध्यक्ष, व्यापाराध्यक्ष, खदानों तथा कारखानों के निरीक्षक, सेनाध्यक्ष, भोजनालय, शराब एवं मांस की दुकानें, वेश्या, नट और वैश्य आदि के निवासस्थान होने चाहिए । पश्चिम-दक्षिण भाग में ऊँटों एवं गधों के गुप्ति-स्थान ( तबेले ) तथा उनके व्यापार के लिए एक अस्थायी घर बनवाया जाय । पश्चिम-उत्तर की ओर रथ तथा पालकी आदि सवारियों को रखने के स्थान होने चाहिए । उसके आगे, पश्चिम दिशा में ही ऊन, सूत, बाँस और चमड़े का कार्य करने वाले, हथियार और उनके म्यान बनवाने वाले और शूद्र लोगों को बसाया जाना चाहिए । उत्तर-पश्चिम में राजकीय पदार्थों को बेचने-खरीदने का बाजार और औषधालय होने चाहिए । उत्तर-पूरब में कोषगृह और गाय, बैल तथा घोड़ों के स्थान बनवाने चाहिए । उसके आगे, उत्तर दिशा की ओर नगरदेवता, कुलदेवता, लुहार, मनिहार और ब्राह्मणों के स्थान
प्र० २० : अ० ४ ] दुर्गनिवेश ९३
(१) अपराजिताप्रतिहतजयन्तवैजयन्तकोष्ठकान् शिववैश्रवणाश्विश्री-
मदिरागृहं च पुरमध्ये कारयेत् । कोष्ठकालयेषु यथोद्देशं वास्तुदेवताः
स्थापयेत् । ब्राह्मैन्द्रयाम्यसैनापत्यानि द्वाराणि । बहिः परिखायाः धनुश्श-
तावकृष्टश्चैत्यपुण्यस्थानवनसेतुबन्धाः कार्याः, यथादिशं च दिग्देवताः ।
(२) उत्तरः पूर्वो वा श्मशानवाटः, दक्षिणेन वर्णोत्तमानाम् । तस्या-
तिक्रमे पूर्वः साहसदण्डः ।
(३) पाषण्डचण्डालानां श्मशानान्ते वासः ।
(४) कर्मान्तक्षेत्रवशेन वा कुटुम्बिनां सीमानं स्थापयेत् । तेषु पुष्प-
फलवाटषण्डके दारान्वान्यपण्यनिचयांश्चानुज्ञाताः कुर्युः, दशकुलीवाटं कूप-
स्थानम् । सर्वस्नेहधान्यक्षारलवणभैषज्यशुष्कशाकयवसवल्लूरतृणकाष्ठ-
बनवाये जायें । नगर के ओर-छोर जहाँ खाली जगह छूटी है, धोबी, दर्जी, जुलाहे और विदेशी व्यापारियों को बसाया जाय ।
( १ ) दुर्गा, विष्णु, जयंत, इन्द्र, शिव, वरुण, अश्विनीकुमार, लक्ष्मी और मदिरा, इन देवताओं की स्थापना नगर के बीच में करनी चाहिये । कोष्ठागार आदि में भी कुलदेवता या नगरदेवता की स्थापना करनी चाहिये । प्रत्येक दिशा के मुख्य द्वार पर उसके अधिष्ठाता देवता की स्थापना की जाय । उत्तर का देवता ब्रह्मा, पूर्व का इन्द्र, दक्षिण का यम और पश्चिम का सेनापति ( कुमार ) होता है । नगर की परिखा से बाहर दो-सौ गज को दूरी पर कैत्य, पुण्यस्थान, उपवन और सेतुबंध आदि स्थानों की रचना और यथास्थान दिग्देवताओं की भी स्थापना की जाय ।
( २ ) नगर के उत्तर या पूरव में श्मशान होना चाहिए । दक्षिण दिशा में छोटी जाति वाले लोगों का श्मशान होना चाहिए । जो भी इस नियम का उल्लंघन करे उसे प्रथम साहस-दण्ड दिया जाय ।
( ३ ) कापालिकों और चाण्डालों का निवासस्थान श्मशानों के ही समीप बनवाया जाय ।
( ४ ) नगर में बसने वाले परिवारों को उनके अध्यवसाय तथा उनके योग्य भूमि की गुञ्जायश देखकर ही, बसाया जाय । उन खेतों में फूल, फल, साग-सब्जी, कमल आदि की क्यारियाँ बनाई जायें । राजा तथा राजपुरुषों की आज्ञा प्राप्त कर उनमें अनाज तथा विक्रय योग्य वस्तुएँ पैदा की जायें । दशकुलीबाट , ( बीस हलों से जोती जाने योग्य भूमि ) के बीच सिंचाई के लिए एक कुआँ होना चाहिए । घी, तेल, इत्र, क्षार, नमक, दवा, सूखे साक, भूसा, सूखा मांस, घास, लकड़ी, लोहा, चमड़ा, कोयला, तांत, विष, सींग, बाँस, छाल, चन्दन या देवदारु की लकड़ी, हथियार, कवच और पत्थर, इन सभी वस्तुओं को दुर्ग के अन्दर इतनी तादात में जमा