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सर्वकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 918 में से

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पृष्ठ 230

१४६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण

(१) तुलाप्रतिमानं पौतवाध्यक्षे वक्ष्यामः। तेनोपदेशेन रूप्यसुवर्णं दद्यादाददीत च।
(२) अक्षशालामनायुक्तो नोपगच्छेत्। अभिगच्छन्नुच्छेद्यः आयुक्तो वा सरूप्यसुवर्णस्तेनैव जीयेत। विचितवस्त्रहस्तगुह्याः काञ्चनपृषतत्वष्टृतपनीयकारवो ध्मायकचरकपांसुधावकाः प्रविशेयुर्निष्कसेयुश्च। सर्वं चैषामुपकरणमनिष्ठिताश्च प्रयोगास्तत्रैवावतिष्ठेरन्। गृहीतं सुवर्णं धृतं च प्रयोगं करणमध्ये दध्यात्। सायं प्रातश्च लक्षितं कर्तृकारयितृमुद्राभ्यां निदध्यात्।
(३) क्षेपणो गुणः क्षुद्रकर्मेति कर्माणि। क्षेपणः काचार्पणादीनि। गुणः सूत्रवानादीनि। घनं सुषिरं पृषतादियुक्तं क्षुद्रकर्मेति।


भी श्रेष्ठ समझना चाहिए। यदि तपाने से उसमें फर्क पड़ जाय, उस पर नीलिमा छा जाये तो समझना चाहिए कि वह खोटा है।

(१) सोना-चाँदी तौलने का विधान आगे चलकर 'पौतवाध्यक्ष' प्रकरण में कहा जायगा। उस प्रकरण में निर्दिष्ट तौल के अनुसार ही सोना-चाँदी देने और लेने चाहिएँ।

(२) अक्षशाला में वे ही व्यक्ति प्रवेश करें, जो वहाँ कार्य करने के लिए नियुक्त किए गए हैं। निषेध करने पर भी यदि कोई प्रवेश करते हुए पकड़ा जाय तो उसका सर्वस्व अपहरण कर लेना चाहिए। अक्षशाला में कार्य करने वाला कोई भी व्यक्ति यदि अपने साथ सोना चाँदी ले जाता हुआ पकड़ा जाय तो उसे भी यथायोग्य दण्ड देना चाहिए। रसप्रयोग से सोना बनाने वाले, छोटी-छोटी गोली बनाने वाले, बड़े-बड़े पात्र बनाने वाले, तरह-तरह के आभूषण बनाने वाले, झाडू देने वाले तथा अन्य परिचारक, अपनी-अपनी वर्दी पहिने तलाशी देकर अक्षशाला में प्रवेश करें और बाहर निकलें। इन कारीगरों के औजार एवं आधे बनाये हुए आभूषण आदि अक्षशाला में ही रहें, बाहर कदापि न जाने पावें। भांडागार से तौल कर लिया गया सोना तथा उससे बने हुए आभूषण आदि, कार्य करने के अनन्तर, भाँडागार के लेखक को भली भाँति तौल कर सौंप देना चाहिए और विधिवत् उसको रजिस्टर में दर्ज करवा देना चाहिए। सायं और प्रातः प्रतिदिन, काम खत्म होने और शुरू होने पर सौवर्णिक तथा सुवर्णाध्यक्ष से मुहर लगाकर भण्डार का लेखक उस सुवर्ण को भण्डार में बन्द करके रख दे।

(३) आभूषण सम्बन्धी कार्य तीन प्रकार के होते हैं : १. क्षेपण, २. गुण और ३. क्षुद्रक। आभूषणों पर मणियों के जोड़ने को क्षेपण कहते हैं। सोने के बारीक सूतों को जोड़ने के लिए गुण कहा जाता है। ठोस तथा पोले, छोटी-छोटी बूंदों या गोलियों से बने आभूषण सम्बन्धी कार्य को क्षुद्रक कहते हैं।