कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
६६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण
६६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण
दहति; न चात्रान्योऽग्निर्ज्वलति; वैद्युतेन भस्मना मृत्संयुक्तेन कनकवारिणाऽवलिप्तं च।
(१) जीवन्तीश्वेतामुष्ककपुष्पवन्दाकाभिरक्षीवे जातस्याश्वत्थस्य प्रतानेन वा गुप्तं सर्पा विषाणि वा न प्रसहन्ते। मार्जारमयूरनकुलपृषतोत्सर्गः सर्पान्भक्षयति। शुकः शारिका भृङ्गराजो वा सर्पविषशङ्कायां क्रोशति। क्रौञ्चो विषाभ्याशे माद्यतिः ग्लायति जीवञ्जीवकः; म्रियते मत्तकोकिलः; चकोरस्याक्षिणी विरज्येते। इत्येवम् अग्निविषसर्पेभ्यः प्रतिकुर्वीत।
(२) पृष्ठतः कक्ष्याविभागे स्त्रीनिवेशो गर्भव्याधिवैद्यप्रत्याख्यातसंस्था वृक्षोदकस्थानं च। बहिः कन्याकुमारपुरम्। पुरस्ताद्वलङ्कारभूमिर्मन्त्रभूमिरुपस्थानं कुमाराध्यक्षस्थानं च। कक्ष्यान्तरेष्वन्तर्वंशिकसैन्यं तिष्ठेत्।
वेद के मन्त्रोच्चारण के साथ-साथ वांई ओर से तीन परिक्रमा करते हुए, कराया जाय तो उस अंतःपुर को आग नहीं जला सकती; और न दूसरी अग्नि ही वहाँ जल सकती है। बिजली के गिरने से जले हुए पेड़ की राख लेकर उसमें उतनी ही मिट्टी मिला दी जाय और दोनों को धतूरे के पानी के साथ गूंथकर यदि उसका दीवारों पर लेपन किया जाय तब भी वहाँ दूसरी अग्नि असर नहीं कर सकती है।
(१) गिलोय, शंखपुष्पी, कालीपांढरी और करौंदे के पेड़ पर लगे हुए वंदे की माला आदि के रख देने; अथवा सहिजन (सैजन) के पेड़ के ऊपर पैदा हुए पीपल के पत्तो के वंदनवार बांध देने से अंतःपुर में सर्प, विच्छू आदि विषैले जंतुओं तथा दूसरे विषों का कोई प्रभाव नहीं होता है। बिल्ली, मोर, नेवला और मृग आदि भी साँपों को खा जाते हैं। अन्न आदि में सर्प-विष की आशंका होने पर तोता, मैना और बड़ा भौंरा चिल्लाने लगते हैं। विष के समीप होने पर क्रौंच पक्षी विह्वल हो जाता है। जीवंजीव (चकोर के समान एक पक्षी) नामक पक्षी जहर को देखकर मुरझा जाता है। कोयल विष को देखकर मर जाती है। विष को देखकर चकोर की आँखें लाल हो जाती हैं। इन सब उपायों के द्वारा राजा अपने आप को तथा अंतःपुर को अग्नि, सर्प और विष के भय से बचा कर रखे।
(२) राजमहल के पीछे कक्ष्याभाग में रनिवास, उसके समीप ही प्रसूता, बीमार तथा असाध्य रोगिणी स्त्रियों के लिए अलग-अलग तीन आवास बनवाये जायें और उन्हीं के साथ छोटे-छोटे उद्यान तथा सरोवरों का निर्माण किया जाय। बाहर की ओर राजकुमारियों और युवक राजकुमारों के लिए स्थान बनवाये जायें। राज-महल के आगे हरी-हरी घास और फूलों से सजे हुए उपवन होने चाहिए। उसके
प्र० १५ : अ० १६ ] राजभवन का निर्माण ६७
(१) अन्तर्गृहगतः स्थविरस्त्रीपरिशुद्धां देवीं पश्येत् । न काञ्चिदभिगच्छेत् । देवीगृहे लीनो हि भ्राता भद्रसेनं जघान; मातुः शय्याऽन्तर्गतश्च पुत्रः कारूशम् । लाजान् मधुनेति विषेण पर्यस्य देवी काशिराजं, विषदिग्धेन नूपुरेण वैरन्त्यं, मेखलामणिना सौवीरं, जालूथमादर्शेन, वेण्यां गूढं शस्त्रं कृत्वा देवी विडूरथं जघान । तस्मादेतान्यास्पदानि परिहरेत् ।
(२) मुण्डजटिलकुहकप्रतिसंसर्गं बाह्याभिश्च दासीभिः प्रतिषेधयेत् । न चैनाः कुल्याः पश्येयुरन्यत्र गर्भब्याधिसंस्थाभ्यः । रूपाजीवाः स्नानप्रघर्षशुद्धशरीराः परिवर्तितवस्त्रालङ्काराः पश्येयुः । अशीतिकाः पुरुषाः पञ्चाशतकाः स्त्रियो वा मातापितृव्यञ्जनाः स्थविरवर्षवराभ्यागारिकाश्चावरोधानां शौचाशौचं विद्युः, स्थापयेयुश्च स्वामिहिते ।
बाद मंत्रसभा का स्थान, फिर दरबार और तदनन्तर युवक राजकुमार, समाहर्त्ता-सन्निधाता आदि अध्यक्षों के प्रधान कार्यालय होने चाहिए । कक्ष्याओं के बीच-बीच में कंचुकी तथा अंतःपुररक्षकों की उपस्थिति रहे ।
( १ ) रनिवास के अंदर जाकर राजा किसी विश्वस्त बूढ़ी परिचारिका के साथ महारानी से मिले । अकेला किसी रानी के पास न जाये, क्योंकि ऐसा करने में कभी कभी बड़ा धोखा हो जाता है । कहा जाता है कि पहले कभी भद्रसेन नामक राजा के भाई वीरसेन ने उसकी रानी से मिलकर छिपे में भद्रसेन राजा को मार डाला था । इसी प्रकार माता की शय्या के नीचे छिपे हुए राजकुमार ने अपने पिता कारूश को मार डाला था । इसी प्रकार काशीराज की रानी ने धान की खीलों में मधु के बहाने विष मिलाकर अपने पति को मार डाला था । इसी भाँति विष में बुझे नूपुर के द्वारा वैरन्त्य राजा को और विष-बुझी करधनी की मणि से सौबीर राजा को, शीशे के द्वारा जालूथ राजा को और अपनी बेणी में शस्त्र छिपाकर विडूरथ राजा को, उनकी रानियों ने धोखे में मार डाला था । इसलिए रानियों से मिलते समय, राजा को इस प्रकार की अदृष्ट विपत्तियों से सावधान रहना चाहिए ।
( २ ) राजा को चाहिए कि वह मुंडी, जटी इसी प्रकार के अन्य धूर्त और बाहर की दासियों के साथ रानियों का संपर्क न होने दे । रानियों के सगे-संबंधी भी उन्हें प्रसव या बीमारी की अवस्था के अतिरिक्त न देखने पावें । स्नान, उबटन के बाद सुंदर वस्त्राभूषणों से अलंकृत होकर वेश्याएँ राजा के निकट जायें । अस्सी वर्ष की अवस्था के पुरुष तथा पचास वर्ष की बूढ़ी स्त्रियाँ माता-पिता की भाँति रानियों के हितचिंतन में रत रहें । अतःपुर के दूसरे वृद्ध तथा नपुंसक पुरुष रानियों के चरित्र का ध्यान रखें और उनको राजा की हितकामना में लगाये रखें ।
६८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण
(१) स्वभूमौ च वसेत् सर्वः परभूमौ न सञ्चरेत् ।
न च बाह्येन संसर्गं कश्चिदाभ्यन्तरो व्रजेत् ॥
(२) सर्वं चावेक्षितं द्रव्यं निबद्धागमनिर्गमम् ।
निर्गच्छेदधिगच्छेद्वा मुद्रासंक्रान्तभूमिकम् ॥इति विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे निशान्तप्रणिधि-
नमिकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
—: ० :—
( १ ) अंतःपुर के सभी परिचारक-परिचारिकायें अपने-अपने स्थानों पर ही रहें, एक दूसरे के स्थान पर न जाने पावें । इसी प्रकार भीतर का कोई भी आदमी बाहर के आदमियों से न मिलने पावे ।
( २ ) जो भी वस्तु महल से बाहर आवे तथा महल में जावे उसका भली-भाँति निरीक्षण कर और उसके संबंध के सारे विवरण रजिस्टर में लिख देने चाहिए । राजमहल के बाहर और भीतर जाने-आने वाली प्रत्येक वस्तु पर राजकीय मुहर लग जानी चाहिए ।
विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण १६ | # आत्मरक्षितकम् |
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| अध्याय २० |
(१) शयनादुत्थितः स्त्रीगणैर्धन्विभिः परिगृह्येत; द्वितीयास्यां कक्ष्यायां कञ्चुकोष्णीषिभिर्वर्षवराभ्यागारिकैः, तृतीयास्यां कुब्जवामनकिरातैः, चतुर्थ्यां मन्त्रिभिः सम्बन्धिनिर्दीवारिकैश्च प्रासपाणिभिः ।
(२) पितृपैतामहं महासम्बन्धानुबन्धं शिक्षितमनुरक्तं कृतकर्माणं जनमासन्नं कुर्वीत; नान्यतोदेशीयमकृतार्थमानं स्वदेशीयं वाप्यपकृत्योपगृहीतम् । अन्तर्वैशिकसैन्यं राजानमन्तःपुरं च रक्षेत् ।
(३) गुप्ते देशे माहानसिकः सर्वमास्वादबाहुल्येन कर्म कारयेत् । तद्राजा तथैव प्रतिभुञ्जीत, पूर्वमग्नये वयोभ्यश्च बलिं कृत्वा ।
आत्मरक्षा का प्रबंध
( १ ) प्रातःकाल राजा के विस्तर से उठते ही, धनुष-बाण लिये स्त्रियां उन्हें घेर लें । शयनकक्ष से उठकर राजा जब दूसरे कक्ष में प्रवेश करे तो वहाँ कुर्ता, पगड़ी पहिने हुए नपुंसक तथा दूसरे सेवक राजा की देख-रेख के लिए उपस्थित रहें । तीसरे कक्ष में कुबड़े, बौने एवं निम्न जाति के परिजन राजा की रक्षा करें । चौथे कक्ष में मंत्रियों, संबंधियों और हाथ में भाला लिये द्वारपालों द्वारा राजा की रक्षा होनी चाहिए ।
( २ ) वंश-परंपरा से अनुगत, उच्चकुलोत्पन्न, शिक्षित, अनुरक्त और प्रत्येक कार्य को भली-भांति समझने वाले पुरुषों को राजा अपना अंगरक्षक नियुक्त करे । किंतु धन-संमान-रहित विदेशी व्यक्ति को तथा एक बार पृथक् होकर पुनः नियुक्त स्वदेशीय व्यक्ति को भी राजा अपना अंगरक्षक कदापि नियुक्त न करे । राजमहल की भीतरी सेना राजा और रनिवास की रक्षा करे ।
( ३ ) माहानसिक ( पाकशाला का अध्यक्ष या निरीक्षक ) को चाहिए कि वह किसी एकांत स्थान में भोज्य पदार्थों का स्वाद ले-लेकर उन्हें सुस्वादु तथा सुरक्षा से तैयार कराये । भोजन के तैयार हो जाने पर राजा पहिले अग्नि तथा पक्षियों को बलि प्रदान कर, फिर स्वयं खावे ।
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|---|
(१) अग्नेर्ज्वलाधूमनीलता शब्दस्फोटनं च विषयुक्तस्य, वयसां विपत्तिश्च। अन्नस्योष्मा मयूरग्रीवाभः शैत्यमाशु क्लिष्टस्येव वैवर्ण्यं सोदकत्वमक्लिन्नत्वं च। व्यञ्जनानामाशुशुष्कत्वं च क्वाथः श्यामफेनपटलविच्छिन्नभावो गन्धस्पर्शरसवधश्च। द्रवेषु हीनातिरिक्तच्छायादर्शनं फेनपटलसीमन्तोर्ध्वराजीदर्शनं च। रसस्य मध्ये नीला राजी, पयसस्ताम्रा, मद्यतोययोः काली, दध्नः श्यामा, मधुनः श्वेता च। द्रव्याणामाद्रीणामाशुप्रम्लानत्वमुत्पक्वभावः क्वाथनीलश्यामता च। शुष्काणामाशुशातनं वैवर्ण्यं च। कठिनानां मृदुत्वं मृदूनां कठिनत्वं च। तदभ्याशे क्षुद्रसत्त्ववधश्च। आस्तरणप्रावरणानां श्याममण्डलता तन्तुरोमपक्ष्मशातनं च। लोहमणिमयानां पङ्कमलोपदेहता स्नेहरागगौरवप्रभाववर्णस्पर्शवधश्च। इति विषयुक्तलिङ्गानि।
विषमिश्रित पदार्थों की पहिचान
(१) जिस अन्न में विष मिला हो उसे अग्नि में डालने से अग्नि और लपट, दोनों नीले रंग के हो जाते हैं तथा उसमें चट-चट का शब्द होता है। विषमिश्रित अन्न के खाने पर पक्षियों की भी मृत्यु हो जाती है। विषयुक्त अन्न की भाफ मयूर-ग्रीवा जैसे रंग की होती है; वह भोजन शीघ्र ही ठंडा हो जाता है; हाथ के स्पर्श या तोड़ने-मोड़ने से उसका रंग बदल जाता है, उसमें गांठ-सी पड़ जाती है, और वह अन्न अधपका ही रह जाता है। विष मिली दाल जल्दी ही सूख जाती है, फिर से आंच पर रखा जाय तो मट्ठे की तरह वह फट जाती है, उसकी झाग काली तथा वह अलग-अलग हो जाती है, और उसका स्वाद, स्पर्श, उसकी सुगंध आदि सब जाते रहते हैं। विषयुक्त रसेदार तरकारी विरंगी-विकृत हो जाती है, उसका पानी अलग तैरता रहता है, और उसके ऊपर रेखा-सी खिंच जाती है। यदि घी, तेल आदि रसिक पदार्थों में विष मिला हो तो उनमें नीले रंग की रेखाएँ तैरने लगती हैं, विष-मिश्रित दूध में ताम्रवर्ण की, शराब तथा पानी में काले रंग की, दही में श्यामवर्ण की और शहद में सफेद रंग की रेखाएँ दिखाई देती हैं। आम, अनार आदि द्रव्यों में विष मिला हो तो वे सिकुड़ जाते हैं, उनमें सडांध आने लगती है, और पकाने पर उनका वर्ण कुछ कालापन एवं भूरापन लिये होता है। यदि सूखे हुए पदार्थों में विष मिला हो तो वे छूते ही चूर-चूर होकर विवर्ण हो जाते हैं। विषमिश्रित ठोस पदार्थ मुलायम और मुलायम पदार्थ ठोस हो जाता है। विषममय वस्तु के समीप रेंगने वाले छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़े मर जाते हैं। ओढ़ने-बिछाने के कपड़ों पर यदि विष का प्रयोग किया गया हो तो उनमें स्थान-स्थान पर धब्बे पड़ जाते हैं। यदि कपड़ा सूती हुआ तो उसका सूत और ऊनी हुआ तो उसकी रुआं उड़ जाती है। सोने, चांदी,
प्र० १६ : अ० २० ] आत्मरक्षा का प्रबन्ध ७१
(१) विषप्रदस्य तु शुष्कश्यामवक्त्रता वाक्सङ्गः स्वेदो विजृम्भणं चातिमात्रं वेपथुः प्रस्खलनं वाक्यविप्रेक्षणमावेशः कर्मणि स्वभूमौ चानवस्थानमिति ।
(२) तस्मादस्य जाङ्गुलीविदो भिषजश्चासन्नाः स्युः ।
(३) भिषग्भैषज्यागारादास्वादविशुद्धमौषधं गृहीत्वा पाचकपोषकाभ्यामात्मना च प्रतिस्वाद्य राज्ञे प्रयच्छेत् । पानं पानीयं चौषधेन व्याख्यातम् ।
(४) कल्पकप्रसाधकाः स्नानशुद्धवस्त्रहस्ताः समुद्रमुपकरणमन्तर्वंशिकहस्तादादाय परिचरेयुः ।
(५) स्नापकसंवाहकास्तरकरजकमालाकारकर्म दास्यः कुर्युः;
स्फटिक मणि आदि धातुओं पर यदि विष का प्रयोग किया गया हो तो उनकी आभा पंकिल दिखाई देती है, उनकी चमक, भारीपन और पहिचान आदि सब जाते रहते हैं । यहाँ तक विषमिश्रित पदार्थों के पहिचान की विधियों का निरूपण किया गया है ।
विष देने वाले की पहिचान
( १ ) विष देने वाले का मुँह सूख जाता है, उसके चेहरे का रंग बदल जाता है, बात-चीत करते हुए उसकी वाणी लड़खड़ाने लगती है, उसको पसीना, कंपकंपी तथा जंभाई आने लगती है, बेचैन होकर वह गिर पड़ता है, संदेहवश दूसरों की बातें वह ध्यानपूर्वक सुनने लगता है, बात-बात में वह आवेश करने लगता है; अपने कार्य और अपने स्थान पर उसका मन स्थिर नहीं रह पाता है ।
( २ ) इसलिए विषविद्या के जानकार और वैद्य राजा के समीप अवश्य रहें ।
( ३ ) वैद्य को चाहिए कि औषधालय में स्वयं खाकर परीक्षा की हुई औषधि को वह राजा के सामने लाकर उसमें से कुछ को पकाने-पीसने वाले लोगों को और कुछ स्वयं भी खाकर पुनः राजा को दे । इसी प्रकार जल तथा मद्य को भी, परीक्षा करने के उपरांत, राजा को देना चाहिए ।
परिजनों के कर्त्तव्य
( ४ ) दाढ़ी-मूंछ बनाने वाले नाई तथा वस्त्रालंकरण धारण कराने वाले परिचारकों को चाहिए कि वे स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण किये हाथों को अच्छी तरह धोकर राजमहल के अंदर रहने वाले कंचुकी आदि से मुहर लगे हुए उस्तरा और वस्त्राभूषण को लेकर राजा की परिचर्या करें ।
( ५ ) राजा को स्नान कराना, उसके अंगों को दबाना, बिस्तर बिछाना, कपड़े
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ताभिरधिष्ठिता वा शिल्पिनः । आत्मचक्षुषि निवेश्य वस्त्रमाल्यं दद्युः; स्नानानुलेपनप्रघर्षचूर्णवासस्नानीयानि स्ववक्षोबाहुषु च । एतेन परस्मादागतं व्याख्यातम् ।
(१) कुशीलवाः शस्त्राग्निरसवर्जं नर्मयेयुः । आतोद्यानि चैषामन्तस्तिष्ठेयुः, अभ्वरथद्विपालङ्काराश्च ।
(२) मौलपुरुषाधिष्ठितं यानवाहनमारोहेत्; नावं चाप्तनाविकाधिष्ठिताम् । अन्यनौप्रतिबद्धां वातवेगवशां च नोपेयात् । उदकान्ते सैन्यमासीत । मत्स्यग्राहविशुद्धमवगाहेत । व्यालग्राहपरिशुद्धमुद्यानं गच्छेत् ।
(३) लुब्धकैः श्वगणिभिरपास्तस्तेनव्यालपराबाधभयं चललक्षपरिचयार्थं मृगारण्यं गच्छेत् ।
(४) आप्तशस्त्रग्राहाधिष्ठितः सिद्धतापसं पश्येत्; मन्त्रिपरिषदा सामन्तदूतम् । सन्नद्धोऽश्वं हस्तिनं रथं वाऽऽरूढः सन्नद्धमनीकं गच्छेत् ।
धोना और माला बनाना आदि कार्यों को दासियाँ ही करें, अथवा दासियों की देख-रेख में उस कार्य के जानकार लोग करें । दासियों को चाहिए कि अपनी आँखों से देखकर ही वे राजा को वस्त्रालंकरण पहिनावें । स्नान के समय उपयोग में लाई जाने वाली वस्तुओं, जैसे—उबटन, चंदन, सुगन्धित चूर्ण ( पाउडर ) तथा पटवास आदि को, दासियाँ पहिले अपनी छाती एवं बाँह पर लगाकर आजमा लें और तदनंतर राजा पर उनका प्रयोग करें । यही बात दूसरे स्थान से आई हुई वस्तुओं के संबंध में भी जान लेनी चाहिए ।
( १ ) खेल दिखाने वाले नट-नर्तक, हथियार, आग, विष आदि के अतिरिक्त दूसरे खेलों को ही राजा के सामने दर्शित करें । नट-नर्तकों के उपयोग में आने वाली सामग्री, जैसे—वादन, वस्त्र, घोड़े, अलंकरण आदि, राजमहल से ही दी जानी चाहिए ।
( २ ) विश्वस्त प्रधान पुरुष के साथ होने पर ही राजा पालकी तथा घोड़े आदि यान-वाहनों पर चढ़े । विश्वस्त नाविक के रहने पर ही नौका पर चढ़े । दूसरी नाव पर बंधी एवं वायु से चालित नाव पर वह कदापि न बैठे । राजा जब नौका-विहार करे तो, सुरक्षा के लिए, नदी के दोनों तटों पर सेना तैनात रहनी चाहिए । मछुओं द्वारा भलीभांति जाँच किए गए घाट पर ही वह स्नान करे । इसी प्रकार संपेरों द्वारा परिशोधित उद्यान में ही वह भ्रमण करे ।
( ३ ) चोर तथा व्याघ्र आदि से रहित, कुत्ते रखने वाले शिकारियों के साथ राजा, चलते हुए लक्ष्य पर निशाना साधने के उद्देश्य से जंगल में जाय ।
( ४ ) दर्शनार्थ आये हुए किसी सिद्ध या तपस्वी से मिलते समय राजा, अपने विश्वस्त सशस्त्र पुरुष को साथ ले ले । अपने मंत्रि-परिषद् के साथ ही वह सामंत
प्र० १६ : अ० २० ] आत्मरक्षा का प्रबन्ध ७३
(१) निर्याणेऽभियाने च राजमार्गमुभयतः कृतारक्षं दण्डिभिरपास्त-
शस्त्रहस्तप्रव्रजितव्यङ्गं गच्छेत् । न पुरुषसम्बाधमवगाहेत । यात्रासमाजो-
त्सवप्रवहणानि च दशवर्गिकाधिष्ठितानि गच्छेत् ।
(२) यथा च योगपुरुषैरन्यान् राजाऽधितिष्ठति ।
तथाऽयमन्यबाधेभ्यो रक्षेदात्मानमात्मवान् ॥
इति विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे आत्मरक्षितकं विंशोऽध्यायः ।
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राजा के दूत से मिले । घोड़े, हाथी या रथ पर सवार युद्ध के लिए प्रस्थान करने वाली सेना का वह युद्धोचित कवच आदि पहिन कर सैनिक वेश में निरीक्षण करे ।
( १ ) बाहर जाते या बाहर से आते समय राजा, हाथ में दण्ड लिये रक्षकों द्वारा दोनों ओर से सुरक्षित मार्ग पर चले । ऐसा प्रबंध हो कि रास्ते भर में कहीं भी राजा को शस्त्ररहित पुरुष, संन्यासी या लूला-लंगड़ा, अपंग व्यक्ति न दिखाई दे । पुरुषों की भीड़ में भी वह कदापि न घुसे । किसी देवालय, सभा, उत्सव तथा पार्टी आदि में वह शामिल होने जाय तो कम से कम दस सिपाही तथा सेनानायक उसके साथ उपस्थित रहें ।
( २ ) विजय की इच्छा रखने वाला राजा जैसे अपने गुप्तचरों द्वारा दूसरों को कष्ट पहुँचाता है, उसी प्रकार दूसरों के द्वारा दिये गए कष्टों से भी वह अपनी रक्षा करे ।
विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में बीसवाँ अध्याय समाप्त ।
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(इस पृष्ठ पर छपा हुआ पाठ अत्यंत धुंधला / अस्पष्ट होने के कारण पठनीय नहीं है।)