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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

४३० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण

४३० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण

(१) वृत्तिविकारं चावेक्षेताप्यमानुषाणाम् ।
(२) अयमुच्चैः सिंचतीति कात्यायनः प्रवव्राज ।
(३) क्रौंचोऽपसव्यम् इति कणिङ्को भारद्वाजः ।
(४) तृणमिति दीर्घश्चारायणः ।
(५) शीता शाटीति घोटमुखः ।
(६) हस्ती प्रत्यौक्षीदिति किंजल्कः ।
(७) रथाश्वं प्राशंसीदिति पिशुनः ।
(८) प्रतिरवणे शुनः पिशुनपुत्रः इति ।
(९) अर्थमानावक्षेपे च परित्यागः । स्वामिशीलमात्मनश्च किल्बिष-
मुपलभ्य वा प्रतिकुर्वीत । मित्रमुपकृष्टं वास्य गच्छेत् ।


समय उसको पीछे बड़े ध्यान से देखता है, पास आये तो दूर हटा देता है, उसके साथ व्यर्थ की बातें करता है और अन्य राजकर्मचारियों और उसके व्यवहार में भेद डालता है ।

( १ ) मनुष्यों के अतिरिक्त पशु-पक्षियों के भी मानसिक विकारों एवं चेष्टाओं का ध्यानपूर्वक निरीक्षण करना चाहिए ।

( २ ) 'यह जल सींचने वाला आज ऊपर से जल सींच रहा है'—यह देखकर मन्त्री कात्यायन अपने राजा को छोड़कर चला गया था ।

( ३ ) 'क्रौंचपक्षी आज वाँई ओर से उड़ गया'—यह देखकर भारद्वाजगोत्रीय कणिक नाम का मन्त्री अपने राजा को छोड़कर चला गया था ।

( ४ ) तृण को देखकर आचार्य दीर्घ चारायण, राजा को छोड़कर चला गया था ।

( ५ ) 'कपड़ा ठंडा है'—यह सुनकर आचार्य घोटमुख अपने राजा को छोड़ कर चला गया था ।

( ६ ) हाथी को ऊपर पानी डालता देख कर किंजल्क नामक आचार्य अपने राजा को छोड़कर चला गया था ।

( ७ ) रथ के घोड़े की तारीफ सुनकर आचार्य पिशुन अपने राजा को छोड़कर चला गया था ।

( ८ ) कुत्ते के भूंकने पर आचार्य पिशुन का पुत्र अपने राजा को छोड़कर चला गया था ।

( ९ ) संपत्ति और सत्कार को नष्ट कर देने वाले राजा को भी त्याग देना चाहिए । अथवा राजा के स्वभाव और अपने अपराध पर विचार करके राजा को न छोड़ने की इच्छा होने पर, राजा का प्रतीकार करना चाहिए । या राजा के निकटवर्ती सम्बन्धी अथवा मित्र का आश्रय लेकर राजा को प्रसन्न करना चाहिए ।

प्र० ९३ : अ० ५ ] राजा के प्रति व्यवहार ४३१

(१) तत्रस्थो दोषनिर्घातं मित्रैर्भर्तरि चाचरेत् ।
ततो भर्तरि जीवेद् वा मृते वा पुनराव्रजेत् ॥

इति योगवृत्ते पञ्चमेऽधिकरणे समयाचारिकं नाम पञ्चमोऽध्यायः,
आदितः पञ्चनवतितमः ।

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( १ ) राजा के पास रहते हुए ही उसके मित्रों द्वारा अपने अपराध की सफाई करानी चाहिए और तब राजा के प्रसन्न हो जाने पर उसके आश्रय में बना रहना चाहिए या जब उसकी मृत्यु हो जाय तब वापिस आना चाहिए ।

योगवृत्त नामक चतुर्थ अधिकरण में समयाचारिक नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ९४-९५ | अध्याय ६

राज्यप्रतिसन्धानमेकैश्वर्यं च


(१) राजव्यसनमेवममात्यः प्रतिकुर्वीत । प्रागेव मरणाबाधभयाद्राज्ञः प्रियहितोपग्रहेण मासद्विमासान्तरं दर्शनं स्थापयेद् । 'देशपीडापहममित्राप-हमायुष्यं पुत्रीयं वा कर्म राजा साधयति' इत्यपदेशेन राजव्यंजनमनुरूप-वेलायां प्रकृतीनां दर्शयेत् । मित्रामित्रदूतानां च । तैश्च यथोचितां सम्भा-षाम् अमात्यमुखो गच्छेत् । दौवारिकान्तर्वंशिकमुखश्च यथोक्तं राजप्रणिधि-मनुवर्तयेत् । अपकारिषु च हेडं प्रसादं वा प्रकृतिकान्तं दर्शयेत् । प्रसाद-मेवोपकारिषु ।

(२) आप्तपुरुषाधिष्ठितौ दुर्गप्रत्यन्तस्थौ वा कोशदण्डावेकस्थौ कार-येत् । कुल्यकुमारमुख्यांश्चान्यापदेशेन ।

(३) यश्च मुख्यः पक्षवान् दुर्गाटवीस्थो वा वैगुण्यं भजेत तमुपग्राह-येत् । बह्वबाधां वा यात्रां प्रेषयेत् मित्रकुलं वा ।


विपत्तिकाल में राजपुत्र का अभिषेक और एकछत्र राज्य की प्रतिष्ठा

(१) अमात्य को चाहिए कि वह राजा पर आई हुई आपत्तियों का प्रतीकार इन तरीकों से करे—राजा की आसन्न मृत्यु समझ कर राजा के मित्रों एवं हितैषियों की सलाह लेकर महीने-दो महीने बाद राजा के दर्शन की तिथि निश्चित कर दे और यह बहाना बनाये कि आजकल राजा देश की पीड़ा दूर करने वाले, शत्रुनाशक, आयुवर्द्धक और पुत्र देने वाले कर्म का अनुष्ठान कर रहा है । राजा के दर्शन की निश्चित तिथि पर राजा के वेष में किसी दूसरे पुरुष को प्रजा के सामने खड़ा कर दे । मित्रों, शत्रुओं और दूतों को भी उस बनावटी राजा के दर्शन करा दे । उन लोगों के साथ वह राजा अमात्य के माध्यम से ही उचित वार्तालाप करे । पूर्व प्रकाशित राजकार्यों के संबंध में द्वारपाल तथा अंतःपुर रक्षकों के द्वारा ही कहलाये । अपकार करने वाले लोगों पर अमात्य की राय से ही कोप या प्रसन्नता प्रकट करे । उपकार करने वाले लोगों पर सदा प्रसन्न ही बना रहे ।

(२) दुर्ग तथा सीमान्त प्रदेशों की सेना और कोष को किसी बहाने किसी विश्वस्त व्यक्ति की देख-रेख में इकट्ठा करा दिया जाय । किसी दूसरे ही बहाने से राज के सगे-संबंधियों, राजकुमार और अन्य राजप्रमुखों को एकत्र कराया जाय ।

(३) दुर्ग या अटवी में स्थित कोई प्रधान राजकर्मचारी यदि किसी की सहायता

प्र० ९४-९५ : अ० ६ ] राजा के प्रति व्यवहार ४३३

(१) यस्माच्च सामन्तादाबाधं पश्येत्, तमुत्सवविवाहहस्तिबन्धनाश्व-पण्यभूमिप्रदानापदेशेन अवग्राहयेत्। स्वमित्रेण वा। ततः सन्धिमदूष्यं कारयेत्।

(२) आटविकामित्रैर्वा वैरं ग्राहयेत्। तत्कुलीनमवरुद्धं वा भूम्येक-देशेनोपग्राहयेत्।

(३) कुल्यकुमारमुख्योपग्रहं कृत्वा वा कुमारमभिषिक्तमेव दर्शयेत्। दाण्डकर्मिकवद् वा राज्यकण्टकानुद्धृत्य राज्यं कारयेत्।

(४) यदि वा कश्चिन्मुख्यः सामन्तादीनामन्यतमः कोपं भजेत्, तम् ‘एहि राजानं त्वा करिष्यामि’ इत्यावाहयित्वा घातयेत्। आपत्प्रतीकारेण वा साधयेत्।

(५) युवराजे वा क्रमेण राज्यभारमारोप्य राजव्यसनं ख्यापयेत्।


लेकर राजा के विरुद्ध हो जाय तो उसे किसी उपाय से अपने अनुकूल बनाया जाय। अथवा उस समय उसे किसी बाधाबहुल युद्ध में भेज दिया जाय। अथवा सहायता माँगने के बहाने किसी मित्र राजा के पास भेज दिया जाय।

( १ ) यदि किसी समीप के सामन्त राजा से बाधा का भय हो तो उसे उत्सव, विवाह, हाथी, घोड़ा, अन्य माल या भूमि देने के बहाने अपने पास बुलाकर अपने अनुकूल बना लिया जाय। अथवा अपने मित्र के द्वारा ही उसको अनुकूल बनाया जाय और तब उसके साथ निर्वैर ( अदूष्य ) संधि कर ले।

( २ ) अथवा उस सामंत को आटविक तथा अपने शत्रु के साथ लड़ा दे। अथवा उस सामंत-परिवार के किसी व्यक्ति को भूमि देकर अपने वश में कर ले और फिर उसके द्वारा सामन्त का दमन कराये।

( ३ ) राजा के मर जाने के बाद अमात्य को चाहिए कि वह राज-परिवार के कुमार और राज्य के प्रमुख कर्मचारियों की अनुकूल स्थिति को देखकर अभिषिक्त राजकुमार को ही प्रजा के सामने खड़ा करे, वह दाण्डकर्मिक प्रकरण में निर्दिष्ट रीति से राज्य के विरोधियों का निर्मूल कर निष्कंटक राज्य करे।

( ४ ) यदि सामंतमुख्यों में से कोई एक इस बात से कुपित हो जाय तो उससे 'यह बालक तो राज्य के लिए सर्वथा अयोग्य है, आप यहाँ आवें, आपको ही मैं राजा बना दूँगा' ऐसा कह कर अपने यहाँ बुलाया जाय और फिर उसका वध करा दिया जाय। यदि वह आये नहीं तो आपत्प्रतीकार प्रकरण में निर्दिष्ट तरीकों से उसको सीधा किया जाय।

( ५ ) युवराज पर धीरे-धीरे राज्य का भार सौंप कर फिर राजा की विपत्ति को सबके सामने प्रकट करे।

२६ कौ०

४३४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवां अधिकरण

(१) परभूमौ राजव्यसने मित्रेणामित्रव्यञ्जनेन शत्रोः सन्धिमवस्थाप्यापगच्छेत् । सामन्तादीनामन्यतमं वास्य दुर्गे स्थापयित्वापगच्छेत् । कुमारमभिषिच्य वा प्रतिव्यूहेत । परेणाभियुक्तो वा यथोक्तमापत्प्रतीकारं कुर्यात् ।

(२) एवमेकैश्वर्यममात्यः कारयेदिति कौटिल्यः ।

(३) नैवमिति भारद्वाजः । प्रम्रियमाणे वा राजन्यमात्यः कुल्यकुमारमुख्यान् परस्परं मुख्येषु वा विक्रामयेत् । विक्रान्तं प्रकृतिकोपेन घातयेत् । कुल्यकुमारमुख्यानुपांशुदण्डेन वा साधयित्वा स्वयं राज्यं गृह्णीयात् । राज्यकारणाद्धि पिता पुत्रान् पुत्राश्च पितरमभिद्रुह्यन्ति; किमङ्ग पुनरमात्यप्रकृतिर्ह्येकप्रग्रहो राज्यस्य । तत् स्वयमुपस्थितं नावमन्येत । स्वमारूढा हि स्त्री त्यज्यमानाभिशपतीति लोकप्रवादः ।

(४) कालश्च सकृदभ्येति यं नरं कालकांक्षिणम् ।
दुर्लभः स पुनस्तस्य कालः कर्म चिकीर्षतः ॥


(१) यदि राजा की कहीं दूसरे देश में मृत्यु हो जाय तो अमात्य को चाहिए कि वह बनावटी दुश्मन बने हुए मित्र के साथ शत्रु की संधि कराकर अपने देश में चला आवे । अथवा सामन्त आदि में से किसी एक को उसके दुर्ग में नियुक्त करके चला आये और राजकुमार का राज्याभिषेक करके फिर शत्रु के साथ अभियास्यत्कर्म प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों द्वारा बाहरी-भीतरी आपत्तियों से बचने के लिए प्रतीकार करे ।

(२) इस प्रकार अमात्य एकैश्वर्य राज्य का पालन कराये—यह आचार्य कौटिल्य का मत है ।

(३) किन्तु आचार्य भारद्वाज का मत है कि अमात्य इस प्रकार राजपुत्र को एकछत्र राज्य न कराये, बल्कि उचित तो यह है कि राजा की आसन्न मृत्यु समझ कर अमात्य, राजा के वंशज, राजकुमार और मुख्य व्यक्तियों को परस्पर या दूसरे मुख्यों के साथ भिड़ा दे और फिर प्रजा या राजप्रकृति के कुपित होने के कारण इनको मरवा डाले । अथवा उन राज-वंशज, राजकुमार और मुख्य व्यक्तियों को चुपचाप ( उपांशुदण्ड ) मरवा दे और स्वयं ही संपूर्ण राज्य का स्वामी बन जाय । क्योंकि राज्य के लिए पिता-पुत्र परस्पर अभिद्रोह करते हुए देखे गये हैं । फिर वह अमात्य यदि ऐसा करे, जो सारे राज्य की बागडोर है, तो कुछ भी अनुचित नहीं है । इसलिए स्वयं हाथ में आये हुए राज्य का तिरस्कार न करे, क्योंकि लोक-प्रसिद्धि है कि संभोग की इच्छा लेकर स्वयं ही आई हुई स्त्री को यदि छोड़ दिया जाय तो वह शाप दे देती है ।

(४) चिर-प्रतीक्षित मौका एक बार ही हाथ आता है । उसको चूक जाने पर

प्र० ९४-९५ : अ० ६ ] राजा के प्रति व्यवहार ४३५

(१) प्रकृतिकोपकमधर्मिष्ठमनैकान्तिकं चैतदिति कौटिल्यः। राजपुत्र-मात्मसम्पन्नं राज्ये स्थापयेत्। सम्पन्नाभावे व्यसनिनं कुमारं राजकन्यां गर्भिणीं देवीं वा पुरस्कृत्य महामात्रान् सन्निपात्य ब्रूयात्-‘अयं वो निक्षेपः, पितरमस्यावेक्षध्वं सत्त्वाभिजनमात्मनश्च, ध्वजमात्रोऽयं, भवन्त एव स्वा-मिनः, कथं वा क्रियताम्' इति।

(२) तथा ब्रुवाणं योगपुरुषा ब्रूयुः-‘कोऽन्यो भवत्पुरोगादस्माद् राज्ञ-श्चातुर्वर्ण्यमर्हति पालयितुम् इति' । तथेत्यमात्यः कुमारं राजकन्यां गर्भिणीं देवीं वाधिकुर्वीत, बन्धुसम्बन्धिनां मित्रामित्रदूतानां च दर्शयेत् ।

(३) भक्तवेतनविशेषममात्यानामायुधीयानां च कारयेत् । भूयश्चायं वृद्धः करिष्यतीति ब्रूयात् । एवं दुर्गराष्ट्रमुख्यानाभाषेत, यथार्हं च मित्रा-


फिर वैसा अवसर हाथ नहीं आता है। साँप के निकल जाने पर लकीर पीटने से कोई लाभ नहीं होता।

( १ ) किन्तु भरद्वाज के उक्त मत से कौटिल्य सहमत नहीं है। उसका कथन है कि इस प्रकार की कार्यवाही प्रजा के लिए कष्टकर, अधर्मयुक्त और अनित्य है। इसलिए आत्मसंपन्न राजकुमार को ही अभिषिक्त करना चाहिए। यदि आत्मसंपन्न राजकुमार न मिले तो व्यसनी राजकुमार को, राजकन्या को या गर्भिणी महारानी को आगे करके राष्ट्र के सभी महान् व्यक्तियों के सामने कहा जाय कि 'यह आप लोगों की ही धरोहर है, इसकी रक्षा का भार आप लोगों पर ही है, इस राजकुमार की वंशपरंपरा और अपने दायित्वों की ओर गौर करें। यह राजकुमार तो एक पताका के समान है, जो सबसे ऊँचा रहता हुआ फहराता है, किन्तु इसके राज्य का सारा प्रबन्ध आप ही लोगों पर निर्भर है। अब बतलाइये इस संबंध में क्या करना चाहिए ?'

( २ ) अमात्य के इस प्रकार कहने पर राष्ट्र के वे सम्मानित व्यक्ति कहें 'आपके नेतृत्व के अतिरिक्त इस राजकुमार का दूसरा अवलंब कौन है, जो इस चातु-र्वर्ण्य प्रजा का पालन कर सकने में समर्थ हो ?' 'जो आज्ञा' ऐसा कहकर अमात्य उस राजकुमार या राजकन्या अथवा गर्भिणी महारानी को सिंहासन पर अभिषिक्त कर कर दे। उसके बाद उसके भाई, बन्धु, संबंधी, मित्र, शत्रु तथा दूतों को यह सूचित कर दे कि आज से वही राजा है।

( ३ ) राजा को चाहिए कि वह अमात्यों तथा सैनिकों के भत्ते और वेतन में वृद्धि कर दे। उस समय अमात्य यह कहे कि 'बड़ा होकर यह और भी वेतन वृद्धि

४३६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ पाँचवां अधिकरण

मित्रपक्षम् । विनयकर्मणि च कुमारस्य प्रयतेत । कन्यायां समानजातीयादपत्यमुत्पाद्य वाभिषिञ्चेत् । मातृश्चित्तक्षोभभयात् कुल्यमल्पसत्त्वं छात्रं च लक्षण्यमुपनिदध्यात् । ऋतौ चैनां रक्षेत् । न चात्मार्थं कञ्चिदुत्कृष्टमुपभोगं कारयेत् । राजार्थं तु यानवाहनाभरणवस्त्रस्त्रीवेश्मपरिवापान् कारयेत् ।

(१) यौवनस्थं च याचेत विश्रमं चित्रकारणात् ।
परित्यजेददुष्यन्तं तुष्यन्तं चानुपालयेत् ॥
(२) निवेद्य पुत्ररक्षार्थं गूढसारपरिग्रहान् ।
अरण्यं दीर्घसत्रं वा सेवेतारुच्यतां गतः ॥
(३) मुख्यैरवगृहीतं वा राजानं तत्प्रियाश्रितः ।
इतिहासपुराणाभ्यां बोधयेदर्थशास्त्रवित् ॥


करेगा' । यही आश्वासन वह दुर्ग तथा राज्य के अन्य कर्मचारियों को भी दे, और मित्र तथा शत्रुपक्ष के लोगों से भी यथोचित वार्तालाप करे । राजकुमार की विद्या, विनय और दूसरी प्रकार की शिक्षाओं का भी वह यथोचित प्रबंध करे । अथवा किसी समानजातीय पुरुष से राजकन्या में पुत्र उत्पन्न कराके उसे राज्यसिंहासन पर बैठाये । यदि वह महारानी हो तो उसका चित्त खिन्न न हो, इस अर्थ उसके पास कुलीन, अल्पवयस्क, सौम्य वेदाध्यायी व्यक्ति को नियुक्त कर दे, जिससे कि वह धर्मशास्त्र तथा पुराणों की बातों को सुनाकर उसके ( महारानी के ) चित्त को शान्त बनाये रखे । ऋतुकाल ( मासिक धर्म ) में उसकी पूरी रक्षा की जाय । अमात्य को चाहिए कि वह अपने लिए किसी प्रकार की उत्तम सामग्री संचित न करे । राजा के लिए रथ, घोड़े, आभूषण, वस्त्र, स्त्री, मकान और बढ़िया शयनागार का प्रबन्ध करे ।

( १ ) जब राजकुमार युवा हो जाय और राज्यभार संभाल सके तब उसके मनोभावों को जानने के लिए अमात्य उससे अपना मंत्रिपद छोड़ने के लिए कहे । यदि वह स्वीकार कर ले तो अमात्य को वहाँ से चला जाना चाहिए । यदि वह न जाने को कहें तो फिर उसी के पास रहकर पूर्ववत् राजकाज की व्यवस्था करता रहे ।

( २ ) अमात्य पद पर कार्य करने की इच्छा न होने पर अथवा राजा की ओर से कुछ मन-मुटाव हो जाने पर अमात्य को चाहिए कि वह राजा के पूर्वजों द्वारा स्थापित गुप्तचरों और खजाना आदि राजकुमार को बताकर तपस्या करने के लिए जंगल में चला जाय, अथवा दीर्घकाल तक चलने वाले यज्ञकर्मों का अनुष्ठान करे ।

( ३ ) अथवा मामा, फूफा, आदि मुख्य संबंधियों के वश में हुए राजकुमार को उसके हितेच्छु पुरुषों के आश्रित रहता हुआ ही, तत्त्वविद् अमात्य इतिहास और पुराणों के द्वारा धर्म-अर्थ के तत्त्वों को समझाता रहे ।