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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

६४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण

६४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण

(१) राज्ञो हि व्रतमुत्थानं यज्ञः कार्यानुशासनम् ।
दक्षिणा वृत्तिसाम्यं च दीक्षितस्याभिषेचनम् ॥
(२) प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम् ।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ॥
(३) तस्मान्नित्योत्थितो राजा कुर्यादर्थानुशासनम् ।
अर्थस्य मूलमुत्थानमनर्थस्य विपर्ययः ॥
(४) अनुत्थाने ध्रुवो नाशः प्राप्तस्यानागतस्य च ।
प्राप्यते फलमुत्थानाल्लभते चार्थसम्पदम् ॥

इति विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे राजप्रणिधिर्नामाष्टादशोऽध्यायः ।

—: ० :—


( १ ) उद्योग करना, यज्ञ करना, अनुशासन करना, दान देना, शत्रु और मित्रों में—उनके गुण-दोषों के अनुसार समान व्यवहार करना, दीक्षा समाप्त कर अभिषेक करना, ये सब राजा के नैमित्तिक व्रत हैं ।

( २ ) प्रजा के सुख में राजा का सुख और प्रजा के हित में राजा का हित है । अपने आप को अच्छे लगने वाले कार्यों को करने में राजः का हित नहीं, बल्कि उसका हित तो प्रजाजनों को अच्छे लगने वाले कार्यों के संपादन करने में है ।

( ३ ) इसलिए राजा को चाहिए कि उद्योगशील होकर वह व्यवहार-संबंधी तथा राज्य-संबंधी कार्यों को उचित रीति से पूरा करे । उद्योग ही अर्थ का मूल है, और इसके विपरीत, उद्योगहीनता ही अनर्थों को देने वाली है ।

( ४ ) राजा यदि उद्योगी न हुआ तो उसके प्राप्त अर्थों और प्राप्तव्य अर्थों, दोनों का ही नाश हो जाता है; किंतु जो राजा उद्योगी है, वह शीघ्र उद्योग का मधुर फल पाता है और इच्छित सुख-संपदा का उपभोग करता है ।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में अट्ठारहवाँ अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

प्रकरण १५
अध्याय १९

निशान्तप्रणिधिः


(१) वास्तुकप्रशस्ते देशे सप्राकारपरिखाद्वारमनेककक्ष्यापरिगतमन्तःपुरं कारयेत् ।
(२) कोशगृहविधानेन वा मध्ये वासगृहं, गूढभित्तिसञ्चारं मोहनगृहं तन्मध्ये वा वासगृहं, भूमिगृहं वाऽऽसन्नकाष्ठचैत्यदेवतापिधानद्वारमनेक सुरुङ्गासञ्चारं प्रासादं वा गूढभित्तिसोपानं, सुषिरस्तम्भप्रवेशापसारं वा, वासगृहं यन्त्रवद्धतलायपातं कारयेद् आपत्प्रतीकारार्थम् । आपदि वा कारयेत् । अतोऽन्यथा वा विकल्पयेत्; सहाध्यायिभयात् ।
(३) मानुषेणाग्निना त्रिरपसव्यं परिगतमन्तःपुरमग्निरन्यो न


राजभवन का निर्माण और राजा के कर्त्तव्य

(१) वास्तुविद्या के विशेषज्ञ (इञ्जीनियर) जिस स्थान को उपयुक्त बतायें, उसी स्थान पर ऐसे अन्तःपुर का निर्माण कराना चाहिये, जिसके चारों ओर परकोटा एवं खाई और जिसमें अनेक ड्योढ़ियाँ हों ।

(२) या कोशागार-निर्माण के विधानानुसार अन्तःपुर के बीच में राजा अपना महल बनवावे, या ऐसा मकान बनवाये, जिसकी दीवारों तथा गलियों (रास्तों) का पता न लगे, ऐसे मकान को मोहनगृह (भूलभुलैया) कहते हैं, उसके बीच में राजा अपने रहने का मकान बनवाये, या भूमि को खुदवा कर उसमें घर बनवाये, उस भूमिगृह के दरवाजे पर, समीप ही किसी देवता की मूर्ति स्थापित करवाये, उसमें जाने-आने के लिए गुप्त सुरंगें हों, या तो फिर ऐसा महल बनवाये, जिसकी दीवारों के भीतर गुप्त मार्ग हो, अथवा पोले खंभों के भीतर आने-जाने तथा चढ़ने-उतरने का रास्ता हो, अथवा आपत्तिकाल के निवारण के लिए यन्त्रों के आधार पर ऐसा वासगृह बनवाये जिसको इच्छानुसार नीचे-ऊपर तथा इधर-उधर हटाया जा सके, अथवा आपत्तिकाल के उपस्थित हो जाने पर ऐसे भवन का निर्माण करवाये । यदि राजा को इस बात की आशंका हो कि उसके समान ही दूसरा शत्रु राजा भी नीति-निपुण वास्तुकलाविद् है और वह गुप्तभवन-निर्माणसम्बन्धी सभी रहस्यों को जानता है तो वह अपनी बुद्धि के अनुसार उसमें परिवर्तन कर दे ।

(३) मनुष्य की हड्डी में बांस के रगड़ने से उत्पन्न अग्नि का स्पर्श, यदि अथर्व-

५ कौ०