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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

५२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण

५२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण

मिष्टमवेक्षेत वा । शासनमनिष्टमुक्त्वा बन्धवधभयाद्विसृष्टोऽप्यपगच्छेत् । अन्यथा नियम्येत ।

(१) प्रेषणं सन्धिपालत्वं प्रतापो मित्रसङ्ग्रहः ।
उपजापः सुहृद्भेदो दण्डगूढातिसारणम् ॥
बन्धुरत्नापहरणं चारज्ञानं पराक्रमः ।
समाधिमोक्षो दूतस्य कर्म योगस्य चाश्रयः ॥

(२) स्वदूतैः कारयेदेतत् परदूतांश्च रक्षयेत् ।
प्रतिदूतापसर्पाभ्यां दृश्यादृश्यैश्च रक्षिभिः ॥

इति कौटिलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे दूतप्रणिधिर्नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥


इस प्रकार के रहस्यों, कारणों और उद्देश्यों के सम्बन्ध में दूत अच्छी तरह से छान-बीन करे । रोके जाने के कारणों का ठीक-ठीक पता लग जाने पर वह उचित समझे तो रुके अन्यथा वहाँ से चल दें। अपने स्वामी की अभीष्ट-सिद्धि लिये वह चाहे तो उसी नगर में रुककर, गुप्त पुरुषों के द्वारा राजा तक सूचनाएँ पहुँचा कर, उनका प्रतीकार करवावे । अपने स्वामी का ऐसा संदेश, जिसको सुनकर शत्रुराजा क्रोधित हो उठे, सुनाने पर, दूत को बिना अनुमति लिये ही वहाँ से कूच कर देना चाहिए अन्यथा उसका पकड़ा जाना निश्चित है ।

( १ ) शत्रुप्रदेश में अपने स्वामी का संदेश लेकर जाना; शत्रुराजा का संदेश लाने के लिए जाना, सन्धिभाव को बनाये रखना, समय आने पर अपने पराक्रम को दिखाना, अधिक से अधिक मित्र बनाना, शत्रु के कृत्यपक्ष के पुरुषों को फोड़ देना, शत्रु के मित्रों को उससे विमुख कर देना, तीक्ष्ण, रसद आदि गुप्तचरों एवं अपनी सेना को भगा देना, शत्रु के बांधवों एवं रत्नों का अपहरण ( स्वायत्त ) कर लेना, शत्रु के देश में रहकर गुप्तचरों के कार्यों का निरीक्षण करना, समय आने पर पराक्रम दिखाना, सन्धि की चिरस्थिति के निमित्त जमानत-रूप में रखे हुए राजकुमार को मुक्त कराना और मारण, मोहन, उच्चाटन आदि का प्रयोग करना, ये सभी दूत के कार्य हैं ।

( २ ) राजा को चाहिये कि वह उपर्युक्त सभी कार्य दूतों के द्वारा करवाये और शत्रुओं के पीछे अपने दूतों या गुप्तचरों को लगाये रखे । अपने देश में तो वह शत्रुदूतों के कार्यों का पता प्रकट रूप से लगाये, किन्तु शत्रुदेश में उनकी सूचनायें गुप्तरूप से संग्रह करवाये ।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में दूतप्रणिधि नामक पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त ।

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| प्रकरण १२ | |
| अध्याय १६ | राजपुत्ररक्षणम् |


(१) रक्षितो राजा राज्यं रक्षत्यासन्नेभ्यः परेभ्यश्च । पूर्वं दारेभ्यः पुत्रेभ्यश्च ।
(२) दाररक्षणं निशान्तप्रणिधौ वक्ष्यामः ।
(३) पुत्ररक्षणं जन्मप्रभृति राजपुत्रान् रक्षेत् । कर्कटकसधर्माणो हि जनकभक्षा राजपुत्राः ।
(४) तेषामजातस्नेहे पितर्युपांशुदण्डः श्रेयानिति भारद्वाजः ।
(५) नृशंसमदृष्टवधः क्षत्रविनाशश्चेति विशालाक्षः । तस्मादेकस्थानावरोधः श्रेयानिति ।
(६) अहिभयमेतदिति पाराशराः । कुमारो हि विक्रमभयान्मां पिता रुणद्धीति ज्ञात्वा तमेवाङ्के कुर्यात् । तस्मादन्तपालदुर्गे वासः श्रेयानिति ।


राजपुत्रों से राजा की रक्षा

( १ ) निकटवर्ती सम्बन्धियों तथा शत्रुओं से सुरक्षित राजा ही राज्य की रक्षा कर सकता है । राजा को चाहिये कि सर्वप्रथम वह अपनी रानियों और अपने पुत्रों से अपनी रक्षा का प्रबन्ध करे ।

( २ ) रानियों से किस प्रकार राजा को आत्मरक्षा करनी चाहिये, इसके उपाय आगे निशान्तप्रणिधि प्रकरण में बताये जायेंगे ।

( ३ ) अपने पुत्रों से आत्मरक्षा करने के लिए राजा को चाहिए कि वह जन्म से ही राजपुत्रों पर कड़ी निगरानी रखे, क्योंकि केकड़े की भाँति राजपुत्र भी अपने पिता के भक्षक होते हैं ।

( ४ ) इस सम्बन्ध में आचार्य भारद्वाज का कहना है कि 'यदि राजकुमारों में पितृभक्ति की भावना न दिखाई दे तो तो उनका चुपचाप वध कर डालना ही श्रेयस्कर है ।'

( ५ ) आचार्य विशालाक्ष इसको पापकर्म कहते हैं । उनका कथन है कि 'निरपराध बच्चों को इस प्रकार मरवा डालना घोर पाप और अतिक्रूरता है, इस प्रकार तो क्षत्रियवंश ही सर्वथा नष्ट हो जायगा । इसलिए यदि राजकुमारों में पितृभक्ति न दिखाई दे तो उन्हें किसी स्थान में कैद करके रखा जाना उचित है ।'

( ६ ) आचार्य पराशर के अनुयायी इसके भी विरुद्ध हैं । उनका अभिमत है कि 'यह तो सर्पभय के समान है । जैसे घर में घुसा हुआ साँप भयावह होता है,

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(१) औरभ्रकं भयमेतदिति पिशुनः । प्रत्यापत्तेर्हि तदेव कारणं ज्ञात्वान्तपालसखः स्यात् । तस्मात् स्वविषयादपकृष्टे सामन्तदुर्गे वासः श्रेयानिति ।
(२) वत्सस्थानमेतदिति कौणपदन्तः । वत्सेनेव हि धेनुं पितरमस्य सामन्तो दुह्यात् । तस्मान्मातृबन्धुषु वासः श्रेयानिति ।
(३) ध्वजस्थानमेतदिति वातव्याधिः । तेन हि ध्वजेनादितिकौशिकवदस्य मातृबान्धवा भिक्षेरन् । तस्माद् ग्राम्यधर्मैष्वेनमवसृजेयुः । सुखोप-रुद्धा हि पुत्राः पितरं नाभिद्रुह्यन्तीति ।
(४) जीवन्मरणमेतदिति कौटिल्यः । काष्ठमिव हि घुणजग्धं राज-


उसी प्रकार पुत्र को कैद में रखना भी भयप्रद है, क्योंकि राजकुमार को जब यह पता चल जायगा कि पिता ने अपने वध के भय से उसे कैद में डाल रखा है, तो वह पिता के घर में रहता हुआ सरलता से उसके वध की योजना तैयार कर सकता है । इसलिए राज्य की सीमा के दूरस्थ दुर्ग में ही राजकुमार को रखना श्रेयस्कर है ।'

(१) आचार्य पिशुन (नारद) इस युक्ति से सहमत नहीं हैं । उनका कहना है कि 'दूरस्थ दुर्ग में राजपुत्र को रखना उसी प्रकार भयावह है, जैसे आक्रमण करने से पूर्व मेढ़ा कुछ पीछे हट जाता है और पुनः दुगुने वेग से झपट पड़ता है । राजकुमार को जब अपने कैद होने का कारण विदित हो जायगा तो वह अपनी योजना को पूरा करने के लिए दुर्गपाल को मित्र बनाकर, उसकी सहायता से अपने पिता पर आक्रमण कर सकता है । इसलिए राजकुमार को, राज्य की सीमा से बाहर किसी पड़ोसी (मित्र) राजा के दुर्ग में रखना ही अधिक उपयुक्त है ।'

(२) आचार्य कौणपदंत की कुछ दूसरी ही स्थापना है । उनकी स्थापना है कि 'राजकुमार को परराज्याश्रित करने का परिणाम यह होगा कि जैसे गाय का बछड़ा दूसरे के हाथ में सौंप देने से इच्छानुसार वह कभी भी गाय को दुह सकता है, वैसे ही राजकुमार का संरक्षक पड़ोसी राजा, राजकुमार को अपने वश में करके उचित-अनुचित रीति से इच्छानुसार विजिगीषु से धन आदि ले सकता है । इसलिए राजकुमार को ननिहाल में रख देना ही उचित जान पड़ता है ।'

(३) आचार्य वातव्याधि इस सलाह पर भी आपत्ति प्रकट करते हैं । उनका परामर्श है कि 'राजकुमार को उसके मातृकुल में रखना एक ध्वजा के समान है, जिसको मातृकुल वाले अपनी आमदनी का वैसा ही साधन बनाकर उपयोग कर सकते हैं, जैसा कि अदिति नाम की भिक्षुणी और कौशिक नाम के सँपेरे जीविका-निर्वाह के लिए अपने पेशेवर कौतुकों को दिखाते फिरते हैं । इसलिए राजकुमार को, उसकी इच्छानुसार, विषय-भोग में लिप्त रहने देना चाहिए, क्योंकि विषय-वासनाओं में उलझे हुए राजकुमारों को पिता से द्रोह करने का अवकाश ही नहीं मिलता है ।'

(४) आचार्य कौटिल्य इस सिद्धान्त को, जीते-जी राजपुत्रों की हत्या कर देने

प्र० १२ : अ० १६ ] राजपुत्रों से राजा की रक्षा ५५

कुलमविनीतपुत्रमभियुक्तमात्रं भज्येत । तस्मादृतुमत्यां महिष्याम् ऋत्विजश्चरुमैन्द्राबार्हस्पत्यं निर्वपेयुः । आपन्नसत्त्वायां कौमारभृत्यो गर्भभर्मणि प्रजने च वियतेत । प्रजातायाः पुत्रसंस्कारं पुरोहितः कुर्यात् । समर्थं तद्विदो विनयेयुः ।

(१) सत्रिणामेकश्चैनं मृगयाद्यूतमद्यस्त्रीभिः प्रलोभयेत्—पितरि विक्रम्य राज्यं गृहाणेति । तदन्यः सत्री प्रतिषेधयेद् इत्याम्भीयाः ।

(२) महादोषमबुद्धबोधनमिति कौटिल्यः । नवं हि द्रव्यं येन येनार्थजातेनोपदिह्यते तत्तदाचूषति । एवमयं नवबुद्धिर्यद्यदुच्येत तत्तच्छास्त्रोपदेशमिवाभिजानाति । तस्माद् धर्ममर्थं चास्योपदिशेन्नाधर्ममनर्थं च ।

(३) सत्रिणस्त्वेनं तव स्म इति वदन्तः पालयेयुः । यौवनोत्सेकात् परस्त्रीषु मनः कुर्वाणमार्याव्यञ्जनाभिः स्त्रीभिरमेध्याभिः शून्यागारेषु रात्रा-


के समान अनर्थकारी बताते हैं। उनका कहना है 'राजकुमारों को इस प्रकार विषय-भोग में फँसाना उन्हें जीते ही मृत्यु के मुख में दे देना है। जिस प्रकार घुन लगी लकड़ी शीघ्र ही नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार अशिक्षित राजकुमारों का कुल बिना युद्ध आदि के ही विनष्ट हो जाता है। इसलिए राजा को चाहिए कि जब रानी ऋतुमती हो, तो (संतति की) ऐश्वर्य, विद्या, बुद्धि के निमित्त ऋत्विक्, इंद्र और वृहस्पति आदि देवताओं के लिये हविदान किया जाय। जब महारानी गर्भवती हो जाय तो कौमारभृत्य अंग के ज्ञाता शिशु-चिकित्सकों के निर्देशानुसार गर्भ की पुष्टि तथा उसके सुखपूर्वक प्रजनन के लिए यत्न किया जाय। राजकुमार के पैदा हो जाने पर विद्वान् पुरोहित विधिपूर्वक उसका संस्कार करें। जब वह समझने योग्य हो जावे तो विभिन्न विषयों के पारंगत विद्वान् उसको शिक्षा दें।'

(१) आचार्य आंभ के मतानुयायियों का कहना है कि 'सत्रियों (गुप्तचरों) में से कोई एक सत्री राजकुमार को मृगया, द्यूत, मद्य और स्त्रियों का प्रलोभन दे। यह भी कहे कि पिता पर आक्रमण करके तुम राज्य को ले लो, फिर मौज करो। इस पर दूसरा सत्री कहे ऐसा करना बहुत बुरा है।'

(२) आचार्य कौटिल्य के मतानुसार राजकुमार के भीतर यह कुबुद्धि जगाना बहुत ही अनिष्टदायी है। उनका तर्क एवं सुझाव है कि 'सरलमति बालकों में ऐसी कुबुद्धि पैदा करना महादोष कहा जायगा। जैसे मिट्टी का नया बर्तन घी, तेल आदि जिस भी नये द्रव्य का स्पर्श पाकर उसी को चूस लेता है, ठीक वैसे ही, अपरिपक्व बुद्धिवाले बालक को जो कुछ भी सिखाया जाता है, उसको वह शास्त्र-उपदेश की भाँति अमिट रूप से बुद्धि में जमा लेता है। इसलिये सरलमति बालकों को धर्म, अर्थ का ही उपदेश देना चाहिए, अधर्म, अनर्थ का नहीं।'

(३) सत्री लोग 'हम आपके ही हैं' इस अपनत्व को दर्शित करते हुए, राजपुत्र का पालन करें। यदि राजकुमार का युवा मन परस्त्री के लिए बेचैन हो उठता है

५६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ पहला अधिकरण

वुद्धेजयेयुः । मद्यकामं योगपानेनोद्वेजयेयुः । द्यूतकामं कापटिकैः पुरुषैरुद्वेजयेषुः । मृगयाकामं प्रतिरोधकव्यञ्जनैस्त्रासयेयुः । पितरि विक्रमबुद्धिं तथेत्यनुप्रविश्य भेदयेयुः । अप्रार्थनीयो राजा, विपन्ने घातः, सम्पन्ने नरकपातः, संक्रोशः प्रजाभिरेकलोष्टवधश्चेति ।

(१) विरागं प्रियमेकपुत्रं वा बध्नीयात् । बहुपुत्रः प्रत्यन्तमन्यविषयं वा प्रेषयेद्यत्र गर्भः पण्यं डिम्बो वा न भवेत् । आत्मसम्पन्नं सैनापत्ये यौवराज्ये वा स्थापयेत् ।

(२) बुद्धिमानाहार्यबुद्धिर्दुर्बुद्धिरिति पुत्रविशेषाः । शिष्यमाणो धर्मार्थावुपलभते चानुतिष्ठति च बुद्धिमान् । उपलभमानो नानुतिष्ठत्याहार्यबुद्धिः । अपायनित्यो धर्मार्थद्वेषी चेति दुर्बुद्धिः ।


तो उस समय उसके संरक्षकों को चाहिए कि आयर्विश धारण की हुई अपवित्र, घृण्य स्त्रियों को रात्रि के एकांत में राजकुमार के निकट भेज कर उसके मन में ऐसी घृणा तथा खिन्नता पैदा करायें कि परस्त्री की चाह से उसका मन सर्वथा फिर जाय । यदि वह मद्य पीने की इच्छा करे तो मद्य में कोई ऐसा पदार्थ मिलाकर उसको दिया जाय, जिससे कि मद्य के लिए उसकी अरुचि हो जाय । यदि वह जुआ खेलने की कामना करे तो छली-कपटी लोगों के साथ बैठाकर उसको इतना उद्विग्न किया जाय कि आगे से वह जूआ खेलने का नाम भी न ले । यदि वह शिकार खेलना चाहता है तो कपटवेश धारण किये हुए राजपुरुष बेचैन करके उधर से उसके मन को खिन्न कर दें । यदि वह पिता पर आक्रमण करने की इच्छा रखता है तो पहिले तो उसे बढ़ावा दिया जाय किन्तु ऐन मौके पर उससे कहें 'देखो, राजा के साथ कभी द्वेष नहीं करना चाहिए । यदि तुम असफल हो गए तो तुम्हारी मृत्यु अवश्यंभावी है और जीत भी गए तो पितृघातक होने के कारण तुमको घोर नरक भोगना पड़ेगा, सारी प्रजा तुमको लानत देगी और कोई असंभव नहीं कि एकमत होकर प्रजा तुम्हारा प्राणान्त कर दे । इसलिए तुम्हे इस भयंकर पाप-कर्म से बचना चाहिए ।'

( १ ) यदि एक ही राजपुत्र हो, और वह भी पितृद्रोही निकले तो उसे कैद कर देना चाहिए । यदि पुत्र अधिक हों तो उस द्रोही पुत्र को सीमांत प्रदेश अथवा किसी दूसरे देश में प्रवासित कर देना चाहिए, जहाँ कि उचित अन्न-वस्त्र प्राप्त न हो और जहाँ की प्रजा की उसके प्रति कोई सहानुभूति न हो । इसके विपरीत जो राजपुत्र आत्मगुणसंपन्न हो, उसको सेनापति या युवराज के उच्च पद पर नियुक्त किया जाय ।

( २ ) राजपुत्रों की तीन श्रेणियां हैं : १. बुद्धिमान्, २. आहार्यबुद्धि और ३. दुर्बुद्धि । जो धर्म और अर्थविषयक उपदेश को उचित रीति से ग्रहण करके तदनुसार आचरण करता है, वह 'बुद्धिमान्' है । जो धर्म और अर्थ को समझ तो लेता है,