कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
४५४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण
४५४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण
(१) इति गुणावस्थापनम् ।
(२) तेषां यस्मिन् वा गुणे स्थितः पश्येत् 'इहस्थः शक्ष्यामि दुर्गसेतु-कर्मवणिक्पथशून्यनिवेशखनिद्रव्यहस्तिवनकर्माण्यात्मनः प्रवर्तयितुं परस्य चैतानि कर्माण्युपहन्तुम्' इति तमातिष्ठेत्, सा वृद्धिः ।
(३) 'आशुतरा मे वृद्धिर्भूयस्तरा वृद्ध्युदयतरा वा भविष्यति विप-रीता परस्य' इति ज्ञात्वा परवृद्धिमुपेक्षेत । तुल्यकालफलोदयायां वृद्धौ सन्धिमुपेयात् ।
(४) यस्मिन् वा गुणे स्थितः स्वकर्मणामुपघातं पश्येन्नेतरस्य तस्मिन्न तिष्ठेत् । एष क्षयः ।
(५) 'चिरतरेणाल्पतरं वृद्ध्युदयतरं वा क्षेष्ये, विपरीतं परः' इति ज्ञात्वा क्षयमुपेक्षेत ।
(६) तुल्यकालफलोदये वा क्षये सन्धिमुपेयात् ।
चाहिए। यदि स्वयं को सर्वसंपन्न एवं शक्तिसंपन्न समझे तो चढ़ाई ( यान ) कर देनी चाहिए। अपने को निरा अशक्त समझने पर संश्रय से काम लेना चाहिए। यदि सहायता की अपेक्षा समझे तो द्वैधीभाव को अपनाना चाहिए।
( १ ) यहाँ तक छह गुणों का निरूपण किया गया ।
( २ ) उक्त गुणों में जिस गुण का आश्रय प्राप्त करने पर वह समझे कि, 'मैं इस को अपना कर अपने दुर्ग, सेतुकर्म, व्यापार, नई बस्ती बसाना, खान, लकड़ी के जंगल, हाथियों के जंगल आदि कार्यों को कर सकूँगा और शत्रु के इन कार्यों को नष्ट कर सकूँगा उसका ही आश्रय ले'—इस प्रकार के गुण का आलंबन ही वृद्धि है।
( ३ ) यदि वह समझे कि 'मेरी वृद्धि शीघ्र होगी और शत्रु की देर से, मेरी वृद्धि अधिक होगी और शत्रु की कम, हम दोनों की एक ही समय में बराबर वृद्धि होने पर भी शत्रु की वृद्धि ह्रासोन्मुख होगी और मेरी उदयोन्मुख', ऐसी अवस्था में शत्रु की वृद्धि की कोई चिंता न करे । यदि वह देखे कि शत्रु की वृद्धि भी समानरूप से उदय की ओर अग्रसर हो तो उसके साथ सन्धि कर ले ।
( ४ ) जिस गुण को अपनाने से अपने कार्यों का नाश और शत्रुकार्यों की कोई क्षति न हो, उसको कदापि न अपनाना चाहिए। इस प्रकार के गुण का अवलंबन ही क्षय है।
( ५ ) यदि वह ऐसा समझे कि 'मेरा क्षय बहुत दिनों बाद होगा और शत्रु का जल्दी, मेरा क्षय थोड़ा होगा और शत्रु का अधिक मेरा क्षय उदयोन्मुख होगा और शत्रु का क्षीणोन्मुख,' तो अपने क्षय की कोई परवाह न करे।
( ६ ) यदि शत्रु का क्षय अपने ही समान उदयोन्मुख समझे तो उससे सन्धि कर ले ।
प्र० ९८-९९ : अ० १ ] सन्ध्यादि छह गुण ४५५
(१) यस्मिन् वा गुणे स्थितः स्वकर्मवृद्धिं क्षयं वा नाभिपश्येत्, एतत्तस्थानम्।
(२) 'ह्रस्वतरं वृद्धद्युदयतरं वा स्थास्यामि विपरीतं पर' इति ज्ञात्वा स्थानमुपेक्षेत।
(३) तुल्यकालफलोदये वा स्थाने सन्धिमुपेयादित्याचार्याः।
(४) नैतद्विभाषितमिति कौटिल्यः।
(५) यदि वा पश्येत्—'सन्धौ' स्थितो महाफलैः स्वकर्मभिः परकर्माण्युपहनिष्यामि, महाफलानि वा स्वकर्माण्युपभोक्ष्ये, परकर्माणि वा, सन्धिविश्वासेन वा योगोपनिषत्प्रणिधिभिः परकर्माण्युपहनिष्यामि, सुखं वा सानुग्रहपरिहारसौकर्यं फललाभभूयस्त्वेन स्वकर्मणा परकर्मयोगावहं जनमास्रावयिष्यामि, बलिनातिमात्रेण वा संहितः परः स्वकर्मोपघातं प्राप्स्यति, तेन वा विगृहीतो मया सन्धत्ते, तेन अस्य विग्रहं दीर्घं करिष्यामि, मया वा संहितस्य मद्द्वेषिणो जनपदं पीडयिष्यति, परोपहतो वास्य जन-
(१) अथवा जिस गुण का आश्रय लेने पर अपनी वृद्धि और अपना क्षय कुछ भी न देखे, ऐसी समान स्थिति को स्थान कहते हैं।
(२) यदि वह समझे कि 'मेरी ऐसी दशा थोड़े समय तक रहेगी और शत्रु की बहुत दिनों तक; मेरी यह दशा उदयोन्मुख होगी और शत्रु की क्षयोन्मुख', ऐसी स्थिति में अपनी उस दशा की कोई चिन्ता न करे।
(३) पुरातन आचार्यों का सुझाव है कि 'यदि शत्रु राजा का भी स्थान समकालीन और उदयोन्मुखी हो तो उसके साथ सन्धि कर लेनी चाहिए।'
(४) किन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'पूर्वाचार्यों का यह सुझाव बहुत ही अनुपयुक्त है।'
(५) किसी विशेष स्थिति में यदि विजिगीषु राजा यह देखे कि 'सन्धि कर लेने पर अपने शक्तिशाली कर्मों से मैं शत्रु के कर्मों का उन्मूलन कर दूँगा; या अपने ही महान फलदायक कर्मों की भाँति शत्रु के कर्मों का उपभोग भी संधि-विश्वास से कर सकूँगा अथवा संधि के बहाने गुप्तचरों तथा विष प्रयोगों द्वारा शत्रु के कर्मों को नष्ट कर सकूँगा, या सन्धि के बहाने शत्रु के कार्यकुशल व्यक्तियों को उत्तम फल तथा पर्याप्त लाभ का प्रलोभन देकर अपने देश में खींच लाऊँगा, जिससे मेरे कृष्य आदि कार्य अधिक लाभदायी होंगे, अथवा अधिक बलवान् शत्रु के साथ संधि करने पर शत्रु को बहुत धन देना पड़ेगा और कोष को क्षीण करने पर वह अपने कर्मों को क्षीण कर लेगा, अथवा शत्रु का जिसके साथ विग्रह हो उसके साथ संधि करके मैं अपने शत्रु के साथ होने वाले विग्रह को अधिक दिनों तक बनाये रखूँगा, अथवा