कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
७१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण
७१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण
चाटूक्तचांदिषु कृत्येषु यज्ञप्रहवणेषु वा ।
सूतिकाप्रेतरोगेषु प्रीतिशोकभयेषु वा ॥
प्रमादं याति यस्मिन्वा विश्वासात्स्वजनोत्सवे ।
यत्रास्यारक्षिसञ्चारो दुर्दिने सङ्कुलेषु वा ॥
विप्रस्थाने प्रदीप्ते वा प्रविष्टे निर्जनेऽपि वा ।
वस्त्राभरणमाल्यानां फेलाभिः शयनासनैः ॥
मद्यभोजनफेलाभिस्तूर्यैर्वाभिहतैः सह ।
प्रहरेयुररींस्तीक्ष्णाः पूर्वप्रणिहितैः सह ॥
(१) यथैव प्रविशेयुश्च द्विषतः सत्रहेतुभिः ।
तथैव चापगच्छेयुरित्युक्तं योगवामनम् ॥
इति दुर्गलम्भोपाये त्रयोदशेऽधिकरणे योगवामनं नाम द्वितीयोऽध्यायः;
आदित एकचत्वारिंशदुत्तरशततमः ।
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पर धिक्कार के योग्य कार्य करता हो, या यज्ञ, उत्सव, सूतिका, मृत्यु, रोग, प्रीति, शोक, भय आदि में प्रसन्न, दुःखी और भयभीत होता हो; अथवा जब किसी सगे-संबंधी के यहाँ उत्सव में सम्मिलित होकर प्रमत्त हो जाता हो, अथवा जहाँ रक्षित पुरुषों के बिना ही जाता-आता हो, अथवा किसी दुर्दिन या भीड़-भिड़ाके के अवसरों पर, अथवा निर्जन स्थान में, अथवा नगर में आग लग जाने पर, या नीरव घने जंगल में शत्रु के प्रविष्ट हो जाने पर—ऐसी स्थितियों में पहिले ही से छिपे हुए गुप्तचर, ज्यों ही इशारे के लिए वस्त्र, आभरण, माला, शयन, आसन, मद्य, भोजन आदि अवसरों पर तूर्यघोष हो, वैसे ही वे धावा बोल दें ।
( १ ) जिस प्रकार सत्री आदि गुप्तचर शत्रुओं के बीच में प्रविष्ट हुए हों, उसी छल से वे बाहर निकल आवें, अन्यथा उनके पकड़े जाने की संभावना हो सकती है । यहाँ तक योगवामन ( कपट उपायों द्वारा राजा को लुभाना ) का निरूपण किया गया ।
दुर्गलम्भोपाय नामक तेरहवें अधिकरण में योगवामन नामक दूसरा अध्याय समाप्त
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प्रकरण १७३
अध्याय ३
अपसर्पप्रणिधिः
(१) श्रेणीमुख्यमाप्तं निष्पातयेत् । स परमाश्रित्य पक्षापदेशेन स्वविषयात् साचिव्यकरणसहायोपादानं कुर्वीत । कृतापसर्पोपचयो वा परमनुमान्य स्वामिनो दूष्यग्रामं वीतहस्त्यश्वं दूष्यामात्यं दण्डमाक्रन्दं वा हत्वा परस्य प्रेषयेत् । जनपदैकदेशं श्रेणीमटवीं वा सहायोपादानार्थं संश्रयेत । विश्वासमुपगतः स्वामिनः प्रेषयेत् । ततः स्वामी हस्तिबन्धनमटवीघातं वापदिश्य गूढमेव प्रहरेत् ।
(२) एतेनामात्याटविका व्याख्याताः ।
(३) शत्रुणा मैत्रीं कृत्वा अमात्यानवक्षिपेत् । ते तच्छत्रोः प्रेषयेयुः—‘भर्तारं नः प्रसादय’ इति । स यं दूतं प्रेषयेत् । तमुपालभेत—‘भर्ता ते माम-
गुप्तचरों का शत्रु देश में निवास
( १ ) विजिगीषु राजा को चाहिए कि वह अपने किसी अत्यन्त विश्वस्त श्रेणी-मुख्य को बनावटी शत्रुतावश अपने राज्य से निकाल दे । वह शत्रु-राजा की शरण में जाकर उसका विश्वास प्राप्त करे और उसके कार्य का बहाना बनाकर छिपे तौर से अपने देश की युद्धोपयोगी सहायक वस्तुओं का संग्रह करे । सहायतार्थ जब उसके पास पर्याप्त गुप्तचर एकत्र हो जायँ तब वह शत्रु-राजा की अनुमति से अपने राजा के किसी दूष्यवर्ग या मित्र पर आक्रमण कर वहाँ से विजित हाथी, घोड़े, राजद्रोही अमात्य, सैनिक और मित्र आदि को गिरफ्तार कर शत्रु-राजा के पास भेज दे । विजिगीषु के उस विश्वस्त व्यक्ति को चाहिए कि वह जनपद के किसी एक देश, संघ या आटविक पुरुषों को अपने उस बनावटी स्वामी की सहायता के लिए तैयार करके फिर उनके साथ गुप्त-मंत्रणा करे । जब गुप्त-मंत्रणा द्वारा वे लोग वस्तुस्थिति को जानकर पूरी तरह सहमत हो जाँय तो उन्हें अपने असली स्वामी के सहायतार्थ उसके पास भेज दे । तदनन्तर हाथियों को पकड़ने या जंगल को नष्ट करने का बहाना बनाकर विजिगीषु राजा अपने असावधान शत्रु पर आक्रमण कर दे ।
( २ ) इसी प्रकार अमात्य तथा आटविक को गुप्तचर बनाकर शत्रु-देश में भेज देने की रीति को भी समझ लेना चाहिए ।
( ३ ) विजिगीषु राजा को चाहिए कि वह अपने शत्रु राजा के साथ बनावटी मित्रता करके अपने अमात्यों का तिरस्कार कर दे, वे अमात्य उस शत्रु-राजा के
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मात्यैर्भेदयति, न च पुनरिहागन्तव्यम्' इति । अथैकममात्यं निष्पातयेत् । स परमाश्रित्य योगापसर्परक्तदूष्यानशक्तिमतः स्तेनाटविकानुभयोपघातकान् वा परस्योपहरेत् । आप्तभावोपगतः प्रवीरपुरुषोपघातमस्योपहरेत् । अन्तपालमाटविकं दण्डचारिणं वा—'दृढमसौ चासौ च ते शत्रुगा सन्धत्ते' इति । अथ पश्चादभित्यक्तशासनै रेनान्धातयेत् ।
(१) दण्डबलव्यवहारेण वा शत्रुमुद्योज्य घातयेत् ।
(२) कृत्यपक्षोपग्रहेण वा परस्यामित्रं राजानमात्मन्यपकारयित्वाभियुञ्जीत । ततः परस्य प्रेषयेत् । 'असौ ते वैरी ममापकरोति, तमेहि सम्भूय हनिष्यावः । भूमौ हिरण्ये वा ते परिग्रहः' इति । प्रतिपन्नमभिसत्कृत्यागत-
पास अपने दूत को इस प्रकार का संदेश लेकर भेजें कि 'आप हमारे स्वामी को प्रसन्न करा दीजिए ।' उसके बाद जब शत्रु-राजा अपने जिस दूत को विजिगीषु राजा के पास भेजे, उसको विजिगीषु राजा यह कह कर धमका दे कि 'तुम्हारा राजा, हमारे अमात्यों को हमसे अलग करना चाहता है । खबरदार ! ऐसा संदेश लेकर मेरे पास फिर कभी न आना' । इसके बाद विजिगीषु राजा उन अमात्यों में से एक अमात्य को अपने यहाँ से निकाल दे । वह अमात्य शत्रु-राजा की शरण में जाकर अपने राजा के गुप्तचर, गूढ़-पुरुष, दूष्य-पुरुष, चोर तथा 'आटविक आदि को साथ ले जाकर शत्रु-राजा के पास जाये और उससे कहे कि, 'मैंने आपके लिए इतने सहायक तैयार कर दिये हैं' जब शत्रु-राजा उस अमात्य पर पूरा विश्वास करने लगे तो वह अमात्य शत्रु-राजा के शक्तिशाली पुरुषों को मरवा डाले । वह अमात्य शत्रु-राजा से कहे कि 'आपके ये आटविक और सैनिक लोग बड़े दुष्ट हो गए हैं । मैं निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ कि अमुक आटविक या अमुक सैनिक आपके शत्रु-राजा के साथ संधि कर रहे हैं ।' तदनन्तर वह अमात्य वध्य पुरुषों के पास आटविक और विजिगीषु की पारस्परिक मित्रता को प्रकट करने वाले कपट लेखों को उस शत्रु-राजा को दिखाकर उन अन्तःपाल आदि को मरवा डाले ।
( १ ) अथवा वह अमात्य शत्रु को सैनिक सहायता देने का वायदा कर उसको उसके शत्रु से भिड़ा दे और बाद में उसकी सहायता न कर उसके शत्रु द्वारा ही उसको मरवा डाले ।
( २ ) अथवा विजिगीषु को चाहिए कि वह शत्रु के क्रुद्ध, लुब्ध तथा भीत आदि प्रतिपक्ष को अपने अनुकूल बनाकर शत्रु के शत्रु राजा द्वारा अपना कुछ अपकार कराये और फिर उस पर चढ़ाई कर दे । उसके बाद विजिगीषु शत्रु-राजा के पास अपने दूत द्वारा यह संदेश भेजे कि 'यह तुम्हारा शत्रु-राजा बराबर मेरा अपकार कर रहा है, आओ, हम दोनों मिलकर उस पर चढ़ाई कर दें । इस विजय में जो
प्र० १७३ : अ० ३ ] अपसर्पप्रणिधि ७१७
मवस्कन्देन प्रकाशयुद्धेन वा शत्रुना घातयेत् । अभिविश्वासनार्थं भूमिदान-पुत्राभिषेकरक्षापदेशेन वा ग्राहयेत् । अविषह्यमुपांशुदण्डेन वा घातयेत् । स चेद्दण्डं दद्यात् न स्वयमागच्छेत्' तमस्य वैरिणा घातयेत् । दण्डेन वा प्रयातमिच्छेत् न विजिगीषुणा' तथाप्येनमुभयतः संपीडनेन घातयेत् ।
(१) अविश्वस्तो वा प्रत्येकशो यातुमिच्छेत्, राज्यैकदेशं वा यातव्यस्य आदातुकामः, तथाप्येनं वैरिणा सर्वसन्दोहेन वा घातयेत् । वैरिणा वा सक्तस्य दण्डोपनयेन मूलमन्यतो हारयेत् ।
(२) शत्रुभूम्या वा मित्रं पणेत मित्रभूम्या वा शत्रुम् । ततः शत्रुभूमि-लिप्सायां मित्रेणात्मन्यपकारयित्वाभियुञ्जीत । इति समानाः पूर्वेण सर्व एव योगाः ।
भूमि और हिरण्य प्राप्त होगा उसमें तुम्हें भी हिस्सा दिया जायेगा । जब शत्रु-राजा इस बात को स्वीकार कर विजिगीषु राजा के पास आ जाय तो पहले उसका अच्छा स्वागत-सत्कार किया जाय और बाद में सोते समय छिपकर उसका वध कर दिया जाय, अथवा प्रकाशयुद्ध के समय शत्रु के द्वारा ही उसको मरवा दिया जाय । यदि विजिगीषु की विजय हो जाय तो अपनी पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार जीते हुए हिरण्य तथा भूमि देने या पुत्र के राज्याभिषेक करने अथवा अपनी रक्षा करने के बहाने उस सहयोगी शत्रु-राजा को बुलाकर उसे कैद कर ले । यदि शत्रु इस प्रकार भी काबू में न आये तो उपांशु दंड द्वारा उसका वध करा दिया जाय । यदि विजिगीषु की सहायता के लिए शत्रु-राजा स्वयं न आकर अपनी सेना को ही भेज दे तो उस सेना को मुकाबले में लड़ाकर मरवा दिया जाय । यदि विजिगीषु के सहायतार्थ आया हुआ शत्रु-राजा अपनी सेना के साथ ही युद्ध-भूमि में आना चाहे, तब भी दोनों ओर से घेरा डालकर उसको मरवा दिया जाय ।
( १ ) यदि विजिगीषु के अविश्वास के कारण सहायतार्थ आया हुआ वह शत्रु-राजा इस नीयत से युद्ध में जाये कि अमुक हिस्से को जीत कर मैं अपने वश में कर लूंगा तब भी विजिगीषु उस शत्रु-राजा को उसके शत्रु-राजा द्वारा अपनी सम्पूर्ण सैनिक शक्ति के द्वारा अवश्यमेव मरवा डाले; अथवा लड़ाई में व्यस्त उस शत्रु-राजा की राजधानी में भेजकर विजिगीषु उसका अपहरण करवा डाले ।
( २ ) अथवा विजिगीषु राजा को चाहिए कि वह अपने मित्र के साथ छिपे तौर पर यह कह कर संधि कर ले कि 'यदि हम दोनों ने मिलकर शत्रु पर विजय प्राप्त कर ली तो उसकी भूमि को हम आपस में आधा-आधा बाँट लेंगे ।' इसी प्रकार विजिगीषु शत्रु-राजा के साथ भी छिपे तौर पर यह संधि कर ले कि 'हम दोनों मिल कर तुम्हारे अमुक शत्रु पर विजय प्राप्त करके उसकी भूमि को आपस में बराबर बाँट