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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

५१४ • कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् १ [ अध्याय १

५१४ • कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् १ [ अध्याय १
पश्चिम भागमें जो छोटे खट्वाङ्ग हैं, जिनपर मस्तक और पैर
रक्खे जाते हैं, वे 'भद्र' और 'यज्ञायज्ञीय' नामक साम है।
(सिरकी ओरका भाग ऊँचा और पैरकी ओरका भाग कुछ
नीचा है।) पूर्वसे पश्चिमको जो बड़ी-बड़ी पाटियाँ लगी हैं,
वे स्रुक् और सामके प्रतीक ह। तथा दक्षिण-उत्तरकी ओर
जो आड़ी-तिरछी पाटियाँ हैं, वे यजुर्वेदस्वरूपा हैं। चन्द्रमाकी
कोमल किरणें ही उस पलँगका नरम-नरम गद्दा है। उद्गीथ
ही उसपर बिछी हुई उपश्री (श्वेत चादर) है। लक्ष्मीजी
तकिया हैं। ऐसे दिव्य पर्यङ्कपर ब्रह्माजी विराजमान होते हैं।
इस तत्त्वको इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मवेत्ता उस पलँगपर
पहले पैर रखकर चढ़ता है।
तब ब्रह्माजी उससे पूछते हैं—'तुम कौन हो?' उनके
प्रश्नका वह इस प्रकार उत्तर दे—॥ ५ ॥
'मैं वसन्त आदि ऋतुरूप हूँ। ऋतुसम्बन्धी हूँ। कारण-
भूत अव्याकृत आकाश एवं स्वयंप्रकाश परब्रह्म परमात्मासे उत्पन्न
हुआ हूँ। जो भूत (अतीत), भूत (यथार्थ कारण), भूत
(जडचेतनमय चतुर्विध सर्ग) और भूत (पञ्चमहाभूतस्वरूप)
है, उस संवत्सरका तेज हूँ। आत्मा हूँ। आप आत्मा हैं,
जो आप हैं, वही मैं हूँ।' इस प्रकार उत्तर देनेपर ब्रह्माजी
पुनः पूछते हैं—'मैं कौन हूँ?' इसके उत्तरमे कहे—'आप
सत्य हैं।' 'जो सत्य है, जिसे तुम सत्य कहते हो, वह क्या
है?' ऐसा प्रश्न होनेपर उत्तर दे—'जो सम्पूर्ण देवताओ
तथा प्राणोंसे भी सर्वथा भिन्न—विलक्षण हो, वह 'सत्' है
और जो देवता एव प्राणरूप है, वह 'त्य' है। वाणीके
द्वारा जिसे 'सत्य' कहते हैं, वह यही है। इतना ही यह सब
कुछ है। आप यह सब कुछ हैं, इसलिये सत्य हैं" ॥ ६ ॥
यही बात ऋक्सम्बन्धी मन्त्रद्वारा भी बतायी गयी
है—"यजुर्वेद जिसका उदर है, सामवेद मस्तक है तथा
ऋग्वेद सम्पूर्ण शरीर है, वह अविनाशी परमात्मा
'ब्रह्म' के नामसे जाननेयोग्य है। वह ब्रह्ममय—ब्रह्मरूप
महान् ऋषि है।'" तदनन्तर पुनः ब्रह्माजी उस उपासकसे
पूछते हैं—'तुम मेरे पुरुषवाचक नामोंको किससे प्राप्त करते
हो?' वह उत्तर दे—'प्राणसे।' (प्र०) 'स्त्रीवाचक नामोंको
किससे ग्रहण करते हो?' (उ०) 'वाणीसे।' (प्र०)
'नपुंसकवाचक नामोंको किससे ग्रहण करते हो?' (उ०)
'मनसे।' (प्र०) 'गन्धका अनुभव किससे करते हो?'
(उ०) 'प्राणसे—घ्राणेन्द्रियसे।' इस प्रकार कहे।
(प्र०) 'रूपोंको ग्रहण किससे करते हो?' (उ०)
'नेत्रसे।' (प्र०) 'शब्दोंको किससे सुनते हो?' (उ०)
'कानोंसे।' (प्र०) 'अन्नके रसोंका आस्वादन किससे करते
हो?' (उ०) 'जिह्वासे।' (प्र०) 'कर्म किससे करते हो?'
(उ०) 'हाथोंसे।' (प्र०) 'सुख-दुःखोंका अनुभव किससे
करते हो?' (उ०) 'शरीरसे।'* (प्र०) 'रतिका
परिणामस्वरूप आनन्द, रति (मैथुनका आनन्द) और
प्रजोत्पत्तिका सुख किससे उठाते हो?' (उ०) 'उपस्थ-
इन्द्रियसे' यों कहे। (प्र०) 'गमनकी क्रिया किससे करते
हो?' (उ०) 'दोनों पैरोंसे।' (प्र०) 'बुद्धि-वृत्तियोंको,
ज्ञातव्य विषयोंको और विविध मनोरथोंको किससे ग्रहण
करते हो?' (उ०) 'प्रज्ञासे' यों कहे।
तब ब्रह्मा उससे कहते हैं—'जल आदि प्रसिद्ध पाँच
महाभूत मेरे स्थान हैं; अतः यह मेरा लोक भी जलादि-तत्त्व-
प्रधान ही है। तुम मुझसे अभिन्न मेरे उपासक हो, अतः यह
तुम्हारा भी लोक है।'
वह जो ब्रह्माजीकी सुप्रसिद्ध विजय (सबपर नियन्त्रण
करनेकी शक्ति) तथा सर्वत्र व्याप्ति—सर्वव्यापकता है, उस
विजयको तथा उस सर्वव्यापकताको भी वह उपासक प्राप्त
कर लेता है, जो इस प्रकार जानता (उपासना करता) है।
अर्थात् ब्रह्माजीकी भाँति ही वह सबका शासक एव सर्वव्यापक
बन जाता है॥ ७ ॥
॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥

  • यद्यपि सुख-दुःखका ज्ञान अन्त करणके द्वारा ही होता है, तथापि 'मेरे पैरमें पीड़ा है, सिरमें दर्द है' इत्यादि प्रतीतिके अनुसार 'शरीरसे' यह उत्तर दिया गया है।